Saturday, 12 August 2017

यकीन मानिये- सिर्फ चोटी ही नहीं कट रही है...

कई राज्यों में महिलाओं की चोटी कटने की घटना से सभी सकते में हैं ऐसे में शासन से लेकर प्रशासन तक इसका सच जानने की कोशिश में, तो आमजन भयभीत सा नजर आ रहा है- किसी ने अपने घर के आगे गोबर व मेहँदी के थापे लगाने शुरू कर दिए तो कहीं पूरा गांव मंदिर और तांत्रिकों व झाड़फूंक वाले बाबाओं की गिरफ्त में आ रहा है। बचाव के लिए लोग तरह-तरह के धार्मिक प्रपंच कर रहे हैं। उत्तरी भारत के हरियाणा और राजस्थान की 50 से अधिक महिलाओं ने शिकायत की है कि किसी ने उन्हें बेहोश कर रहस्यमयी तरीके से उनके बाल काट लिए। इस रहस्य को सुलझाने में पुलिस अब तक नाकाम रही है जबकि इन राज्यों की महिलाएं इससे डरी हुई और चिंतित हैं।


खबर ही ऐसी है कि हर कोई सकते में आ जाये। रहस्य तब और गहरा जाता है जब यह पूछा जाता है कि किसी ने कथित हमलावर को देखा है क्या? शुरूआती घटनाओं में पीड़ित कहो या चोटी कटी महिलाएं किसी भी हमलावर की पहचान बताने में असफल रही किन्तु जैसे-जैसे घटनाओं के सिलसिले ने रफ्तार पकड़ी अब कोई बिल्ली जैसी दिखने वाली और कोई पीले कपड़ों में इंसानी आकृति की पहचान आगे रख उपरोक्त मामलों को सत्य घटनाओं की ओर मोड़ते दिख रहे हैं। दरअसल इस ‘‘काल्पनिक नाई’’ की पहली खबर जुलाई में राजस्थान से आई थी, लेकिन अब इस तरह की खबरें हरियाणा और यहां तक कि राजधानी दिल्ली से भी आने लगी हैं।


चोटी कटने की इन घटनाओं को लेकर अफवाह और व्यंग का बाजार गर्म है मीडिया इसे सनसनी के तौर पर पेश  कर अफवाहों की आग में पेट्रोल छिड़कने का कार्य सा करती दिख रही है। तमाम तरह के डरावने साउंड के साथ खबर को पानी पी-पीकर परोसा जा रहा है। घटना में पीड़ित एक महिला का कहना है कि चोटी कटने से पहले उसके सिर में तेज दर्द हुआ और वह बिस्तर पर बेसुध हो गई। होश आने पर उसने देखा कि उसकी चोटी कटी हुई है। सभी मामलों में पीड़ित महिलाएं या तो घर पर अकेली थी, कोई खेत में अकेली थी- कोई भी एक घटना ऐसी नहीं है कि जिसमें कथित पीड़िता के अलावा मौके पर कोई दूसरा गवाह रहा हो।

रेवाड़ी के जोनवासा गांव की 28 वर्षीय रीना देवी ने कहा कि उन पर गुरुवार को हमला हुआ और इस बार हमलावर एक बिल्ली थी। उन्होंने कहा, मैं अपना काम कर रही थी तभी मैंने एक बड़ी आकृति देखी, यह बिल्ली के जैसी थी- तब मैंने महसूस किया कि किसी ने मेरे कंधे को छुआ और ये ही आखिरी बात मुझे याद है। वह मानती है कि उनकी कहानी पर विश्वास करना मुश्किल है। वह आगे कहती हैं, मैं जानती हूं कि ये असंभव सा लगता है- लेकिन मैंने यही देखा- कुछ लोग कहते हैं कि मैंने खुद अपने बाल काट लिए हैं। लेकिन मैं ऐसा क्यों करूंगी? लगभग सभी घटनाएँ इसी तरह की हैं किसी की चोटी बाथरूम में कटी मिली तो किसी की छत पर हर एक दावा इसी तर्क के सहारे सामने रखा जा रहा कि में ऐसा क्यों करूंगी?

राज्य दर राज्य घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है प्रशासन इन मामलों में यही कहता मिल रहा है कि ये विचित्र घटनाएं हैं। हमें वारदात की जगह पर कोई सुराग नहीं मिल रहे, हो सकता है इस अपराध में कोई संगठित गिरोह शामिल हो- हालाँकि कई लोगों का यह भी मानना है कि तांत्रिक या तथाकथित ओझा इन हमलों के पीछे हैं क्योंकि इस तरह के मामलों में लोग उनके पास इलाज के लिए पहुंचते हैं, जबकि कुछ लोग तो इसके पीछे अलौकिक शक्तियों का हाथ बताने में भी पीछे नहीं हट रहे हैं।

आर्य समाज से जुड़े होने के कारण कई लोगों ने इन घटनाओं पर मेरी राय जाननी चाही तो मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि 21वीं सदी जिसे आधुनिक सदी भी कहा जा रहा है लेकिन भारत में इस तरह की घटनाओं का होना शर्मनाक है। यहाँ झूठ और अफवाहों के पांव सरपट दौड़ते हैं पिछले साल बाजार में नमक की कमी की अफवाह के कारण थोड़ी ही देर में नमक तीन सौ रुपये किलो तक बिक गया था। इसी प्रकार 2006 में हजारों लोग मुंबई के एक समुद्री तट पर यह सुन कर पहुंचने लगे थे कि वहां आश्चर्यजनक रूप से समुद्र का पानी मीठा हो गया है। साल 2001 में मंकी मैन काला बन्दर की जमकर अफवाह फैली थी। दिल्ली में सैकड़ों लोगों पर मंकी मैन ने कथित रूप से हमला किया। घायल लोग भी सामने आये लेकिन बाद में आई रिपोर्ट के मुताबिक यह जन भ्रामक मामला साबित हुआ।


इसी तरह 90 के मध्य में दुनिया भर के लाखों लोगों के बीच यह खबर फैली हुई थी कि एक भगवान की एक मूर्ति दूध पी रही है। 1995 में भगवान गणेश की मूर्ति के चम्मच से दूध पीने की खबर समूचे देश में फैल गई थी। हालाँकि मनोचिकित्सक इसे ‘‘मासहिस्टीरिया’’ या ‘‘जन भ्रम का रोग’’ मानते हैं। इन घटनाओं में पीड़ित होने वाली महिला निश्चित तौर पर किसी आंतरिक मनोवैज्ञानिक द्वंद से जूझ रही होगी। जब वह इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनती हैं। तो खुद पर ऐसा होते हुए सा अहसास करती हैं, ऐसा कभी-कभी अवचेतनावस्था में भी होता है। समाज के जिम्मेदार लोगों को ऐसे मामलों की तह तक जाना चाहिए लोगों से अफवाहों में यकीन नहीं करने की अपील करनी चाहिए क्योंकि इन अफवाहों से देश की आधुनिक शिक्षा, ज्ञान, धर्म व सामाजिक समझदारी पर भी सवाल उठकर चोटी के साथ देश की नाक भी कटती है।

 विनय आर्य 

तो भूटान भी तिब्बत बन जायेगा!!

पिछले डेढ़ दो महीने से लेकर अभी तक हर रोज सुबह समाचार पत्रों में चीन की धमकी भरी एक खबर जरुर होती है। हो भी क्यों ना! क्योंकि 16 जून 2017 को जब चीनी सैनिक, चुंबी घाटी के दक्षिण में स्थित उसी विवादित डोकलाम इलाके में घुस आए तब भारत ने वह किया जो उसने 1950 में नहीं किया था। लेकिन 67 वर्ष बाद अब भारत अपने करीबी दोस्त के बचाव में उतर आया और इस समय ये दोस्त है भूटान- इसके बाद चीन द्वारा अपने सरकारी प्रवक्ताओं और सरकारी मीडिया की पूरी फौज भारत को तरह-तरह से डराने के लिए छोड़ दी गयी। हर रोज चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स भारत के खिलाफ जहर उगलता दिखा। चाइना का थिंक टैंक कभी कश्मीर में घुसने की धमकी दे रहा है तो कभी सिक्किम में षडयंत्र करने की-जब यहाँ भी उसकी धमकी का असर वर्तमान केंद्र की सरकार पर होता नहीं दिखा तो उसकी ओर से भूटान से लेकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक में भी भारत को देख लेने की धमकी दी जाने लगी। शायद बीजिंग ने कभी नहीं सोचा होगा कि थिंपू को बचाने के लिए दिल्ली इतने आगे बढ़ जाएगी।


यदि बीता इतिहास खांगालें तो भारत ने आजादी के बाद ल्हासा में अपना प्रतिनिधि ब्रितानी आईसीएस अफसर ह्यूज रिचर्ड्सन को चुना। वे 1947 से 1950 तकभारतीय मिशन के इंचार्ज थे। 15 जून 1949 को भारत के विदेश मंत्रालय को भेजे गए संदेश में उन्होंने सुझाव दिया था कि भारत असाधारण परिस्थियों में चुंबी घाटी से लेकर फरी तक कब्जा करने के बारे में विचार कर सकता है। चुंबी घाटी, भूटान और सिक्किम के बीच राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तिकोना इलाका है। इसके 16 महीने बाद, चीनी फौज पूर्वी तिब्बत में घुस आई- उस समय सिक्किम के राजनीतिक मामलों के अफसर हरिश्वर दयाल थे। उन्होंने रिचर्ड्सन जैसा ही संदेश दिल्ली को भेजा- उनका सुझाव था कि उस समय भारत सरकार ने रिचर्ड्सन की सलाह पर ध्यान नहीं दिया। जबकि ये शुद्ध  रूप से एक रक्षात्मक उपाय का सुझाव था और इसमें आक्रमण की कोई मंशा नहीं थी। लेकिन अब चीन इस इलाके में घुस आया है। 

आज डोकलाम विवाद पूरी विश्व मीडिया की सुर्खियाँ बन रहा है। चाइना का आर्थिक गुलाम पाकिस्तान अपने न्यूज रूम में बैठा युद्ध की बाट जोह रहा है तो यूरोप की मीडिया साफ सधे शब्दों में चाइना की इस हरकत पर आलोचना कर युद्ध से बचने की सलाह भी दे रही है।

भूटान के डोकलाम भूभाग का राणनीतिक महत्व है। इसलिए चीन उसको शायद एकतरफा तरीके से कब्जा करने की कोशिश कर रहा है। भूटान उसको अपना क्षेत्र मानता है और यह मामला भी वहीं का है जहां सीमा अनिश्चित है। दो देशों के साथ चीन की सीमा अभी पूरी तरह निर्धारित नहीं हुई है। इनमें से एक भूटान और दूसरा भारत है। भारत का भी इसमें एक किरदार इसलिए है कि तीनों देशों के बीच में भी एक समझौता है कि जहां भी ट्राई जंक्शन होगा यानी जिस बिन्दु पर तीनों देशों की सीमाएं तय होगीं, वह तीनों देशों के बीच बातचीत से ही तय होगी। चीन की इस एक तरफा आक्रामक कोशिश का विराध करना जरूरी है।


भारत और भूटान के बीच जो संधि है, उसके मुताबिक भारत का अब तक का जवाब बिल्कुल सही कहा जाएगा। इसमें भारत के भी अपने निजी, राजनीतिक और बहुत अहम हित हैं।  सब जानते हैं कि डोकलाम के नीचे चुंबी वैली है, जिसे हम चिकेन्स नेक कहते हैं, जो पूर्वोत्तर भारत का संपर्क मार्ग यानि सिलीगुड़ी कारिडोर है। भूटान ने ये साफ कहा है और भारत इस बात का समर्थन करता है। चीन का रुख ये है कि आपको डोकलाम पर नहीं आना चाहिए लेकिन दुनिया जानती है और वस्तु-स्थिति ये है कि चीन भूटान की सीमा में घुस आया है। भूटान छोटा देश है लेकिन हर देश सम्प्रभु होता है। दोनों देशों के बीच यानी भूटान-चीन के बीच और भारत-चीन के बीच ये समझौते अलग से हैं कि सीमा पर जब तक बातचीत चल रही है, तब तक विवादित सीमा पर शांति बहाल रहे। 


भारत भूटान के समर्थन में खड़ा है। जिस तरह से भारत भूटान के समर्थन में खड़ा हो सकता है। हमें उसका प्रयास करना चाहिए। यदि आज वहां खड़े नहीं हुए तो कल भूटान का तिब्बत बनाने में ड्रेगन कोई  कोर कसर नहीं छोड़ेगा चाइना में एक कहावत कि एक कदम चलो उसके बाद लोगों की प्रतिक्रिया देखो, दूसरा कदम चलो फिर लोगों की प्रतिक्रिया देखो यदि कोई रोक डांट न हो तो बढ़ते चले जाओ इस वजह से भी चीन को इस सिद्धांत में विश्वास करने की आदत रही है कि पहले कब्जा करने और बाद में बातचीत शुरू करना बेहतर है। इसी नीति के तहत आज उसने दक्षिण चीन सागर के आधे से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर लिया है। चीन के दादागिरी भरे रवैये से उसके पड़ोसी देश जापान, वियतनाम, दक्षिण कोरिया आदि देश भी खार खाए बैठे हैं।


आज चीन अपना विस्तार चौतरफा कर रहा है। इस विस्तार को कई मोर्चों पर चीन अंजाम दे रहा है। चीन खुद का विस्तार रोड, रेल, आर्थिक शक्ति और तकनीकी विकास के माध्यम से कर रहा है। इसके साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में चीन बड़ी नौसैनिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। लेकिन उसके इस उभार में उसे आर्थिक और सामरिक तौर पर भारत चुनौती देता दिख रहा है। 

हालाँकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने साफ किया है कि यु( किसी समस्या का समाधान नहीं है क्योंकि युद्ध के बाद भी समस्याओं का निपटारा बातचीत से ही हल होता है। 2014 में चीन ने भारत में 116 बिलियन डॉलर का निवेश किया जो आज की तारीख में 160 बिलियन डॉलर होगा या है। चीन ने इतना ज्यादा भारत में निवेश किया है। हमारी आर्थिक क्षमता बढ़ाने में चीन भी मदद कर रहा है। मामला केवल डोकलाम का नहीं है। जिस देश में चीन इतना ज्यादा निवेश कर रहा है क्या उस देश से युद्ध चाहेगा?

 Rajeev choudhary 

Thursday, 10 August 2017

राजनेताओं के मुखौटे से शर्म और सम्मान का उतरता परदा

हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष सुभाष बराला के बेटे विकास पर चंडीगढ़ में आईएएस अधिकारी की बेटी वर्निका कुंडु का पीछा करने और छेड़खानी का लगा आरोप के बाद देश के राजनेताओं के चेहरे से शर्म सम्मान के पर्दे की खीचतान जारी है. घटना 4 अगस्त की है. वर्निका की शिकायत पर पुलिस ने तब विकास समेत दो अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था. लेकिन जमानत पर जल्द रिहा कर दिया गया. जिसके बाद मीडिया ट्रायल शुरू हो गया और हरियाणा से शुरू हुई प्रधानमंत्री मोदी की मुहीम बेटी बचाओं बेटी पढाओंपर सवालिया निशान भी उठने शुरू हो गये है. हालाँकि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने रविवार को आरोपी लड़के के पिता सुभाष बराला का बचाव करते हुए कहा कि बेटे के किए के कृत्य लिए पिता को सजा नहीं दी जा सकती. ये सुभाष बराला नहीं बल्कि एक अन्य व्यक्ति से जुड़ा मामला है, इसलिए उनके बेटे के खिलाफ कदम उठाया जाएगा

मामला कितना भी बड़ा-छोटा या फिर सच्चा या झूठा है यह अभी कहा नहीं जा सकता लेकिन राजनीति की शालीनता में एक पूर्व प्रसंग यहाँ रखना जरूरी है कि लालबहादुर शास्त्री जी उत्तर प्रदेश में मंत्री थे, तब एक दिन शास्त्री जी की मौसी के लड़के को एक प्रतियोगिता परीक्षा के लिए कानपुर से लखनऊ जाना था. गाड़ी छूटने वाली थी, इसलिए वह टिकट न ले सका. लखनऊ में वह बिना टिकट पकड़ा गया. उसने शास्त्री जी का नाम बताया. शास्त्री जी के पास फोन आया.शास्त्री जी का यही उत्तर था, “हाँ है तो मेरा रिश्तेदार! किन्तु आप नियम का पालन करें.

लेकिन शर्म और सम्मान का जो पर्दा राजनेताओं को अपनी पनाह में लेकर सम्मान देता आया है उसे आज तार-तार किया जा रहा है और पूरी बेशर्मी के साथ कहा जा रहा है कि पिता का बेटे की करतूतों से क्या लेना-देना? अगर ऐसा है तो हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष सुभाष बराला को खुद अपनी तरफ से चंडीगढ़ पुलिस के कमिश्नर को पत्र लिख कर कहना चाहिए था कि उनके बेटे ने जो कारनामा किया है उसका ताल्लुक उनके राजनैतिक पद से किसी भी तरह न जोड़ा जाये और वही किया जाये जो वर्णिका के बयान के मुताबिक कानून कहता है. लेकिन इसके उलट विकास की जल्दी जमानत होना, सोशल मीडिया के माध्यम से पीडिता के चरित्र पर तरह-तरह के सवाल उठाये जाना यानि खराब चरित्र के सहारे लड़की को कमजोर किये जाने का प्रयास सा होता दिख रहा है. मीडिया पुरे मामले में संजय और राजनेता धृतराष्ट्र की भांति दिखाई पड़ रहे है.

जिस तरह बराला परिवार और भाजपा समर्थकों ने इस युवती के खिलाफ पोस्ट करना शुरू किया, साथ ही राज्य की आईएएस एसोसिएशन और मुख्य सचिव ने अपने किसी सहयोगी और उनकी बेटी के साथ हुए ऐसे घटनाक्रम के मामले से दूरी बना रखी हैक्या ये उस खेल की शुरुआती चेतावनी है, जो हर बार खेला जाता है. हालाँकि रेप या छेड़छाड़ का आरोप लगाना बेहद आसान है, अक्सर झूठे मामले उजागर भी होते है लेकिन जिन पर आरोप लगाया जाता है सालों तक उनके दामन पर दाग तो रहता ही है. साथ में परिवारजनों का सर शर्म भी झुक जाता है. दिल्ली निर्भया कांड के बाद हम जिस तरह के माहौल में रह रहे हैं वह सच में डरावना है. जैसे ही रेप या छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज होती है और शोर मचने लगता है.

वैसे इसके पीछे गलती इन लोगों की नहीं है गलती है समाज की उस मानसिकता की जो ये निर्धारित कर चुकी है कि अगर कोई लड़की किसी लड़के पर रेप या छेड़छाड़ का इल्जाम लगाती है तो वो सच ही होगा. पर एक दूसरा वर्ग भी है जो हर एक घटना के बाद यह कहता आसानी से मिल जाता है कि लड़कियां तो झूठे आरोप ही जड़ना जानती है ऐसा क्यों? गौरतलब है कि ऐसे मामलों में आंख बंद कर महिलाओं पर विश्वास करने की कई वजहें हैं, जिनमें से एक वजह महिलाओं को कमजोर समझा जाना है. इसके अलावा हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ जिस तरह से हिंसात्मक मामले बढ़ते जा रहे हैं, उस वजह से भी इन मामलों को भी सच्चा मान लिया जाता है. वैसे मै आपको बता दूं कि इन इल्जामों का खामियाजा सिर्फ उन पुरूषों को ही नहीं भुगतना पड़ता जो इन आरोपों का शिकार बनते हैं, बल्कि उन महिलाओं को भी भुगतना पड़ता है जो सच में छेड़छाड़ पीड़िता होती हैं

लेकिन वर्निका- विकास मामले में कुछ सवाल भारतीय कानून व्यवस्था के सामने हाथ से फैलाये खड़े दिख रहे है. यदि किसी कारण इस मामले में आरोपी युवक कोई आम नागरिक होता तो क्या तब भी प्रसाशन उसे तुरंत जमानत देकर रिहा कर देता? दूसरा सवाल यह है कि यदि यहाँ लड़की कोई आम गरीब परिवार की बेटी होती तो क्या तब भी यह मामला इतना उछलता? शायद सबका जवाब ना होगा क्योंकि ना जाने रोज कितने मामलों में पीडिता की शिकायत पर पुलिस छेड़छाड़ के आरोपियों को उठक बैठक लगवाकर थाने से ही छोड़ देती है. लेकिन इस मामले में मीडिया और विपक्ष पूरी तरह समाज में परोसकर पब्लिसिटी स्टंट करती दिख रहे है.

हो सकता है दो चार दिन के बाद जाँच रिपोर्ट सामने आये और मामला कुछ और निकले कुछ दिल्ली की जसलीन कौर  की तरह जिसमें उसने सर्वजीत नाम के युवा पर आरोप लगाया था  बाद में खुद एक प्रत्यक्षदर्शी ने भी इस मामले में बयान दे कर जसलीन के आरोप को गलत बताया था. या फिर हरियाणा की दो सगी बहनों की तरह जिन्हें मीडिया ने एक दिन में झाँसी की रानी बता दिया था और इसी खट्टर सरकार उनके लिए इनाम राशि की तुरंत घोषणा की थी. हालाँकि बाद में आरोप निराधार पाए. ये भी हो सकता है वर्निका के आरोप सच हो लेकिन राज्य सरकार के दबाव में सबूत मिटाकर केस को कमजोर किया जाये! कुछ भी लेकिन एक बात सत्य है कि देश के राजनेताओं के मुखोटे से शर्म और सम्मान का पर्दा उतरता जरुर दिखाई दे रहा है...
राजीव चौधरी 


भारत की भाषायी गुलामी


डॉ. वेदप्रताप वैदिक

स्वतंत्र भारत में भारतीय भाषाओं की कितनी दुर्दशा है ? इस दुर्दशा को देखते हुए कौन कह सकता है कि भारत वास्तव में स्वतंत्र है ? ‘पीपल्स लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडियानामक संस्था ने कई शोधकर्ताओं को लगाकर भारत की भाषाओं की दशा का सूक्ष्म अध्ययन करवाया है। कल इसके 11 खंड प्रकाशित हुए हैं। इस अवसर पर वक्ताओं ने दो महत्वपूर्ण बातें कहीं। एक तो यह कि पिछले 50 वर्षों में भारत की 250 भाषाएं लुप्त हो गई हैं, क्योंकि इन भाषाओं को बोलनेवाले आदिवासी बच्चों को सिर्फ देश की 22 सरकारी भाषाओं में ही पढ़ाया जाता है। उनकी भाषाएं सिर्फ घरों में ही बोली जाती हैं। ज्यों ही लोग अपने घरों से दूर होते हैं या बुजुर्गों का साया उन पर से उठ जाता है तो ये भाषाएं, जिन्हें हम बोलियां कहते हैं, उनका नामो-निशान तक मिट जाता है। इनके मिटने से उस संस्कृति के भी मिटने का डर पैदा हो जाता है, जिसने इस भाषा को बनाया है। इस समय देश में ऐसी 780 भाषाएं बची हुई हैं। इनकी रक्षा जरुरी है। 

अपनी भाषाओं की उपेक्षा का दूसरा दुष्परिणाम यह है कि हम अपनी भाषाओं के माध्यम से अनुसंधान नहीं करते। भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान का खजाना उपलब्ध है लेकिन हम लोग उसकी तरफ से बेखबर हैं। हम प्लेटो, सात्र्र और चोम्सकी के बारे में तो खूब जानते हैं लेकिन हमें पाणिनी, चरक, कौटिल्य, भर्तृहरि और लीलावती के बारे में कुछ पता नहीं। हमारे ज्ञानार्जन के तरीके अभी तक वही हैं, जो गुलामी के दिनों में थे। इस गुलामी को 1965-66 में सबसे पहले मैंने चुनौती दी थी। 50-52 साल पहले मैंने दिल्ली के इंडियन स्कूल आॅफ इंटरनेशनल स्टडीज़में मांग की थी कि मुझे अपने पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी (मेरी मातृभाषा) में लिखने दिया जाए। अंग्रेजी तो मैं जानता ही था, मैंने फारसी, रुसी और जर्मन भी सीखी। प्रथम श्रेणी के छात्र होने के बावजूद मुझे स्कूल से निकाल दिया गया। संसद में दर्जनों बार हंगामा हुआ। यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। आखिरकार स्कूल के संविधान में संशोधन हुआ। मेरी विजय हुई। भारतीय भाषाओं के माध्यम से उच्च शोध के दरवाजे खुले। इन दरवाजों को खुले 50 साल हो गए लेकिन इनमें से दर्जन भर पीएच.डी. भी नहीं निकले। क्यों ? क्योंकि अंग्रेजी की गुलामी सर्वत्र छाई हुई है। जब तक हमारे देश की सरकारी भर्तियों, पढ़ाई के माध्यम, सरकारी काम-काज और अदालातें से अंग्रेजी की अनिवार्यता और वर्चस्व नहीं हटेगा, भारतीय भाषाएं लंगड़ाती रहेंगी और हिंदुस्तान दोयम दर्जे का देश बना रहेगा। 
04.08.2017


चीन ने बनाया हिंदी को हथियार.....!

चीन हमें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर ही मात देने की तैयारी नहीं कर रहा है बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी वह हमें पटकनी मारने पर उतारु है। उसने चीनी स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए अब हिंदी को अपना हथियार बना लिया है। इस समय चीन की 24 लाख जवानों की फौज में हजारों जवान ऐसे हैं, जो हिंदी के कुछ वाक्य बोल सकते हैं और समझ भी सकते हैं।

भारत-चीन सीमांत पर तैनात चीनी जवानों को हिंदी इसलिए सिखाई जाती है कि वे हमारे जवानों और नागरिकों से सीधे बात कर सकें। उनका हिंदी-ज्ञान उन्हें जासूसी करने में भी जम कर मदद करता है। चीनी जवान भारतीय जवानों को हिंदी में धमकाते हैं, चेतावनी देते हैं, गालियां काढ़ते हैं और पटाने का भी काम करते हैं। हमारे जवान तो क्या, फौजी अफसर भी उनके आगे बगलें झांकते हैं। उनके दुभाषिए दोनों फौजों के बीच संवाद करवाते हैं।
चीनी के लगभग 20 विश्वविद्यालयों में बाकायदा हिंदी पढ़ाई जाती है। मैं चीन में ऐसे हिंदी विद्वानों से भी मिला हूं, जो हिंदी में पीएच.डी. हैं और जिन्होंने हमारे अनेक शास्त्रीय और काव्य-ग्रंथों का चीनी अनुवाद किया है। मैं जब भी चीन जाता हूं, चीनी सरकार से मैं हमेशा हिंदी-चीनी दुभाषिए की मांग करता हूं। जब प्रधानमंत्री नरसिंहराव चीन गए थे तो मैंने एक मित्र हिंदी प्रोफेसर को उनका दुभाषिया तय करवाया था।
भारत का दुर्भाग्य है कि हमारे नेता भाषा के महत्व को नहीं समझते। वे अंग्रेजी को ही दुनिया की एक मात्र भाषा समझते हैं। वे भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन कर अकड़ दिखाने लगते हैं लेकिन उन्हें अंग्रेजी की गुलामी करते हुए शर्म नहीं आती।
भारत में चीनी भाषा जानने वाले 500 लोग भी नहीं हैं। इसीलिए हमारे व्यापारियों को चीन में हजारों रु. रोज के दुभाषिए रखने पड़ते हैं। अंग्रेजी वहां किसी काम नहीं आती। हमारी कूटनीति भी कई देशों में अधकचरी रहती है, क्योंकि हमारे राजदूत उन देशों की भाषा ही नहीं जानते। हमारे ये अर्धशिक्षित नेता कब समझेंगे कि भारत को यदि हमें महाशक्ति बनाना है तो एक नहीं, अनेक विदेशी भाषाएं हमें नागरिकों को सिखानी होंगी और स्वभाषा को ही अपनी मुख्य भाषा बनानी होगी।

 वेद प्रताप वैदिक 

साहित्य और समाज के रिश्ते

शिक्षा की भाषादैनंदिन कार्यों में प्रयोग की भाषा, सरकारी काम-काज की भाषा के रूप में हिंदी को उसका जायज गौरव दिलाने के लिए अनेक प्रबुद्ध हिंदी सेवी और हितैषी चिंतित हैं और कई तरह के प्रयास कर रहे हैं जनमत तैयार कर रहे हैं. समकालीन साहित्य की युग-चेतना पर नजर दौडाएं तो यही दिखता है कि समाज में व्याप्त विभिन्न विसंगतियों पर प्रहार करने और विद्रूपताओं को उघारने के लिए साहित्य तत्पर है. इस काम को  आगे बढाने के लिए स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी विमर्श जैसे अनेक विमर्शों के माध्यम से हस्तक्षेप किया जा रहा है . इन सबमें  सामजिक न्याय की गुहार लगाई जा रही है ताकि अवसरों की समानता और समता समानता के मूल्यों को स्थापित किया जा सके. आज देश के कई राजनैतिक दल भी  प्रकट रूप से इसी तरह के मसौदे के साथ काम कर रहे हैं. आजाद भारत में स्वतंत्रताकी जाँच-पड़ताल की जा रही है. साहित्य के क्षेत्र में परिवर्तनकामी और जीवंत रचनाकार यथार्थ, पीड़ा, प्रतिरोध और संत्रास को लेकर अनुभव और कल्पना के सहारे मुखर हो रहे हैं. इन सब प्रयासों में सोचने का परिप्रेक्ष्य आज बदला हुआ है. यह अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि आज जिस देश और काल में हम जी रहे हैं वही बदला हुआ है . अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य और राजनीतिक समीकरण बदला हुआ है . संचार की तकनीक और मीडिया के जाल ने हमारे ऐन्द्रिक अनुभव की दुनिया का विराट फैलाव दिया है. ऐसे में जब इस सप्ताह दद्दायानी राष्ट्रकवि श्रदधेय मैथिलीशरण गुप्त की एक सौ इकतीसवीं जन्मतिथि पड़ी तो उनके अवदान का भी स्मरण आया. इसलिए भी कि उनके सम्मुख भी एक साहित्यकार के रूप में अंग्रेजों के उपनिवेश बने हुए परतंत्र भारत की मुक्ति का प्रश्न खड़ा हुआ था. उन्हें राजनैतिक व्यवस्था की गुलामी और मानसिक गुलामी दोनों की ही काट सोचनी थी और साहित्य की भूमिका तय कर उसको इस काम में नियोजित भी करना था.

 उल्लेखनीय है कि गुप्त जी का समय यानी बीसवीं सदी के आरंभिक वर्ष आज की प्रचलित खड़ी बोली हिंदी के लिए भी आरंभिक काल था . समर्थ भाषा की दृष्टि से हिंदी के लिए यह एक संक्रमण का काल था. भारतेन्दु युग में शुरुआत हो चुकी थी पर हिंदी का नया उभरता रूप अभी भी ठीक से अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका  था . सच कहें तो आज की हिंदी आकार ले रही थी या कहें रची जा रही थी . भाषा का प्रयोग पूरी तरह से रवां नहीं हो पाया था. इस नई चाल की हिंदी के महनीय शिल्पी सरस्वती पत्रिका के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गुप्त जी को ब्रज भाषा की जगह खड़ी बोली हिंदी में काव्य-रचना की सलाह दी और इस दिशा में प्रोत्साहित किया.
 गुप्त जी के मन-मस्तिष्क में देश और संस्कृति के सरोकार गूँज रहे थे. तब तक की जो कविता थी उसमें प्रायः परम्परागत विषय ही लिए जा रहे थे. गुप्त जी ने राष्ट्र को केन्द्र में लेकर काव्य के माध्यम से भारतीय समाज को संबोधित करने का बीड़ा उठाया. उनके इस प्रयास को तब और स्वीकृति मिली जब 1936 में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मा गांधी से उन्हें राष्ट्र-कविकी संज्ञा प्राप्त हुई. एक आस्तिक वैष्णव परिवार में जन्मे और चिरगांव की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले-बढे गुप्त जी का बौद्धिक आधार मुख्यतः स्वाध्याय और निजी अनुभव ही था. औपचारिक शिक्षा कम होने पर भी गुप्त जी ने समाज, संस्कृति और भाषा के साथ एक दायित्वपूर्ण रिश्ता विकसित किया. बीसवीं सदी के आरम्भ से सदी के मध्य तक लगभग आधी सदी तक चलती उनकी विस्तृत काव्य यात्रा में उनकी लेखनी ने चालीस से अधिक काव्य कृतियाँ हिंदी जगत को दीं . इतिवृत्तात्मक और पौराणिक सूत्रों को लेकर आगे बढती उनकी काव्य-धारा सहज और सरल है . राष्ट्रवादी और मानवता की पुकार लगाती उनकी कवितायेँ छंद बद्ध होने के कारण पठनीय और गेय हैं. सरल शब्द योजना और सहज प्रवाह के साथ उनकी बहुतेरी कवितायेँ लोगों की जुबान पर चढ़ गई थी.  उनकी कविता संस्कृति के साथ संवाद कराती सी लगती हैं. उन्होंने उपेक्षित चरित्रों को लिया . यशोधराकाबा और कर्बलाजयद्रथ बधहिडिम्बा, किसान, पञ्चवटी, नहुष, सैरंध्री, अजित, शकुंतला, शक्तिवन वैभव आदि खंड काव्य उनके व्यापक विषय विस्तार को स्पष्ट करते हैं. साकेत और जय भारत गुप्त जी के दो महाकाव्य हैं.
संस्कृति और देश की चिंता की प्रखर अभिव्यक्ति उनकी प्रसिद्ध काव्य रचना भारत-भारती में हुई जो गाँव शहर हर जगह लोकप्रिय हुई. उसका पहला संस्करण 1014 में प्रकाशित हुआ था . उसकी प्रस्तावना जिसे लिखे  भी एक सौ पांच साल हो गए आज भी प्रासंगिक है . गुप्त जी कहते हैं यह बात मानी हुई है कि भारत की पूर्व और वर्त्तमान दशा में बड़ा भारी अंतर है . अंतर न कह कर इसे वैपरीत्य कहना चाहिए . एक वह समय था कि यह देश विद्या, कला-कौशल और सभ्यता में संसार का शिरोमणि था और एक यह समय है कि इन्हीं बातों का इसमें शोचनीय अभाव हो गया है . जो आर्य जाति कभी सारे संसार को शिक्षा देती थी वही आज पद-पद पर पराया मुंह ताक रही है’!
 गुप्त जी का मन देश की दशा को देख कर व्यथित हो उठता है और समाधान ढूँढ़ने चलता है.  फिर गुप्त जी स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि ‘क्या हमारा रोग ऐसा असाध्य हो गया है कि उसकी कोई चिकित्सा ही नहीं है ?. इस प्रश्न पर मनन करते हुए गुप्त जी यह मत स्थिर कर पाठक से साझा करते हैं :  ‘संसार में ऐसा काम नहीं जो सचमुच उद्योग से सिद्ध न हो सके . परन्तु उद्योग के लिए उत्साह की आवश्यकता है . बिना उत्साह के उद्योग नहीं हो सकता . इसी उत्साह के उद्योग नहीं हो सकता. इसी उत्साह को उत्तेजित करने के लिए कविता एक उत्तम साधन है.’  इस तरह के संकल्प के साथ गुप्त जी काव्य-रचना में प्रवृत्त होते हैं .
 भारत-भारती काव्य के तीन खंड हैं अतीत, वर्तमान और भविष्यत् . बड़े विधि विधान से गुप्त जी भारत की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा की विभिन्न धाराओं का वैभव, अंग्रेजों के समय हुए उसके पराभव के विभिन्न आयाम और जो भी भविष्य में  संभव है उसके लिए आह्वान को रेखांकित किया है. उनकी खड़ी बोली हिंदी के प्रसार की दृष्टि से प्रस्थान विन्दु सरीखी तो हैं ही उनकी प्रभावोत्पाक शैली में उठाये गया सवाल आज भी मन को मथ रहे हैं: हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी ? हमें आज फिर इन प्रश्नों पर सोचना विचारना होगा और इसी बहाने समाज को साहित्य से जोड़ना होगा. शायद ये सवाल हर पीढ़ी को अपने अपने देश कल में सोचना चाहिए.


प्रोगिरीश्‍वर मिश्र Prof. GirishwarMisra, Ph.D
कुलपति  / Vice-Chancellor
महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय /Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya


राष्ट्र-ध्वज के विकास की कहानी

डॉ. पूर्ण सिंह डबास

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

झंडा या ध्वज कपड़े या किसी ऐसी ही चीज का प्रायः ऐसा आयताकार टुकड़ा होता है जिस पर किसी राष्ट्र, समुदाय, सैन्यबल अथवा राज्याधिकारी का प्रतीक या चिह्न अंकित हो।  इसे किसी खम्भे या लट्ठे पर फहराया जाता है या डंडे पर टाँग कर साथ ले जाया जाता है। सं. में झंडे के लिए ध्वज के साथ-साथ ध्वजा, पताका, केतु, तथा केतन शब्द भी प्रचलित हैं। झंडे के लिए फा॰ से आए परचम शब्द का प्रयोग भी हिंदी में होता है जो फा॰ में ठीक झंडे के अर्थ में तो नहीं लेकिन कुछ मिलते-जुलते अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसमें झंडेवाला अर्थ उर्दू-हिंदी में विकसित हुआ है। झंडेके अतिरिक्त ध्वज का एक अर्थ संस्कृत-कोशों में वह डंडा भी है जिस पर टांग कर झंडे को फहराया जाता है। इस डंडे के पर्याय के रूप में संस्कृत में ध्वज-यष्टि तथा पताका-दण्ड शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। प्रश्न पैदा होता है कि झंडा शब्द का स्रोत क्या है। हालांकि संस्कृत में ध्वज-दंड शब्द का प्रयोग नहीं मिलता लेकिन भाषाविदों का विचार है कि जिस प्रकार संस्कृत में पताका दंड शब्द मिलता है उसी प्रकार वहां ध्वज-दंड शब्द भी प्रचलित रहा होगा और इसी ध्वज दंड से हिन्दी का झंडा शब्द विकसित हुआ है।


साधारण व्यक्तियों को छोड़करऋ राजा, राजपद-प्राप्त अधिकारी, विशिष्ट व्यक्ति, कुल या वंश, गण तथा संस्थाएंऋ प्राचीन काल से ही अपनी पहचान के लिए किसी न किसी प्रतीक या चिह्न का प्रयोग करते आए हैं। ये प्रतीक आरम्भ में तो पशु, पक्षी तथा किसी फूल आदि तक सीमित थे लेकिन कालांतर में इनका विस्तार हुआ और अनेक नए प्रतीक इनमें जुड़ गए। विभिन्न रूप एवं नामधारी इन प्रतीकों में मुद्रा या मुहर, राज-मुद्रा, बिल्ला या बैज, कुल-चिह्न, फलक, पताका, वैजयंती, रण-पताका, पोत-ध्वज, ध्वजा, ध्वज तथा झंडा आदि उल्लेखनीय है।

आधुनिकतम खोजों के आधार पर यह प्रायः निश्चित है कि ध्वज या झंडे का आविष्कार सबसे पहले भारत और चीन में हुआ। भारत में ध्वज तथा ध्वजा शब्द बहुत प्राचीन हैं जिनका प्रयोग हमारे प्राचीनतम ग्रंथ )ग्वेद से ही मिलने लगता है। वैदिक इंडैक्स के अनुसार ;देखिए मेकडौनेल और कीथ द्वारा संपादित वैदिक इंडैक्स में ध्वज शब्द) ऋग्वेद में ध्वजशब्द  दो बार (7-85-2; 10-103-11) आया है। ऋग्वेद  (7-85-2) से यह उद्धरण देखिए :

स्पर्धन्ते वा उ देव हूये अत्र येषु ध्वजेषु दिद्यतः पतन्ति

अर्थात्- ‘‘जहाँ विजय की इच्छा करने वाले वीर स्पर्धा करते हैं, वहाँ संग्राम में तीक्षण अस्त्र ध्वजों पर गिरते हैं।’’ इसी प्रकार का भाव )ग्वेद के 10 वें मंडल के, 103 वें सूक्त के 11 वें मंत्र में है। इससे स्पष्ट है कि ध्वज शब्द का प्रथम प्रयोग सेना के संदर्भ में हुआ है। सेनाएँ सदा अपना ध्वज लेकर चलती थीं इसी कारण सेना के लिए सं॰ में ध्वजिनी शब्द का प्रयोग भी होता है। 
महाकाव्यों में वर्णित युद्धों में भी ध्वज का अत्यधिक महत्त्व पाया जाता है। उदाहरण के लिए बाल्मीकि रामायण (2-67-26) में उल्लेख है कि ध्वजरथ पर गडे़ स्तंभ में लगे होते थे। महाभारत (कर्ण पर्व - 33-4) में भी वैकर्तन कर्ण द्वारा किन्हीं की ध्वजा के टुकड़े-टुकड़े कर देने का वर्णन मिलता है। परम्परा से चले आ रहे चित्रों में, महाभारत के यु( में अर्जुन के रथ पर हनुमान का ध्वज लगा दिखाई देता है। प्राचीन काल के लिच्छवि, यौधेय तथा मत्स्य आदि गणों के अलग-अलग ध्वजों का उल्लेख भी मिलता है। 

जैसा कि ऊपर संकेत किया जा चुका है, झंडा किसी राष्ट्र, समुदाय, सेना, गण या व्यक्ति का प्रतीक या राज-चिह्न रहा है। आरम्भ में इसका प्रयोग अधिकांशतः युद्ध के समय होता था ताकि मित्र और शत्रु को पहचाना जा सके। युद्ध में रथों और हाथियों पर तो झंडा फहराया ही जाता था, घुड़सवार भी झंडा रखते थे। झंडे का गिर जाना, झुक जाना या न दिखना पराजय का, या कम से कम अव्यवस्था या गड़बड़ी का प्रतीक आवश्य होता था। राजा के हाथी या रथ पर लगे ध्वज की रक्षा के लिए उसके आस-पास अनेक सैनिक रहते थे।
यहाँ यह जानना भी रोचक होगा कि किसी भी देश के झंडे के रंग तथा डिजाइन मन-मर्जी से तय नहीं हुए हैं बल्कि इनके मूल में उस देश की दीर्घ कालीन धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक परम्पराएं होती हैं। अनेक स्थितियों में तो बहुत से परिवर्तनों के बाद ही किसी झंडे का अंतिम रूप निश्चित हो पाया है। हमारे राष्ट्र-ध्वज का वर्तमान रूप भी अनेक परिवर्तनों के बाद स्थिर हुआ है। वस्तुतः भारतीय राष्ट्र-ध्वज की विकास यात्रा काफी लंबी है जिसकी शुरूआत सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से होती है। मेरठ से आरंभ हुए इस संग्राम के क्रांतिकारियों ने दिल्ली को घेर कर नाममात्र के बादशाह, बहादुरशाह ज़फ़र को इस संग्राम का नेतृत्व करने को बाध्य कर दिया। बहादुरशाह ने आजादी के इस संग्राम का अनिच्छा से नेतृत्व किया और इसके प्रतीक रूप में जो झंडा उठाया वह हरे रंग का था जिसके बाएं ओर कोने में एक कमल का फूल बना था, दाएं तरफ नीचे कोने में एक चपाती बनी थी और चारों ओर स्वर्णिम झालर लगी थी। आजादी का वह संग्राम असफल रहा और बहादुरशाह को कै़द करके रंगून ;यांगूनद्ध की जेल में भेज दिया गया और इसके साथ ही वह ध्वज भी समाप्त हो गया। 

जब अंग्रेज इस संग्राम में विजयी हो गए तो उन्होंने इस ब्रिटिश राज्य ;भारतद्ध के लिए एक ऐसे झंडे के निर्माण की बात सोची जो ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक बन सके और जिसके साथ इस देश के सब लोग भी जुड़ सकें। इस दिशा में पहला प्रयास विलियम कोल्डस्ट्रीम नाम के इंडियन सिविल सेवा के एक ब्रिटिश अधिकारी ने किया लेकिन उसके बनाए झंडे को लॅार्ड कर्जन द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। आरम्भ में ऐसे झंडे के निर्माण में सुझाव देने के लिए बाल गंगाधर तिलक, अरविन्द घोष, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की भूमिका, प्रमुख रही और इस पर अंकित करने के लिए गणेश, काली ;माँद्ध तथा गऊ ;माताद्ध की आकृतियां सुझाई गई जो उस समय चल रहे धार्मिक आंदोलनों से प्रेरित थीं। क्योंकि ये सभी चिह्न हिन्दू परम्पराओं पर केन्द्रित थे और देश की मुस्लिम आबादी को इन पर एतराज था, इसलिए स्वीकार नहीं किए जा सके। लेकिन राष्ट्र-ध्वज निमार्ण के ये प्रयास जारी रहे। 

सन् 1905 में हिन्दू धर्म सुधारक और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने लाल रंग का एक वर्गाकार ध्वज तैयार कराया। इसका लाल रंग स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक था, जिसके चारों ओर एक सौ आठ ज्योतियों या दीपकों की माला थी और बीच में देवराज इन्द्र का वज्र था। वज्र के बाएँ ओर पीले रंग में बंगला भाषा में, वन्दे तथा दाएँ ओर मातरम् लिखा हुआ था। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान पहला तिरंगा झंडा सन् 1906 में बनाया गया। इस झंडे में एक जैसी लंबाई-चौडा़ई वाली तीन पट्टियां थीं। सबसे ऊपर हरी, बीच में पीली तथा नीचे लाल। हरे रंग की पट्टी पर कमल के आठ  फूल बनाये गये थे जो अर्धविकसित थे। पीले रंग की पट्टी पर नीले रंग में, देवनागरी लिपि में, वन्देमातरम् लिखा गया था और सबसे नीचे लाल पट्टी पर सफेद रंग में बाएँ तरफ सूर्यका और दाएँ तरफ अर्धचंद्रका रेखाचित्र बना हुआ था। यह ध्वज पहली बार 7 अगस्त 1906 को कोलकाता के पारसी बागान स्क्वेअर् में फहराया गया और कोलकाता-ध्वज के रूप में प्रसि( हुआ। इसी ध्वज का थोड़ा परिवर्तित रूप मादाम भीकाजी रुस्तम कामा ने विदेश में तैयार करवाया। इसमें और कोलकाता ध्वज में केवल इतना अन्तर था कि कोलकाता ध्वज में जहाँ अर्धविकसित कमल बने थे वहाँ इसके कमल विकसित थे। कोलकाता ध्वज में सूर्य और अर्धचंद्र के स्कैच या रेखाचित्र बने थे जबकि इसमें चित्र थे।


यह झंडा सर्वप्रथम 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में मादाम कामा के द्वारा ही फहराया गया। इसी क्रम में सन् 1916 में मच्छिलीपट्टणम के एक किसान पिंगली वैंकैया ने मद्रास हाई कोर्ट के सदस्यों के आर्थिक सहयोग से झंडे के तीस नए डिजाइन पेश किए जो एक पुस्तिका के रूप में थे। इनमें से कोई भी स्वीकार नहीं किया जा सका लेकिन इसने इतनी भूमिका जरूर निभाई कि ध्वज आंदोलन को जारी रखा। स्वाधीनता संघर्ष के अगले पड़ाव के रूप में, सन 1917 में होमरूल लीग के नेता बाल गंगाधर तिलक और श्रीमती एनी बेसेन्ट ने एक नये झंडे की रूपरेखा तैयार करवायी। इसमें लाल और हरी के क्रम से नौ पट्टियाँ थी, पाँच लाल और चार हरी। नीचे की छः पट्टियों में फैला हुआ सप्तर्षि या सात तारों का समूह अंकित था और ऊपर की तीन पट्टियां के दाएँ ओर एक अर्धचंद्र, और इसके ऊपर एक तारा बना हुआ था। झंडे के बाई ओर, ऊपर के कोने में ब्रिटिश सत्ता का प्रतिनिधित्व करता हुआ यूनियन जैक बना हुआ था। होमरूल लीग का यह झंडा भी प्रचलित नहीं हो सका क्योंकि इस पर कोयम्बटूर के मजिस्ट्रेट ने पाबंदी लगा दी। इस पाबंदी से राष्ट्रीय ध्वज की महत्ता और आवश्यकता पर बहस और भी तेज हो गई।

1921 में महात्मा गांधी ने अपने पत्र यंग इंडियामें भारतीय ध्वज की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसका खाका सुझाया, जिसके केन्द्र में चरखा जिसका विचार मूलतः लाला हंसराज ने दिया थाद्ध हो, हिन्दुओं को दर्शाने वाली लाल पट्टी हो और मुसलमानों की प्रतीक हरी पट्टी हो। उन्होंने ऐसा एक झंडा तैयार करने का काम पिंगली वैंकैया को ही सौंपा था। लेकिन इस झंडे का सिक्खों तथा अन्य धर्मों द्वारा विरोध हुआ और 1929 में एक अधिक धर्मनिर्पेक्ष रूप तैयार किया गया। सन् 1931 में एक फ्लैग कमेटी बनाई गई और इसने एक ध्वज का प्रारूप तैयार किया। इसके अतिरिक्त 1931 में ही इंडियन नेशनल कांग्रेस का चरखे वाला झंडा बनाया गया। यह कहानी चलती रही और अंततः इंडियन नेशनल कांग्रेस के ध्वज के आधार पर  चरखे के स्थान पर अशोक चक्र वाले, ध्वज का प्रारूप तैयार किया गया। उसी प्रारूप को पं॰ जवाहर लाल नेहरू ने 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में पेश किया। इस प्रारूप को संविधान सभा ने स्वीकृति प्रदान की और तभी से यह हमारा राष्ट्र-ध्वज बन गया।

संसार भर के ध्वजों के ऐसे विकास क्रमों और उनके लम्बे इतिहास को देखते हुए अब तो ध्वजों या पताकाओं के तर्कपूर्ण अध्ययन पर आधारित ज्ञान की एक शाखा भी विकसित हो गई जिसे वैक्सिलॉलॉजी ;अमगपससवसवहलद्ध कहा जाता है। यह शब्द लैटिन भाषा के दे षब्दों अमगपससनउ ;=ध्वज, ध्वजा, पताका तथा सवहल ;=शास्त्र, विद्या के योग से बना है। हिन्दी में इसे ध्वज शास्त्र या ध्वज विज्ञान कहा जा सकता है।
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