Thursday, 11 January 2018

विवाद की जड़ पुरातन गौरव तो नहीं

खबर हैं कि महाराष्ट्र में पुणे के नजदीक कोरेगांव भीमा में दलितों पर हुए कथित हमले के बाद मंगलवार को महाराष्ट्र के कई इलाकों में दलित संगठनों ने प्रदर्शन किया. कोरेगांव भीमा की घटना के 200 साल पूरे होने की खुशी में सोमवार को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी थी. घटना में एक शख्स की मौत हो गई.
मंगलवार दोपहर तीन बजे के आसपास मुंबई के चेंबूर, गोवंडी और घाटकोपर इलाकों में रास्ता जाम किया गया और पत्थरबाजी हुई. इन इलाक़ों में दलित आबादी काफी है. प्रदर्शनकारियों ने आगजनी भी की. पुणे के पिंपरी में शाम साढ़े पांच बजे के आसपास चक्काजाम शुरू हुआ और कई कारों को आग लगा दी गई. पुणे में मुख्यमंत्री फडणवीस को एक कार्यक्रम में शामिल होना था लेकिन इसे रद्द कर दिया गया. बुधवार को विपक्ष के नेता इस मामले में काफी नाराज दिखे उन्होंने लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के सामने कागज पर लिखे विरोध पत्र को पढ़कर सबको सुनाया.
हो सकता है एक दो दिन में भड़की हिंसा शांत हो जाये, धारा 144 हट जाये, जनजीवन सामान्य होकर ऑटो रिक्शा वाला बिना जाति-मजहब का सवाल किये सवारी उठाए, लेकिन जातिवाद का ये हिंसा और तांडव बर्षो तक नेता याद दिला-दिलाकर वोट जरुर लेते रहेंगे.

जातीय गर्व और उनकी मांग की बात करें तो हरियाणा में जाट आन्दोलन हुआ 28 मरें, गुजरात में पटेल आन्दोलन, दार्जलिंग में भाषा और क्षेत्र के लिए आग लगाई गयी, ऊना में दलितों की पिटाई करके कथित गौरक्षक दलों का छलकता गर्व सबने वीडियो में देखा ही था. इसके बाद बाबाओं की भक्ति ने भी कुछ जाने ली. पिछले साल जातीय गौरव ने ही सहारनपुर के शब्बीरपुर में आग लगाई थी. . कल सुखबीर फल वाला कह रहा था कि भाई लोकतंत्र में वोटों की बंदरबाट युहीं होती है देश में दो तरह के लोग ज्यादा मरते है एक तो वो जो बाट जोह रहे होते है कि सरकार हमारे लिए कुछ करेगी और दूसरा वो जो यह सोचकर देश में आग लगाते है कि चलो हम ही कुछ करते है.

कहा जा रहा है दो सौ साल पहले हुए भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी. हर साल यह दिन बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता रहा है. पर इस वर्ष फिजा बिगड़ गयी जिस पर मायावती ने कहा, महाराष्ट्र में कार्यक्रम के दौरान सरकार को सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए थी. ये नहीं चाहते कि दलित वर्ग के लोग अपने इतिहास को बरकरार रखें. ये नहीं चाहते हैं कि दलित सम्मान और गर्व के साथ जिंदगी बिताएं.

पता नहीं नेताओं और मीडिया में कौन ज्यादा दूध का धुला है पर मायावती के इस बयान के बाद मामला समझ में आ गया कि देश में जातिवादी राजनीति करने वाले नेता इतिहास से गर्व और गौरव टटोलकर लोगों को थमा रहे है. पर दूसरी बात ये समझ से परे है कि लोगों को रोटी, मकान, दवा या रोजगार की जरूरत है या ऐतिहासिक पुरातन गर्व की? किसी की समझ में आ जाये तो मेरे जैसे संता-बंता, पप्पू, बिट्टू टाइप के लोगों को जरुर बताना. मैं भी किसी भूखे नंगे को एक दो कटोरी पुरातन गर्व और इतिहास थमा दूंगा.

कुछ लोग कह रहे कि दलितों का अंग्रेजों के साथ मिलकर पेशवाओं को हराने में अपने ही भाई बंधुओं से लड़ने में कैसा गर्व? बात भी सही है. ये बिलकुल ऐसा ही है जैसे 21 बार धरती को क्षत्रीय विहीन करने वाले महापुरुष भगवान की जयंती मनाना, गर्व से कहना की हमने 21 बार इस धरा को क्षत्रियों से विहीन कर दिया था.
पता नहीं उन क्षत्रियों की मौत का गर्व मनाना कौनसी मानवता है यदि है तो फिर पेशवाओं की हार को अपमान क्यों समझ रहे हो यदि एतिहासिक गर्व ही चाहिए तो संविधान के अनुसार सबको जातीय गर्व मनाने में समानता का अधिकार होना चाहिए ना?

पर ये बात कौन करें? देश की संसद को और बहुतेरे काम है इसलिए अब देश में धर्म संसद शुरू हो गयी है वो बता रही है कि कि हिंदू मोबाइल फोन फेंककर अपने हाथों में शस्त्र धारण करें, सब कुछ इसी तरह गर्व के साथ चलता रहा तो कुछ दिन बाद जातीय संसद फिर उपजातीय संसद भी शुरू हो जाएगी भगवान ने चाहा तो ज्यादा दिन नहीं लगेंगे विश्व गुरु को कबीलो में तब्दील होने में. सुखबीर फल वाले की माने तो यहां दो तरह के लोग हैं एक तो वह जिन्हें मौका मिल गया. दूसरा वह जिन्हें अभी मौका नहीं मिला. फुल स्टॉप ...लेख राजीव चौधरी 




जरूरी और मजबूरी के बीच झूलती हमारी भाषायी संवेदना

डॉ. विनोद बब्बर

गत दिवस राष्ट्रपति जी ने केरल उच्च न्यायालय के एक समारोह में न्याय को जनता की भाषा में लाने के पक्ष में आवाज बुलंद करते हुए  कहा कि उच्च न्यायालय अंग्रेजी में निर्णय देते हैं लेकिन जो लोग अंग्रेजी को अच्छे से नहीं समझ पाते उनके लिए न्यायालयों द्वारा स्थानीय भाषाओं में निर्णय की प्रमाणित अनुवादित प्रतियां 24 घण्टे में उपलब्ध कराई जानी चाहिएं।  जब महामहिम राष्ट्रपति जी भारतीय भाषाओं पर हावी अंग्रेजी के तिलस्म को तोड़ने के पक्ष में आवाज उठा रहे थे लगभग उसी समय दिल्ली नगर निगम द्वारा अगले सत्र से अपने स्कूलों में पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने का निर्णय सामने आया। प्रथम दृष्टया ये दोनो बाते परस्पर विरोधी प्रतीत होती हैं। कहा जा सकता है कि देश के सर्वोच्च  पद पर विराजमान व्यक्तित्व अंग्रेजी के स्थान पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर है तो देश की सबसे बड़ी पार्टी के शासन वाले राज्य में अबोध बच्चों पर अंग्रेजी लादी जा रही है।  गंभीरता से विचार किया जाये तो यह तथ्य हमारे सामने आता है कि राष्ट्रपति जी ने जो कहा वह जरूरीहै जबकि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने की बात मजबूरीहै।

दिल्ली सहित देश के महानगरों में पिछले कुछ दशकों में पब्लिक स्कूलसंस्कृति बहुत तेजी से फैली हैं। गली-गली निजी स्कूल खुल गये हैं जो अंग्रेजी माध्यमहोने का दावा करते हैं। यहां प्रवेश पाकर गुड मार्निंगऔर एक-दो पाईम रटने वाले अपने छोटे-छोटे बच्चों को देख फूले नहीं समाते। इसे दुर्भाग्य कहे या मजबूरी लेकिन सत्य यही है कि केवल मध्यम वर्ग ही नहीं, निम्न-मध्यम वर्ग, यहां तक कि किराये के मकान में रहकर किराये का रिक्शे चलाने वाले, पटरीवाले भी अपने बच्चे को बेशक दबड़ेनुमा स्कूल ही क्यों न होलेकिन अंग्रेजीमाहौल से जोड़ना चाहते हैं। इसलिए यह कोई आश्चर्य नहीं कि दिल्ली नगर निगम के प्राथमिक कक्षाओं के छात्रों की संख्या दिल्ली के कुल छात्रों का एक चैथाई भी नहीं है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यह है कि तीन -चैथाई से अधिक प्राथमिक कक्षाओं के छात्र पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ रहे हैं या झेल रहे हैं।
यह जानते हुए भी कि मातृभाषा में विद्यार्थी को अपना विषय समझने में सरलता और सुगमता होती है। जबकि विदेशी भाषा में विषय काफी समय तक समझ में नहीं आते या आधे- अधूरे ही आते हैं। उस पर अंग्रेजी की अवैज्ञानिक वर्तनी और उच्चारण को सीखने में वर्षों लग जाते हैं। समय-समय पर बनाये गये विभिन्न आयोगों ने भी अपनी सिफारिशों में इसी बात पर बल दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात यह कि अपने- अपने समय में हर दल की सरकार ने इन सिफारिशों को ठण्डे बस्ते के हवाले करना ही उचित समझा।

एक विशेष बात यह कि अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करते हुए बच्चा अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संस्कार संग देशभक्ति सहजता से ग्रहण कर लेता है।हम केवल उपरी मन से अपनी भाषाओं की बात करते हैं परंतु अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजते हैं। उस पर तर्क यह कि केवल मेरे बच्चे थोड़े ही पब्लिक स्कूल जाते हैं।या केवल मेरे करने से क्या फर्क पड़ने वाला है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ‘विदेशी भाषा सीखना जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना बेहतर है, मातृ-भाषा विदेशी भाषा सीखने के राह में रुकावट है, विदेशी भाषा सीखने का अच्छा तरीका इसका शिक्षा के माध्यम होना चाहिए।को अंधविश्वास बताया है। जबकि वास्तविकता यह है कि मातृ-भाषा की मजबूत नींव से विदेशी भाषा बेहतर सीखी जा सकती है। यह सर्वविदित है कि आचार्य विनोबा भावे ने देवनागरी के माध्यम से अनेक विदेशी भाषाएं सीखी। विदेशी माध्यम से बालमन पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है। ऐसे में बच्चा आधा तीतर, आधा बटेरहोकर न तो ढ़ंग से मातृभाषा सीखा पाता है और न ही विदेशी भाषा।जहां तक राजकीय विद्यालयों का प्रश्न है, वहां प्रतिदिन मिड डे मील, मुफ्त पुस्तकंे, मुफ्त बस्ता, सर्दी में मुफ्त स्वेटर, कुछ वर्गों को आर्थिक अनुदान, वजीफा सहित बहुत कुछ दिया जाता है। इसके बावजूद दिल्ली नगर निगम के स्कूलों से मध्यम वर्ग पहले ही दूरी बना चुका है अतः वहां किस वर्ग के बच्चे हाजिरी लगाते हैं, यह कोई पहेली नहीं है। आरोप यह भी है कि कुछ लोग यहां अंग्रेजी लाने के इसलिए विरोधी है ताकि अंतर बना रहे। लेकिन वास्तविकता यह है कि जो लोग इन चन्द अंग्रेजी रहित स्कूलों में अंग्रेजी लादने का विरोध कर रहे हैं वे समस्या का केवल एक पक्ष देख अथवा दिखा रहे हैं।  क्या मात्र इन स्कूलों को अंग्रेजी से दूर रखना समस्या का समाधान हैं? वे यह क्यों नहीं जानना चाहते कि इन स्कूलों में छात्रों का प्रतिशत लगातार क्यों गिर रहा है? क्या इसका कारण इन स्कूलों में पढ़ाई के स्तर के साथ-साथ अंग्रेजी का  न होना नहीं है? अधिसंख्यक लोगों के व्यवहार और वातावरण के साथ चलना आम आदमी की मजबूरी है। एक रिक्शा चालक, घर-घर जाकर बर्तन साफ करने वाली, सफाई करने वाले, कपड़े धोने वाले, सब्जी बेचने वाले का वास्ता हर क्षण ऐसे लोगों से पड़ता है जो सड़सठनहीं समझते। उनके लिए सिक्सी ऐट जानना जरूरी है। सच तो यह है कि वे ग्यारह, बारह क्या दो, तीन, चार भी नहीं जानते। उनके साथ संवाद, व्यवहार, व्यापार, लेन-देन करने के लिए उन्हें भी गलत या सही अंग्रेजी सीखने की आवश्कता महसूस होती है। जो स्वयं अंग्रेजी नहीं सीख सके वे अपने बच्चों को सिखाना चाहते हैं। अतः उनका सरकार पर दबाव है कि उन स्कूलों में भी अधिकांश स्कूलों की तरह अंग्रेजी होनी चाहिए।  ऐसी मांग करने वालों की मजबूरी को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

यह कहना अपनी जगह सही हो सकता है कि नगर निगम के स्कूलों को निजी स्कूलों से मुकाबला करने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेने की कोई जरूरत नहीं है।  पढ़ाई का स्तर सुधार कर वे उन स्कूलों से बेहतर परिणाम दे सकते है। दरअसल इस तर्क में आवाज जरूर है। परंतु लड़खड़ाती हुई कमजोर आवाज। वास्तव में केवल शिक्षा में ही नहीं, जीवन के हर स्तर पर तुलना का दौर है। लगभग सभी सरकारी स्कूल निजी स्कूलों से तुलना करते हुए अपने छात्रों के गले में टाई तो बंधवा ही चुके हैं। वेशभूषा से परिवेश तक हर जगह तुलना की परिपाटी के बीच आप अंग्रेजी सीखने की मजबूरी को नजरअदाज कैसें कर सकते हैं?
अनेक विद्वान, शिक्षाविद इन स्कूलों में प्रथम कक्षा से अंग्रेजी लागू करने की कड़ी आलोचना कर रहे हैं। विश्व के अनेक देशों के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। लेकिन  वे जरा अपने मन को टटोल कर उत्तर जानने की कोशिश करें कि  क्या यहां शेष परिस्थितियां उन देशों जैसी हैअपनी शासन प्रणाली, संविधान, अपनेे नेताओं का आचरण, संसाधन, परिवेश, अपरिपक्वता तथा विभिन्न वर्गो में बंटे समाज और सबसे बड़ी बात नैतिकता के बड़े -बड़े दावे करने वालों के खोखले चरित्र को बदले बिना इस भाषायी पाखंड को कैसे दूर किया जा सकता है?

 यह भी विचारणीय है कि क्या मात्र इन स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर अंग्रेजी रोकना पर्याप्त हैं? अगर अंग्रेजी को इस स्तर पर रोकना है तो देश के सभी स्कूलों में चाहे वे राजकीय हो अथवा निजी प्राथमिक शिक्षा का माध्यम केवल स्थानीय भाषा और छठी से स्थानीय भाषा के साथ हिंदी को किया जाना चाहिए। जिसे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्विस, रसियन या अन्य विश्व की कोई भी भाषा सीखनी या सिखानी हो वह उसे एक विषय के रूप में ऐसा कर सकता है।
बहुत संभव है एक बहुत बड़ी लाबी जो अंग्रेजी को आधुनिक ज्ञान की बैकबोनमानती है वे इस प्रस्ताव के विरोध में आसमान सिर पर उठा लें। उनके लिए अंग्रेजी के बिना विश्व से नाता
टूट जायेगा। बेशक जर्मन, जापान, चीन, रसिया  आदि अधिकांश देश अंग्रेजी के बिना आसमान छू सकते हो लेकिन भारत में अंग्रेजी नहीं रही तो प्रलय हो जायेगी। शिक्षा का माध्यम चुनने की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बताने वाले अपनी करनी से बाज नहीं आयेगे तो क्यों न लोकतंत्र में बहुमत के बल पर भारतीय भाषाओं के पक्षधर सभी राजनैतिक दलों पर सरकारी नौकरियों केवल उन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वालों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाने का दबाव बनाये। यदि यह संवैधानिक प्रावधान कर दिया जाये तो अंग्रेजी की मजबूरी से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।

हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि बेशक भाषा संवाद का माध्यम है लेकिन उसका रोजी -रोटी से भी संबंध होता है। जिस भाषा की जानकारी का रोजगार से कोई संबंध होगा, आप लाख चाहकर भी उसे आगे बढ़ने से नहीं रोक सकते। शायद राष्ट्रपति जी के मन में भी जरूर यह विचार रहा होगा कि अपनी भाषाओं का रक्षण जरूरी है। उन्होंने अपने जीवन में कठिनाईयों को बहुत करीब से देखा है अतः उनकी अभिव्यक्ति साधारण से साधारण भारतीय के प्रतिनिधि की आवाज है। वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर अपनी भाषाओं की अनदेखी करते हुए विदेशी भाषा को तरजीह दी गई तो सामान्यजन के मन में विदेशी भाषा के प्रति आकर्षण का रोका नहीं जा सकता। निश्चित रूप से आरंभिक शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रभाषा: मनन-मंथन-मंतव्य

संजय भारद्वाज 
(अध्यक्ष-हिंदी आंदोलन परिवार  )

भाषा का प्रश्न समग्र है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देनेवाली वाणी है। किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए। इस सूत्र को भारत पर शासन करने वाले विदेशियों ने भली भॉंति समझा। आरंभिक आक्रमणकारियों ने संस्कृत जैसी समृद्ध और संस्कृतिवाणी को हाशिए पर कर अपने-अपने इलाके की भाषाएं लादने की कोशिश की। बाद में सभ्यता की खाल ओढ़कर अंग्रेज आया। उसने दूरगामी नीति के तहत भारतीय भाषाओं की धज्जियॉं उड़ाकर अपनी भाषा और अपना हित लाद दिया। लद्दू खच्चर की तरह हिंदुस्तानी उसकी भाषा को ढोता रहा। अंकुश विदेशियों के हाथ में होने के कारण वह असहाय था।


यहॉं तक तो ठीक था। शासक विदेशी था, उसकी सोच और कृति में परिलक्षित स्वार्थ व धूर्तता उसकी सभ्यता के अनुरुप थीं। असली मुद्दा है स्वाधीनता के बाद का। अंग्रेजी और अंग्रेजियत को ढोते लद्दू खच्चरों की उम्मीदें जाग उठीं। जिन्हे वे अपना मानते थे, अंकुश उनके हाथ में आ चुका था। किंतु वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि अंतर केवल चमड़ी के रंग में हुआ था। फिरंगी देसी चमड़ी में अंकुश हाथ में लिए अब भी खच्चर पर लदा रहा। अलबत्ता आरंभ में पंद्रह बरस बाद बोझ उतारने का "लॉलीपॉप' जरुर दिया गया। धीरे-धीरे "लॉलीपॉप' भी बंद हो गया। खच्चर मरियल और मरियल होता गया। अब तो देसी चमड़ी के फिरंगियों की धूर्तता देखकर गोरी चमड़ी का फिरंगी भी दंग रह गया है।

प्रश्न है कि जब राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा माना जाता है तो क्या हमारी व्यवस्था को एक डरा-सहमा लोकतंत्र अपेक्षित था जो मूक और अपाहिज हो? विगत वर्षों का घटनाक्रम देखें तो उत्तर "हॉं' में मिलेगा। 
राष्ट्रभाषा को स्थान दिये बिना राष्ट्र के अस्तित्व और सांस्कृतिक अस्मिता को परिभाषित करने की चौपटराजा प्रवृत्ति के परिणाम भी विस्फोटक रहे हैं। इन परिणामों की तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों में अनुभव की जा सकती है। इनमें से कुछ की चर्चा यहॉं की जा रही है।

राष्ट्रभाषा शब्द के तकनीकी उलझाव और आठवीं अनुसूची से लेकर सामान्य बोलियों तक को राष्ट्रभाषा की चौखट में शामिल करने के शाब्दिक छलावे की चर्चा यहॉं अप्रासंगिक है। राष्ट्रभाषा से स्पष्ट तात्पर्य देश के सबसे बड़े भूभाग पर बोली-लिखी और समझी जाने वाली भाषा से है। भाषा जो उस भूभाग पर रहनेवाले लोगों की संस्क़ृति के तत्वों को अंतर्निहित करने की क्षमता रखती हो, जिसमें प्रादेशिक भाषाओं और बोलियों से शब्दों के आदान-प्रदान की उदारता निहित हो। हिंदी को उसका संविधान प्रदत्त पद व्यवहारिक रूप में प्रदान करने के लिए आम सहमति की बात करने वाले भूल जाते हैं कि राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाषा अनेक नहीं होते। हिंदी का विरोध करने वाले कल यदि राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगीत पर भी विरोध जताने लगें, अपने-अपने ध्वज फहराने लगें, गीत गाने लगें तो क्या कोई अनुसूची बनाकर उसमें कई ध्वज और अनेक गीत प्रतिष्ठित कर दिये जायेंगे? क्या तब भी यह कहा जायेगा कि अपेक्षित राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज आम सहमति की प्रतीक्षा में हैं? भीरु व दिशाहीन मानसिकता दुःशासन का कारक बनती है जबकि सुशासन स्पष्ट नीति और पुरुषार्थ के कंधों पर टिका होता है।

सांस्कृतिक अवमूल्यन का बड़ा कारण विदेशी भाषा में देसी साहित्य पढ़ाने की अधकचरी सोच है। राजधानी के एक अंग्रेजी विद्यालय ने पढ़ाया- Seeta was sweetheart of Rama! ठीक इसके विपरीत श्रीरामचरित मानस में श्रीराम को सीताजी के कानन-कुण्डल मिलने पर पहचान के लिए लक्ष्मणजी को दिखाने का प्रसंग स्मरण कीजिए। लक्ष्मणजी का कहना कि मैने सदैव भाभी मॉं के चरण निहारे, अतएव कानन-कुण्डल की पहचान मुझे कैसे होगी?- यह भाव संस्कृति की आत्मा है। कुसुमाग्रज की मराठी कविता में शादीशुदा बेटी का मायके में "चार भिंतीत नाचली' का भाव तलाशने के लिए सारा यूरोपियन भाषाशास्त्र खंगाल डालिये। न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।

शिक्षा के माध्यम को लेकर बनी शिक्षाशास्त्रियों की अधिकांश समितियों ने प्राथनिक शिक्षा मातृभाषा में देने की सिफारिश की। यह सिफारिशें आज कूड़े-दानों में पड़ी हैं। त्रिभाषा सूत्र में हिंदी, प्रादेशिक भाषा एवं संस्कृत/अन्य क्षेत्रीय भाषा का प्रावधान किया जाता तो देश को ये दुर्दिन देखने को नहीं मिलते। अब तो हिंदी को पालतू पशु की तरह दोहन मात्र का साधन बना लिया गया है। सिनेमा में हिंदी में संवाद बोलकर हिंदी की रोटी खानेवाले सार्वजनिक वक्तव्य अंग्रेजी में करते हैं। जनता से हिंदी में मतों की याचना करनेवाले निर्वाचित होने के बाद अधिकार भाव से अंग्रेजी में शपथ उठाते हैं।

छोटी-छोटी बात पर और प्रायः बेबात संविधान को इत्थमभूत धर्मग्रंथ-सा मानकर अशोभनीय व्यवहार करने वाले छुटभैयों से लेकर कथित राष्ट्रीय नेताओं तक ने कभी राष्ट्रभाषा को मुद्दा नहीं बनाया। जब कभी किसीने इस पर आवाज़ उठाई तो बरगलाया गया कि भाषा संवेदनशील मुद्दा है। तो क्या देश को संवेदनहीन समाज अपेक्षित है? कतिपय बुद्धिजीवी भाषा को कोरी भावुकता मानते हैं। शायद वे भूल जाते हैं कि युद्ध भी कोरी भावुकता पर ही लड़ा जाता है। युद्धक्षेत्र में "हर-हर महादेव' और "पीरबाबा सलामत रहें' जैसे भावुक (!!!) नारे ही प्रेरक शक्ति का काम करते हैं। यदि भावुकता से राष्ट्र एक सूत्र में बंधता हो, व्यवस्था शासन की दासता से मुक्त होती हो, शासकों की संकीर्णता पर प्रतिबंध लगता हो, अनुशासन कठोर होता हो तो भावुकता देश के लिए अनिवार्य होनी चाहिए।

वर्तमान में सीनाजोरी अपने चरम पर है। काली चमड़ी के अंग्रेज पैदा करने के लिए भारत में अंग्रेजी शिक्षा लानेवाले मैकाले के प्रति नतमस्तक होता आलेख पिछले दिनों एक हिंदी अखबार में पढ़ने को मिला। यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जनरल डायर और जनरल नील-छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के स्थान पर देश में शौर्य के प्रतीक के रूप में पूजे जाने लगेंगे।
सामान्यतः श्राद्धपक्ष में आयोजित होनेवाले हिंदी पखवाड़े के किसी एक दिन हिंदी के नाम का तर्पण कर देने या सरकारी सहभोज में सम्म्मिलित हो जाने भर से हिंदी के प्रति भारतीय नागरिक के कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो सकती। आवश्यक है कि नागरिक अपने भाषाई अधिकार के प्रति जागरुक हों। वह सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रभाषा को राष्ट्र भर में मुद्दा बनाएं। 
अस्सी के  दशक में अफ्रीका का एक छोटा सा देश आज़ाद हुआ। मंत्रिमंडल की पहली बैठक में निर्णय लिया गया कि देश आज से "रोडेशिया' की बजाय "जिम्बॉब्वे' कहलायेगा। राजधानी "सेंटलुई' तुरंत प्रभाव से "हरारे' होगी। नई सदी प्रतीक्षा में है कि कब "इंडिया'की केंचुली उतारकर "भारत' बाहर आयेगा। आवश्यकता है महानायकों के जन्म की बाट जोहने की अपेक्षा भीतर के महानायक को जगाने की। अन्यथा भारतेंदु हरिशचंद्र की पंक्तियॉं - "आवहु मिलकर रोवहुं सब भारत भाई, हा! हा! भारत दुर्दसा न देखन जाई!' क्या सदैव हमारा कटु यथार्थ बनी रहेंगी?


क्या भारत सच में एक इतिहास बनकर रह जायेगा?

हो सकता हैं लोगों में उफनती राष्ट्रीय गर्व की भावना का पारा कुछ देर के लिए लुढ़क जाये, झूठे और गर्वीले न्यूज से ओतप्रोत लोग मुझे नकारात्मक समझे। पर मुझे विश्वास है कुछ लोग ऐसे भी जरूर होंगे जो इस सच को स्वीकार करेंगे। क्योंकि बीमारी का इलाज तभी सम्भव होता है जब वह बीमारी मरीज द्वारा स्वीकार कर ली जाती है। इस बात को कौन अस्वीकार कर सकता है कि नेताओं की वजह से आज देश जातिवाद के घोर दलदल में धंसता जा रहा है? सहरानपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलित और राजपूत हिंसा की आंच अभी ठीक से ठंडी भी नहीं हुई थी कि अचानक महाराष्ट्र के पुणे से शुरू हुआ जातीय हिंसा का दौर मुम्बई और कई अन्य शहरों तक पहुंच गया है। जगह-जगह पथराव और आगजनी का दौर जारी हुआ, मुम्बई के उपनगरों चेंबूर, कुर्ला, मुलुंड और ठाणे के अलावा हड़पसर और फुरसुंगी में पथराव और आगजनी की कई घटनाएं हुईं। कई जगह दुकानों और ऑफिसों को आग के हवाले कर दिया गया।


ऐसे में जानना जरूरी है कि ये सारा विवाद है क्या और क्यों? अचानक महाराष्ट्र प्रतिशोध की आग में धधकने लगा है? महाराष्ट्र के पुणे में यह सारा विवाद अंग्रेजों और पेशवाओं के बीच हुए युद्ध के 200 साल पूरे होने को लेकर हुआ है। जिसमें एक जनवरी 1818 में अंग्रेजों ने दलितों की सहायता से पेशवा द्वितीय को शिकस्त दे दी थी। पुणे के कोरेगांव के जय स्तंभ पर हर साल यह उत्सव मनाया जाता है। दलित इसे शौर्य दिवस के तौर पर मनाते हैं और मराठाओं की ओर से हर साल इसका छुटपुट विरोध होता रहा है। लेकिन इस साल युद्ध  के 200 साल पूरे होने पर दलितों की ओर से इस बार भव्य आयोजन किया जा रहा था जिसमें 5 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने की बात की जा रही थी। खास बात ये है कि यह देश का इकलौता युद्ध है जिसमें अंगेजों की जीत का जश्न मनाया जाता है।

जातिगत हिंसा की बात करें तो बीते पिछले कुछ महीनों में गुजरात में पटेल आन्दोलन हुआ ये भी जाति के नाम पर था। हरियाणा में जाट आन्दोलन हुआ था, सरकारी और निजी संपत्तियों को आग के हवाले किया गया। इसमें भी आगजनी और हिंसा का वही तांडव दोहराया गया जिसके बाद हार्दिक पटेल नाम से एक नेता सामने आये। इसके बाद गुजरात में ऊना से कथित गौरक्षक दलों द्वारा कुछ दलितों की पिटाई के बाद देश में जो हुआ सब जानते हैं। इस आन्दोलन से जिग्नेश मेवाणी का जन्म हुआ तो उत्तरप्रदेश में दलित, राजपूत हिंसा महाराणा प्रताप की शोभायात्रा के बाद भी एक दलित नेता चन्द्रशेखर रावण का जन्म भी इसी जातिवाद  की कोख से ही हुआ था।  


इस देश में अन्दर ही अन्दर बहुत कुछ हो रहा है। रोहित वेमुला की आत्म-हत्यापहले कन्हैया और राष्ट्रवादफिर ऊना कांड, कुछ सुलग रहा है जो कभी-कभी फूटता है तो कभी अंदर-अन्दर ही दहक रहा होता है। अभी सब कुछ शांत नहीं हुआ कि अगली आग की तैयारी की जा रही है। हाल ही में पांच दिसंबर को कई दलित संगठन अशोक भारती के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश भवन में राष्ट्रीय दलित महासभा कर रहे थे। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य शब्बीरपुर गांव के दलितों को न्याय दिलाने के साथ-साथ भीमआर्मी के संस्थापक चंद्र शेखर रावण, शिव कुमार प्रधान, सोनू समेत अन्य की जेल से रिहाई की आवाज को बुलंद करना है। 

कोरेगांव युद्ध की सालगिरह पर वैसे तो हर साल पंद्रह-बीस हजार लोगों की भीड़ वहां जमा होती थी, लेकिन इस बार तीन-साढ़े तीन लाख लोग कैसे जमा हो गए? क्या ये कोई सोची समझी साजिश थी या महाराष्ट्र को जातीय हिंसा की आग में झोंकने की पूर्व योजना थी? सामाजिक न्याय के बहाने किस तरह एक बाद एक नेता जन्म ले रहे हैं, इसे भी समझना होगा। सामाजिक न्याय के विचार का पानी कथित जातिवादी नेता झोली में लिए चल रहे हैं जो कभी बिखरता है तो कभी हिंसा के लाल रंग में मिल जा रहा है। हमने शब्बीरपुर की घटना के बाद भी पूछा था कि भारत के चुनावी बाजार में राजनीतिक निर्माताओं द्वारा तैयार किए गए और एक दूसरे से आगे बढ़कर दिए जा रहे बयान क्या कभी सामाजिक समरसता का सपना पूरा होने देंगे? हमें नहीं लगता क्योंकि ऐसी घटनाओं के बाद यह लोग एक-दूसरे के विरु( बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएं भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौवल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। इस समय ऐसे लेखक बहुत कम हैं, जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शांत हो। दूसरा सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार भी ऐसे माहौल में आग में घी का काम करता दिखाई देता है।

इस जश्न के भी मूल उद्देश्य उसकी गर्वीली परत हटाकर देखें तो कुछ यूँ देखिये कि आज से 200 साल पहले अंग्रेजों ने दलितों की सहायता से पंडित पेशवाओं को हराया था। शनिवार वाडा में जो अंग्रेजी पताका फहराई गयी थी उसमें दलित समुदाय के लोगों का साथ था। हालाँकि अब न वह युद्ध जीतने वाले अंग्रेज रहे, न म्हारसेना के वह सिपाही और न ही पेशवा और उनके उच्च पद। लेकिन लोग हैं कि इतिहास से गौरव और अपमान के कुछ पल बटोरकर, आज के आजाद और संवैधानिक भारत में हिंसा का तांडव मचा रहे हैं। इसमें कोई एक समुदाय दोषी नहीं बल्कि हर एक वह समुदाय दोषी है जो इतिहास से आज भी जातीय गर्व की भावना ढूंढकर दूसरों को चिढ़ाते हैं, नीचा दिखाते हैं, इसमें शनिवार वाडा में शौर्य दिवस मनाने वाले भी उतना ही दोषी हैं जितना परशुराम जी वे भक्त जो गर्व से उन्हें भगवान का दर्जा देकर सीना ठोकते हुए कहते हैं कि परशुराम जी ने 21 बार पृथ्वी क्षत्रीय विहीन कर दी थी। यदि हिन्दू समाज में आपसी युद्ध को वे गर्व मानते हैं तो आज वे दलितों के जश्न से अपमानित क्यों होते हैं? मेरा उद्देश्य किसी की कमजोर भावनाओं पर वार करना नहीं है पर क्यों न सामाजिक समरसता राष्ट्रीय एकता, अखंडता बनाये रखने के लिए इन एतिहासिक सच्चे झूठे प्रमाणित अप्रमाणित गर्वों को अब पीछे छोड़ दिया जाये? एक नया हिन्दुस्तान बनाया जाये वरना ऐतिहासिक गर्व की भावना के चक्कर और वोट की राजनीति में भारत देश ही एक अलग इतिहास बनकर रह जायेगा।.. लेख -राजीव चौधरी  

आध्यात्मिक विश्वविद्यालय या अय्याशी का अड्डा?

क्या ऋषि मुनियों की भारत भूमि अब तथाकथित बाबाओं के अय्याशी के अड्डे बनकर रह जाएगी?  सवाल सिर्फ मेरा नहीं बल्कि हजारों लोगों का है, आखिर क्यों ऋषि-मुनियों की भूमि पर संत के वेश में अय्याश घूम रहे है? ऋषि कणाद से लेकर स्वामी दयानन्द तक जब जमीन पर चले तो धर्म चला पर आज जब बाबाओं के टोले चलते है तो धर्म नहीं चलता, कुछ और चलता है. मसलन जब-जब ऋषि मुनि चले तो धर्म चला, अब बाबा है, वे चलते है धर्म नहीं अधर्म चलता है, यकीन न हो तो पिछले कुछ सालों से हर महीने हर वर्ष अखबारों से लेकर मीडिया की सुर्खियाँ में किसी न किसी विवादित बाबा की खबर उठाकर देख लो. इस बार राम-रहीम के बाद लोगों को विश्वास हो रहा था कि शायद अब कोई कथित बाबा ऐसा न करें लेकिन गुजरता दिसम्बर का अंत एक और ढोंगी बाबा की पोल खोल गया. खबर हैं देश की राजधानी स्थित रोहिणी के विजय विहार इलाके में आध्यात्मिक विश्वविद्यालय पर पुलिस और महिला आयोग की टीम द्वारा छापा मार कर करीब 40 लड़कियों को मुक्त कराया गया है. जिनमें नाबालिग लड़कियां भी शामिल हैं. आश्रम की आड़ में अय्याशी का अड्डा चलाने वाला बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित अभी भी पुलिस की पहुंच से बाहर है.

बेशक तमाशबीन लोगों के लिए भले ही यह कोई चटपटी खबर रही हो लेकिन धर्म के नाम चलने वाला यह अय्याशी का धंधा हमें धर्म की हानि के रूप में दिखाई दे रहा है क्योंकि यह सब हो तो धर्म के नाम पर ही रहा था? कहा जा रहा हैं कि आध्यात्मिक विश्वविद्यालय नाम से आश्रम चलाने वाला बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित खुद को कृष्ण बताता था. हद तो यह है कि वह हमेशा महिला शिष्यों के बीच ही रहा करता था. इसका कारण यह है कि उसने 16000 महिलाओं के साथ संबंध बनाने का लक्ष्य रखा था. वह लड़कियों को गोपियां बनाकर उन्हें संबंध बनाने के लिए आकर्षित करता था. शर्म और ग्लानी का विषय यह भी है कि आखिर किस तरह योगिराज श्रीकृष्ण जी महाराज के नाम पर अपनी देहिक लालसा पूरी कर रहा था.

सवाल यह भी है कृष्ण का चरित्र उन लोगों को कैसे समझाए जिन्होंने झूठ के पुलिंदे पुराणों के अश्लील वर्णन, मीरा की दुःखगाथा और सूरदास की चौपाई से कृष्ण को जाना है? क्योंकि सूरदास का कृष्ण मक्खन चोर है और पुराणों का कृष्ण गोपियाँ रखता था, कपड़ें चुराता था, बस यही झूठ सुनकर लोग बड़े होते है और इसे ही सत्य समझ लेते हैं. जबकि महाभारत के असली कृष्ण युद्ध कला, नीति, दर्शन और धर्म के ज्ञाता थे.

आसाराम और रामपाल के बाद इसी वर्ष अगस्त माह में खुद को इच्छाधारी बाबा बताने वाले स्वामी भीमानंद को प्रवचन की आड़ में सेक्स रैकेट चलाने और 30 लाख की एक ठगी के मामले में गिरफ्तार किया था तो लोगों की यही प्रतिक्रिया सामने आयी थी कि बाबाओं का क्या रूप होता है? इसके बाद स्वामी ओम को भी अगस्त में ही पुलिस ने गिरफ्तार किया तो राधे मां भी इसी वर्ष काफी विवादो में रहीं. डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम से विवादित तो शायद ही कोई और बाबा रहा हो, जिसके कारण कई लोगों को जान गवानी पड़ी और सरकारी सम्पत्ति समेत सार्वजनिक जन-धन हानि भी हुई लेकिन इसके बाद भी तब से अब तक ना बाबाओं की संख्या कम हुई न भक्तों की?

भक्तो की संख्या क्यों कम होगी आम हो खास मनुष्य को तो चमत्कार चाहिए. नौकरी चाहिए, व्यापार चाहिए, किसी को संतान चाहिए तो किसी को बीमारी से छुटकारा, जो हाथ से गया उसके लिए बाबा और जो पास में हैं वो बचा रहे उसके लिए भी बाबाओं से मन्त्र चाहिए, इस कारण सुलफे की चिलम फूंकने वाले बाबाओं से लेकर एसी रूम में बड़ी-बड़ी गद्दियों पर बैठने वाले बाबाओं की चांदी कट रही है. बस बाबाओं की शरण में जाओं फिर कोई दिक्कत नहीं आएगी. इस दुनिया का निर्माण करने वाले पुरे ब्रह्माण्ड को रचने वाला ईश्वर तो इनके आगे कुछ भी नहीं शायद यही सोच बना दी गयी है? अंध श्रद्धा की पराकाष्ठा देखिये! अपनी नौजवान बेटियों को इनके हवाले करने तक में लोग नहीं हिचकते, दस रूपये के स्टाम्प पेपर पर लिखकर मासूम बच्चियों को आश्रमों को दान कर रहे है. इसके बाद वो जो जी चाहे वो करें. दरअसल ये कथित बाबा जो भी कर रहे लोग होने दे रहे है. धर्म के नाम पर अंधीश्रद्धा की जो ड्रग्स ये लोगों को दे रहे, वो बेहिचक ले रहे है. बदनाम धर्म और संस्कृति होती है पर होने दे इसकी चिंता न बाबाओं को हैं न भक्तो को!


कहते है रक्षा किया हुआ धर्म ही रक्षा करता है. जो धर्म की रक्षा करता हैं निसंदेह धर्म उसकी रक्षा करता है. पर आज लोग धर्म छोड़कर बाबाओं की रक्षा कर रहे है. बाबा भक्तों की फौज खड़ी कर रहें है राजनितिक लोगों से भक्तों का सौदा वोटों में कर रहे है बस इन बाबाओं हमेशा एक बेचैनी रहती है कहीं फिर कोई आदि गुरु शंकराचार्य न पैदा हो जाये! कोई स्वामी दयानन्द फिर खड़ा न हो जाये नहीं तो इनका जमाया हुआ अखाड़ा फिर उखड़ जायेगा इसलिए ये तथाकथित बाबा स्वयं भगवान बन रहे है. आस्था को मोहरा बनाकर अपनी तस्वीर की पूजा करा रहे है. आश्चर्य इस बात का भी हैं कि सिर्फ अनपढ़ ही नहीं बल्कि पढ़ें लिखे लोग भी आसानी से इनके इस टॉप ब्रांडेड अन्धविश्वास को स्वीकार कर रहे हैं. कोई बुरे समय में किसी पड़ोसी का भला करे या न करे, पर इन मुफ्त खोरो तथाकथित संतों, बाबाओं,साधुओं, ज्योतिषियों की जीविका का साधन अवश्य बन जाते हैं. जब तक लोग अपनी बुद्धि से तर्क से सत्य स्वीकार नहीं करेंगे तब तक धर्म की आड़ में तांत्रिकों, पाखंडी बाबाओं का पनपना जारी रहेगा आज बाबा वीरेंद्र देव दीक्षित पकडे गये ये अंतिम नहीं है क्योंकि अन्धविश्वास अभी भी जिन्दा है शायद कल तक किसी की इज्जत और किसी का धन चूसने वाला कोई दूसरा बाबा खड़ा कर दे?..चित्र साभार गूगल लेख राजीव चौधरी