Thursday, 15 February 2018

देखना एक दिन ऋषि दयानन्द की यह सेना इस अंधकार को चीर देगी


ऋषि बोधोत्सव 13 फरवरी पर जिस-जिस ने रामलीला मैदान का यह सुन्दर नजारा देखा होगा निश्चित ही उसका मन गर्व और गौरव से प्रफुल्लित होकर, वैदिक धर्म का नाद कर उठा होगा। शाम के समय भले ही सूर्य ने प्रकाश को अपनी गोद में समेट लिया हो पर वेद की जलती ज्योति, यज्ञ की प्रचंड अग्नि शिखा ने मन और स्थान से अंधकार भगा दिया था। बच्चों की लम्बी-लम्बी कतारें, उनके मुख मंडल पर अनूठी आभा, सब कुछ व्यवस्थित, हर एक बच्चा मन, वचन कर्म से उत्साहित अपने-अपने यज्ञ पात्र लिए उचित दूरी पर जैसे परमात्मा के निकट बैठा दिखा। एक बार को तो मन में शंका उठी थी कि आयोजक इस विशाल यज्ञ प्रदर्शन को किस तरह व्यवस्थित करेंगे, क्योंकि कुछ बच्चे भले ही 10 से 15 वर्ष के करीब थे किन्तु अधिकांश बच्चे तो 10 वर्ष से कम आयु के भी थे, पर देखते ही देखते लगभग 10 मिनट के अन्तराल में हर एक बच्चा एक दिशा, एक पंक्ति में बिना किसी बहस और विवाद के, यज्ञ आसन मुद्रा में समान दूरी पर हवन कुंड सामने रखकर यज्ञ के लिए तैयार था। इससे हर कोई स्वयं में ही व्यवस्थापक नजर आ रहा था।


दिल्ली आर्य प्रतिनधि सभा के तत्त्वावधान में पिछले काफी समय से घर-घर यज्ञ- हर घर यज्ञऔर स्थान-स्थान पर यज्ञ प्रशिक्षण शिविर आयोजित किये जा रहे हैं। जिनमें दिल्ली की विभिन्न आर्य समाजों एवं आर्य संस्थाओं, कन्या विद्यालयों, गुरुकुल आदि में यह प्रशिक्षण शिविर चलाये जा रहे हैं या ये कहिये वैदिक संस्कृति के अध्यात्मिक स्वरूप को बचाने के लिए ये ऋषि दयानन्द की फौज खड़ी की जा रही है। 

इस विशाल यज्ञ प्रदर्शन में करीब 600 बच्चे थे, आगे बढ़ने से पहले बता दूँ यह कोई पौराणिक कहानियों का जादू का मन्त्र नहीं था बल्कि दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा और समस्त समाजों और आर्य शिक्षण संस्थाओं के सहयोग का वह प्रतिफल था जिसने हर किसी को गद-गद होने पर मजबूर कर दिया। ये भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को अगली पीढ़ी को सौंपने का वह पुनीत कार्य था जो प्रत्येक भारतवासी को करना ही चाहिए। ये ऋषि दयानंद के सपने के वैदिक रथ को उस मार्ग पर आगे बढ़ाने का कार्य था जिसमें आधुनिकता के नाम पर आज समाज में कुसंस्कार के गड्ढे खोद दिए गये हैं। संस्कार अर्थात् सदगुणों को गुणा करना अर्थात् बढ़ाना एवं दोषों को घटाना, अच्छी आदतें डालना एवं बुरी आदतें निकाल कर फेंकना, संस्कार कोई दवाई नहीं होती कि किसी को पिला दो और वह संस्कारी हो जाये। संस्कार बाल्यकाल का वह वातावरण होता है जिसमें उसके मन को जैसी छाप मिलती है, उसके मासूम मन की गीली सी मिट्टी पर जो लिखा जाता है वही सारी जिन्दगी अंकित रहता है। 


यह सब मानते हैं कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। भला वैदिक धर्म का नाम आये और उसके साथ यज्ञ का जिक्र न हो! कैसे हो सकता है? यज्ञ तो संस्कृति का पिता है। हमारे जीवन में यज्ञ का बड़ा महत्त्व है। हमारा कोई भी कार्यक्रम बिना यज्ञ के पूरा नहीं होता। सब संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक यज्ञ से ही पूर्ण होते आये हैं। इसे ही भारतीय संस्कृति कहा गया है। भले ही कोई पौराणिक हो लेकिन उसे भी प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्योहार, उत्सव, उद्यापन सभी में यज्ञ अवश्य करना-कराना पड़ता है। बस इसमें हानि यह होती है कि यह लोग यज्ञ के असली स्वरूप को बिगाड़ देते हैं और जो परिवार यज्ञ के असली स्वरूप को नहीं समझते वह इसे ही स्वीकार कर लेते हैं। उदहारण के लिए अभी पिछले दिनों मध्यप्रदेश में शराब से यज्ञ किया गया था जिसमें स्थानीय और दूर दराज से आये सैकड़ों लोग भी उपस्थित थे। यदि उनमें किसी एक को भी यज्ञ के वैदिक कालीन स्वरूप का ज्ञान होता तो क्या वह इसका विरोध नहीं करता? क्योंकि इसकी आड़ में हमारी शुद्ध परम्पराओं पर हमला हो रहा था। ऐसे घोर अवैदिक कृत्यों को मिटाने के लिए ही आर्य समाज प्रयासरत है। इससे समाज को दो लाभ होंगे एक तो उन्हें कोई यज्ञ के नाम पर मूर्ख बनाकर धन, समय आदि की हानि नहीं कर सकता दूसरा यदि किसी के आस-पास कोई पुरोहित न भी हो तो वह इस क्रिया को स्वयं भी कर सकता है। 


आज देश में यज्ञ प्रशिक्षण शिविर क्यों जरूरी है इसे समझने के लिए मात्र एक और छोटा सा उदहारण काफी होगा कि फरवरी माह में ही राजधानी दिल्ली के सुभाष पैलेस इलाके में घर की शुद्धि हवन तन्त्र क्रिया के नाम पर तांत्रिकों के कहने पर अभिभावकों ने अपनी बेटी को तांत्रिक के हवाले कर दिया और तांत्रिक लगातार उससे 12 वर्ष दुष्कर्म करता रहा। यहाँ पर फिर वही सवाल खड़ा होता है कि यदि उक्त परिवार में कोई एक भी सदस्य वैदिक यज्ञ प्रक्रिया को जानता, समझता तो क्या वह तांत्रिक इस नीच कार्य में सफल हो पाता? शायद नहीं क्योंकि यज्ञ में समिधा, सामग्री, घी, जल, कपूर आदि के अलावा किसी चीज की आवश्यकता शायद ही पड़ती हो। लेकिन शर्म का विषय यह है कि आज अनुष्ठानों के नाम पर तांत्रिक अस्मत तक रोंद रहे हैं। लेकिन अब यह लोग सफल नहीं होंगे, नौजवानों में बच्चों के रूप में खड़ी हो रही यह महर्षि दयानन्द की सेना इस अंधकार को चीर कर रख देगी। इस वर्ष ऋषि बोधोत्सव पर 600 बच्चे उपस्थित थे तो अबकी बार अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन में यज्ञ प्रदर्शन में दस हजार का लक्ष्य है। भारत की समस्त आर्य समाजें इस कार्य को गति देंगी तो एक दिन यह संख्या लाखों करोड़ों में होगी।  ऐसा हमें विश्वास है।

लेख---राजीव चौधरी 

अधकचरे तर्क और उनसे लीपापोती


अजीब सा शोर है! गरीबी, बेरोजगारी और तमाम समस्या अँधेरे में खामोश बैठी है। राजनीति के ग्राउंड पर खेल खेला जा रहा है। चंदन गुप्ता की देशभक्ति पर सवाल, अंकित सक्सेना की गला रेतकर हत्या, मेवात से धर्मांतरण की उठती सिसकियां और कश्मीर घाटी से उठती अलगाव की आंधी बता रही है कि असली खेल यही है। घटनाएं होंगी, बवंडर होंगे, आंसू भी होंगे लेकिन प्रगतिशील संवेदनशीलता की जगह मक्कार सियासत होगी। इसके बाद न्यूज रूम में टॉक शो होंगे, बहस होगी, अगले-पिछले उदाहरण देकर रोजाना की बहस के दंगल से राजनितिक पहलवान उठकर चले जायेंगे। ब्रेक लिया जायेगा फिर अगली ब्रेकिंग न्यूज का इंतजार होगा।

कासगंज घटना को कुछ दिन बीत गये। तिरंगा यात्रा पर हमले में मारा गया चंदन अभी जीवन के 20 बसंत ही देख पाया था। लेकिन उसकी चिता की राख के साथ अधकचरे तर्कों से सवाल भी ठंडे हो गये। अनुग्रह शंकर लिखते हैं कि चन्दन गुप्ता की हत्या मामले में कहा गया कि तिरंगा यात्रा जान-बूझकर मुस्लिम मुहल्ले से निकाली गई और यहां पाकिस्तान मुर्दाबादके नारे लगाए गए! जबकि सवाल यह होना चाहिए कि क्या मुस्लिम मुहल्लों में तिरंगा वर्जित है? दूसरा चन्दन को गोली मारने वाला अपराधी कौन था? उसके पास हथियार कहां से आया? पर इन गंभीर सवालों की जरा भी चर्चा न करते हुए बात गणतंत्र दिवस का जुलूस निकाल रहे युवकों की गलती बताते हुए मामले को मोड़ने की कोशिश हुई। साथ ही मीडिया का एक धड़ा इस बात को लेकर मुखर रहा कि क्या देश में अब तिरंगा यात्रा जरूरी है

इसके बाद की खबर पढ़ें तो राजधानी दिल्ली के रघुवीर नगर इलाके में प्रेम-प्रसंग के कारण युवती के माता-पिता व परिजनों ने मिलकर अंकित सक्सेना की बेरहमी से गला काटकर हत्या कर दी। अंकित का कसूर इतना था कि उसने हिन्दू होकर एक मुस्लिम लड़की से शादी कर अपना घर बसाना चाहता था। जिसके लिए युवती भी तैयार थी लेकिन युवती के पिता और रिश्तेदारों ने चाकू निकाला और देखते ही देखते सरेराह कुछ पलों में अंकित का गला रेत दिया। लेकिन यहाँ भी मीडिया ने ये कहा कि हत्या तो हत्या है, कातिल तो कातिल है, क्या इतना कहना काफी नहीं होता? इस घटना को हिन्दू मुस्लिम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। एक अखलाक, पहलू खां, और अफराजुल की हत्या को एक अरब हिन्दुओं से जोड़ने वाले लोग आखिर अंकित सक्सेना की हत्या को 20 करोड़ मुस्लिमों से नहीं जोड़ पाए?

कुछ लोगों ने कहा कि ऐसी घटनायें तो अक्सर गोत्र, जात और गाँव में इज्जत के नाम पर अंजाम दे दी जाती है। हाँ ये कहने वाले गलत नहीं हैं किन्तु क्या आजतक किसी आपसी विवाद व रंजिस में अखलाक या पहलू खां की जान नहीं गयी? जब केरल में एक हादिया के मामले पर सुप्रीम कोर्ट उसकी जाँच के आदेश एनआईए को देता है तब मामला प्रेम की नजरों से देखा जाता है। इसे युवाओं को प्रेम करने जैसे स्वतंत्र अधिकारों में गिना जाता है। लेकिन जब इसी प्रेम की भेंट एक अंकित सक्सेना चढ़ता है तो इसे सम्मान के लिए हत्या अर्थात ऑनर किलिंग बताकर न्यूज रूम ब्रेक ले लेते हैं।
पर लोगों के जेहन में उफन रहे सवाल ब्रेक कैसे लें? क्या वामपंथ की कलम समाजवाद की रक्षा छोड़कर अब सीधे कट्टर इस्लामवाद की रक्षा करती आसानी से नहीं दिख रही है? सवालों की फेरिहस्त में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अंकित की हत्या के वक्त वहां बड़ी भारी भीड़ मौजूद थी। यदि भीड़ अंकित के बचाव में हत्यारों पर हमला कर देती तो इसे हिन्दुत्त्व से जोड़कर देखा जाना लाजिमी था। कहा जा रहा कि किसी मामले में जब एक पक्ष हिन्दू और दूसरा मुसलमान हो तो ज्यादातर लोग तर्क, तथ्य और न्याय का साथ छोड़कर अपने धार्मिक हित के साथ खड़े नजर आते हैं लेकिन ये शुरुआत किसने की? शाहबानो के मामले में संविधान पर पहले चोट करने वाले कौन थे?

एक और खबर मेवात की भी है देश की राजधानी से सिर्फ 80 किमी. दूर मेवात से जहां अनुसूचित जाति के हिन्दुओं को मुस्लिम दबंगों द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का दबाव बनाते हुए मारा-पीटा गया और मुसलमान न बनने पर गांव छोड़ने की धमकीतक दी गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को भी अनुग्रह शंकर की माने तो अधकचरे, असंवेदनशील और बेहद आपत्तिजनक तर्कों से ढ़कने की कोशिशें भी हुई। हमेशा की तरह मीडिया में बैठे मौलानाओं ने कहा इस्लाम इस चीज की आज्ञा नहीं देता पर मुरझाया सा सवाल वहीं खड़ा है कि यदि इस्लाम इस चीज की आज्ञा नहीं देता तो फिर ऐसा करने की आज्ञा कौन देता है?
मेवात की घटना पर भी तर्कों की बोछार हुई, चूंकि मामला देहाती इलाके का था खबर आसानी से पहले ही दब गई थी, इसलिए उनकी जरूरत ही नहीं पड़ी। दरअसल मामला दलित समुदाय से जुड़ा था तो जय भीम-जय मीम वाले राजनितिक योधा अपनी जबान की तलवार और दलित संवेदना की ढ़ाल किनारे रखते नजर आये। हाँ यदि यह मामला दलितों और अन्य जाति समुदाय के बीच होता तो पत्रकारों से लेकर नेताओं तक की गाड़ी गाँव-गाँव घूमकर कोसती नजर आती। अम्बेडकर ने चाहे जो कहा हो, आज इस्लाम ने दलितों के साथ चाहे जो सुलूक किया हो, पर मेवात का दुःख कोई नहीं मनाएगा, क्या कोई गला नहीं भार्रायेगा?
अब थोड़ा ध्यान देने वाली बात यह भी है कि यह घटनाएं सिर्फ खबरें नहीं हैं, इनमें कुछ साझे तत्व हैं, पर सामाजिक सद्भावना, अल्पसंख्यक समुदाय का राग, इन सब सवालों का मुंह भींचता सा दिखाई दे रहा है। तटस्थ होकर इंसानियत की बात हुए तो देश में एक अरसा सा बीत गया। कलम के धनी लोग राजनीतिक टोलो में बंटे से दिखाई दे रहे हैं तो फिर तिरंगे के लिए गिरी चंदन की लाश पर कोई आंसू क्यों बहायेगान कोई सवाल उठेगा। प्रेम के नाम पर अंकित सक्सेना की हत्या पर भला कोई त्योरियां क्यों चढ़ेंगी, न कोई उंगली उठेगी और मेवात! क्या बात करते हैं साहब! ये तो कोई मुद्दा ही नहीं है। बस खेल देखो और उसपर बिछी बिसात देखो।
चित्र साभार गूगल लेख -राजीव चौधरी 


Are we the role models for the children in our life?



TIME FOR AATMANIRIKSHAN (SELF-ANALYSIS)
Are we the role models for the children in our life?
One out of three children is considered overweight or obese …and the largest chunk of the blame lies with the mother and the father …as some 80 percent of overweight children have overweight parents.The sources of this problem are, amongst others:
Ø Parents do not eat well …children also do not eat well.
Ø Parents do not exercise…children also do not exercise.
Ø As parents, we are less active …childrenare less active.
Ø We spend more screen time (in front of televisions, video-game consoles, computers, tablets, smart phones) …children are glued to screens.
Ø Wesupply children with all sorts of addictive electronic gadgets apparently to buy ‘some peaceful time’ without training them on the correct usage of these equipment.
Ø Wewant our children to be ‘IN’, thus live to ‘what others would think rather than live to our own standards and satisfaction.
Ø As parents, we keep shying away from our prime rolesas the first/fundamental educators of our children; we pass on the ball to teachers and peers or simply leave them to grow in the wilderness!!! 
We need to remind ourselves of the gardener who carefully tenders plants. He ties those growing haphazardly to straight sticks. Thereafter these plants grow into marvellous trees with straight trunks, green crowns, flowers and fruits. Untendered, a plant grows into anunevenly swerving/curvy tree which may be straightened by reducing it to poles and planks after it is chopped.Alas it would no longer be a tree.
Are we giving enough attention to our children as the caring gardener does to plants? Are we the role models for the children in our life? …Imagine the fate of untendered children …indeed a scary future!
Screen time is ever-increasing …both quantity and quality time for the family - shrinking.
The ‘make-believe’ hectic life leaves us fewer free moments to home-cook nutritious meals. Fast food, electronics, quick-fix solutions are the stark reality. 
Super-sized servings,too much fatty/sugary processed foods and ourcouch-potato-lives convey a silent but forceful message to children: it is normal to be overweight and unhealthy!
Sadly most children live with poor role models; we tell our kids to get up from the television, video-game console, computer, tablet, smart phone and go out to play while we take over the channel changer and/or confine ourselves to screen time!
The quiet before the storm
The public health impact of the increasing prevalence of obesity at younger and younger ages is not that visible …but with time these “unfortunate” children will start developing heart attacks, stroke, diabetes, kidney failures, amputations, blindness, and ultimately death at younger and younger ages.
Likewise, imagine a massive number of young children take to chain smoking, alcoholic beverages, substance abuse (drugs, etc.). The public health impact, emphysema, heart disease and cancer, is a slow process …who cares? We are all seeking immediate gains, pleasures …careless of the medium and long-term impacts of our thoughts, speech and actions,as well asour disrespect of the physical environment; our overall polluted lifestyle.
No parent want thisfor their children …yet, it is reality and it ishappening.
The overweightproblem of children is in fact a parenting problem. As parents we totally disregard the fact that our influences are decisive; dietary, exercise and lifestyle patterns directly or indirectly set in childhood tend to be permanent.
Rishi Bodh Mahotsav is time to revisit the Vedic teachings, enlighten ourselves and more importantly walk-the-talk.
…DevabhagamYathapurveSanjananaaUpaasate… (RigVeda10.191.01) Synchronised thoughts, speech and physical actions are imperative toattain common goals. Life is meant to dwell on a learning curve towards capacity building for integrated wisdomthat empowers us to follow the example of our ancestors: be open-minded and live in harmony as well as achieve higher goals by virtue of being united.
…Vishvedeva Shanti…(YajurVeda 36/17) Sages / seers(rishis) and elderly/experienced/learned personsprocure us peace through the sharing of their knowledge and life experiences.
…Vishvāni Deva VayunāniVidvān…(YajurVeda 40.16)Sages (learned persons) of the highest virtue lead us to acquire noble thoughts, deeds and actions, to strive for scientific, political and economic prosperity, as well as to stay away from evil, deceit and vice!
As parents, grandparents, peer groups, we should lead-by-example. 
We need to change our habits: adapt the way our family eats, exercises and how we spendour time together, if we really want to help children lead healthy lifestyles and prevent them from becoming overweight, sedentary, and addicted to substances, electronic screens, etc. As adults, we need to initiate several small changesso that our legacy to future generations is not just the greatness of technology but great physical, mental/moral/spiritual and social wellness.
If we fail to be the change we wish to see in others, our children will be the first in recorded history to surpass us only in terms of material wealth NOT to outlive us be it ...physical health …life span …living values …as human beings.
Acharya Bramdeo Mokoonlall
Arya Sabha Mauritius


Wednesday, 7 February 2018

विश्व पुस्तक मेला 2018 में मेरा अनुभव


                  प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी विश्व पुस्तक मेला का आयोजन दिल्ली के प्रगति मैदान पर किया गया था, जो कि 6 से 14 जनवरी तक लगा हुआ था और सुबह 11 बजे से आरम्भ होकर शाम 8 बजे तक चला करता था । अन्य वर्षों की तरह इस वर्ष भी जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, परन्तु इस बार टिकट लेकर जाना नहीं पड़ा, क्योंकि “दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा” की ओर से एक पास (प्रवेश पत्र) मिला हुआ था । प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी “दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा” की ओर से हॉल नम्बर 12-A में 282-291वां स्टाल और 7 नम्बर हॉल पर 161 नम्बर स्टाल में पुस्तक विक्रय या पुस्तक वितरण किया जा रहा था ।

                   सभा की ओर से मुझे अवसर मिला सेवा देने का इस विश्व पुस्तक मेला में जिसमें मेरा मुख्य कार्य था लोगों को उनके विचार व आवश्यकता के अनुरूप पुस्तक के लिए सुझाव देना तथा पुस्तक विक्रय करना, पुस्तकों की विशेषता समझाना, उनकी कोई व्यक्तिगत, व्यवहारिक सामाजिक तथा आध्यात्मिक विषयों से सम्बंधित समस्यायें अथवा शंकायें हों तो उनका समाधान करने का प्रयत्न करना इत्यादि । मुख्यतः “आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट” से प्रकाशित महर्षि दयानन्द जी सरस्वती द्वारा प्रणित अमर ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” को वितरण करने में बहुत आनन्द आया, जो कि हर एक व्यक्ति या हर एक परिवार में पहुँचाने की भावना से 10 रुपये के मूल्य में वितरित किया जा रहा था । 7 नम्बर हॉल के स्टाल में वितरण हेतु लिए गए एक भी सत्यार्थ-प्रकाश हमने नहीं छोड़ा बल्कि मेला के अन्तिम क्षण पर्यन्त भी हम बांटते रहे । 

                   हमने तो यह विचार किया कि वैसे तो ऋषिऋण से उऋण होना कठिन ही है, उनकी हम सब के ऊपर हुई कृपावृष्टि को ध्यान में रखते हुए, परन्तु कुछ मात्रा में तो न्यून किया ही जा सकता है, इस अमर ग्रन्थ को घर-घर पहुँचाने के ध्येय से युक्त इस स्वल्प प्रयास के माध्यम से । जहाँ एक तरफ अनेक विषयों से सम्बन्धित हिन्दी, संस्कृत, ओडिया, तेलगु, बंगाली, उर्दू, और अनेक भारतीय भाषाओँ की पुस्तकें उपलब्ध हो रही थी तो एक तरफ अंग्रेजी जर्मनी, स्पेनिश, फ्रेंच, अरबिक, इटालियन, जापानीज आदि विदेशी भाषाओँ की पुस्तकें भी पाठकों को उपलब्ध हो रही थीं।
    
               पाठकों के लिए जहाँ बाईबल और कुरान जैसी अनार्ष ग्रंथों को भी उनके अनुयायी नि:शुल्क वितरित कर रहे थे तो हम सब मनुष्यों के कल्याणार्थ ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान तथा वेदानुकुल अनेक ग्रंथों को आर्य समाज की ओर से दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के तत्वावधान में 10 से 25 प्रतिशत की छूट में वितरित किये जा रहे थे। सत्यार्थ प्रकाश ग्रन्थ को अत्यन्त सेवाभावी सभी आर्यगण, यहाँ तक कि माताएँ भी स्वेच्छापूर्वक बहुत ही उत्साह व रूचि के साथ वितरित कर रहे थे।

                    इस भव्य मेला में जहाँ नये पुराने अनेक आर्य समाजियों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ वहीं भिन्न-भिन्न मत-मतान्तरों के लोगों से भी मिलना हुआ, उनके विचारों को भी जानने-समझने का मौका मिला। भारत-भर के अनेक प्रान्तों से पधारे हुए अनेक भाषा-भाषियों के साथ ओडिया, गुजराती आदि में वार्तालाप के साथ-साथ विदेशियों से भी अंग्रेजी भाषा में वार्तालाप करते हुए अपने वैदिक विचारों का आदान-प्रदान करना आनन्ददायक रहा। अपने स्टाल में सब के साथ मिल कर कार्य करने से दूसरों से बहुत प्रेरणा भी मिली।
                   पहले ही दिन अत्यन्त सेवाभावी आचार्य सत्यप्रकाश जी शास्त्री को मैंने देखा कि अकेले ही प्रगति मैदान के एक नम्बर गेट से अपने स्टाल तक एक पानी के जार को कन्धे के ऊपर उठाकर ले आये थे जिससे उनका पूरा शरीर और कपड़े भीग गए थे। वह कभी भी किसी प्रकार के सेवाकार्य में पीछे नहीं हटते थे, जैसे कि अन्तिम दिवस में भी रात्रि के 2 बजे तक पुस्तकों को गाड़ियों से उतारने में लगे रहे । यह तो एक उदाहरण मात्र है, ऐसे ही अनेक कार्यकर्ताओं ने समर्पित भावना के साथ सेवा दी और ऋषि के मिशन को आगे बढाया । उसमें छोटे छोटे बालकों से लेकर माताओं और बुजुर्ग महानुभावों का भी अत्यन्त सहयोग रहा ।


                   अन्य प्रकाशनों से भी मैंने कुछ पुस्तकें खरीदी उनमें से एक पुस्तक है “भारतीय पुस्तक परिषद्” से प्रकाशित  “स्वामी दयानन्द” जिसकी लेखिका हैं “कविता वसिष्ठ” । उन्होंने इस पुस्तक में बहुत कुछ अच्छी बातें भी लिखी है जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं परन्तु कुछ सुधार की भी आवश्यकता है, जैसे कि उन्होंने इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 23 में लिखा है कि – “एक दिन भांग के नशे में सोए स्वामी दयानन्द सरस्वती ने एक स्वप्न देखा । उन्होंने देखा कि शिव-पार्वती वार्तालाप कर रहे हैं और इस वार्तालाप के विषय वह स्वयं हैं । पार्वती जी कह रही हैं कि दयानन्द को विवाह कर लेना चाहिए । महादेव ने इसका विरोध किया, जिसका कारण उन्होंने दयानन्द की भांग पीने की बुरी आदत बताया । अपने इष्टदेव शिव द्वारा अपनी निंदा सुनकर स्वामी जी की निद्रा खुल गयी । उन्हें घोर दुःख और ग्लानि हुई”।
     
                इस पुस्तक को देखने के बाद पता चला कि कई लेखक/लेखिका ऐसे भी होते हैं जो बिना किसी तथ्यात्मक गवेषणा के कुछ भी अप्रामाणिक बातें लिख देते हैं । महर्षि दयानन्द जी ने स्वलिखित आत्म चरित में न कभी कोई ऐसे प्रसंग का उल्लेख किया और न ही कोई ऐसी घटना उनके साथ होने की सम्भावना थी क्योंकि न ही शिव-पार्वती उनके इष्टदेव थे और न ही उनको विवाह करने की इच्छा थी जिससे कि उस प्रकार के स्वप्न आते । क्योंकि उनको बाल्यकाल से ही यह निश्चय हो गया था कि ये सच्चे शिव नहीं हैं, सच्चा शिव तो निराकार ईश्वर ही है जिसकी खोज करनी चाहिए और छोटी अवस्था में ही वैराग्य हो जाने के कारण विवाह आदि के लिए भी कोई इच्छा शेष नहीं रही थी अतः उनका लिखना अप्रासंगिक तथा अप्रामाणिक होने से मानने योग्य नहीं है ।

                    इसी प्रकार अनेक ग्रन्थ होते हैं जिनका न कोई सिर होता है और न पैर । तर्क व प्रमाणों से रहित, अवैज्ञानिक, मनगढन्त, काल्पनिक, असत्य, यथार्थता से दूर ऐसे अनेक ग्रन्थ आपको मिलेंगे इस विश्व पुस्तक मेला में जिनको जन सामान्य बिना सत्यासत्य के निर्णय किये ही खरीद लेते हैं और अपने अमूल्य समय, धन, बुद्धि आदि को नष्ट कर देते हैं । इस प्रकार के करोड़ों लेखकों के लाखों पुस्तकों के हजारों स्टालों में से एक/दो ही ऐसे आर्य समाज से सम्बंधित प्रकाशन या स्टाल होते हैं जो कि वेद तथा वेद के अनुकूल ग्रंथों के माध्यम से सत्य को जानने-जनाने के लिए, तथा उसके प्रचार-प्रसार के लिए तन, मन, धन से संलग्न व समर्पित रहते हैं।

                    अतः हमें यह अवश्य बुद्धि पूर्वक निर्णय कर लेना चाहिए कि हमें किन ग्रंथों के ऊपर अपना समय, धन और बुद्धि आदि व्यय करना चाहिए जिससे हमारी उन्नति-प्रगति हो सके फिर उसी प्रकार के शुद्ध वैदिक पुस्तकों के स्टालों वा प्रकाशनों में ही अधिक रूचि दिखानी चाहिए तथा औरों को भी प्रेरणा देनी चाहिए।
                     मैंने एक और विशेष बात देखी कि हमारे भारतीय पुरुष और महिलाएं तो विदेशी भाषाओँ तथा सभ्यता-संस्कृति के प्रति आकर्षित होकर उन्हीं की भाषा, उन्हीं के जैसे वस्त्र आदि धारण करने में रूचि दिखा रहे थे तो दूसरी ओर कुछ विदेशियों को देखा जो कि हमारे भारतीय भाषा और सभ्यता-संस्कृति से प्रेरित होकर हिन्दी और संस्कृत भाषा सीखने के लिए भारत में आकर निवास कर रहे हैं, संस्कृत भाषा बोलते भी हैं और वस्त्र भी भारतीयों जैसे पहनते हैं । यह सच में एक आश्चर्य की बात है कि जो वस्तु, जो मान्यता, सिद्धान्त, हमें सहज ही प्राप्त है, हमारा धरोहर है, हमारी पैतृक संपत्ति है, उसको छोड़ कर हम अप्राप्त की कामना कर रहे हैं अथवा उन अवैदिक मान्यताओं के पीछे दौड़ लगा रहे हैं ।
                     इस अवसर पर “गुरु विरजानन्द संस्कृतकुलम्” हरिनगर, नईदिल्ली से पधारे हुए छोटे छोटे बालकों को देखा जो कि केवल संस्कृत में ही वार्तालाप करते थे, हिन्दी भाषा उनको कम आती अथवा बिल्कुल नहीं आती । उनके साथ भी मैंने कुछ समय व्यतीत किये । यह आचार्य धनञ्जय शास्त्री जी का ही अथक परिश्रम और लगन का परिणाम है कि उन बच्चों के साथ साथ उनकी पत्नी और संस्कृति नाम की छोटी सी पुत्री भी संस्कृत भाषा में ही वार्तालाप करती हैं । कुछ लोगों ने आश्चर्य पूर्वक मुझे यह प्रश्न किया कि ये लोग गुरुकुल से बाहर जाकर कैसे व्यवहार कर पाएंगे ? इनका जीवन तो अन्धकारमय हो जायेगा ? तो इसका समाधान करते हुए मैंने कहा कि जैसे आप वस्तुओं को हिन्दी से अथवा अन्य भाषाओँ से जानकर उपयोग करते हैं, ठीक ऐसे ही ये लोग उस वस्तु को संस्कृत में जानते हैं और प्रयोग करते हैं । प्राचीन काल में जैसे ऋषि-महर्षि और सामान्य जनता भी संस्कृत का ही प्रयोग किया करते थे वैसे ही आजकल भी वातावरण बनाया जा सकता है । इस प्रकार यदि हम अपनी सन्तानों को अच्छी शिक्षा दें, हमारी वैदिक शिक्षा, संस्कृत भाषा, भारतीय सभ्यता, संस्कृति, परम्परा आदि के प्रति रूचि उत्पन्न करावें तो निश्चित है कि हर परिवार सुख-शान्ति से युक्त होकर अपने जीवन पथ पर अग्रसर हो सकें ।

                    इस पुस्तक मेला में इस वर्ष आर्य समाज के विद्वानों का आगमन न्यून ही रहा । आर्य समाज के स्टाल पर बहुत कम ही विद्वान् पधारे हुए थे जो कि अनेक लोगों की शंकाओं का समाधान करते हुए नजर आये थे । हॉल नम्बर 8 में एक दिन मसालों के बादशाह महाशय श्री धर्मपाल जी की अध्यक्षता में दिल्ली सभा के प्रधान श्री आचार्य धर्मपाल जी, महामन्त्री श्री विनय आर्य जी और अनेक आर्य सज्जनों की उपस्थिति में आर्यसमाज दयानन्द विहार, नईदिल्ली के मंत्री श्री ईश नारंग जी ने यज्ञ की उपयोगिता, विशेषता तथा हवन के ऊपर हुए अनेक अनुसंधानात्मक तथ्यों की जानकारी प्रदान की । जैसे कि हमने देखा अनेक मत-पन्थ-सम्प्रदाय वाले पूरी तन्मयता व लगन के साथ अपने अवैदिक और अप्रामाणिक विचारों को लोगों के अन्दर थोपते जाते हैं, इसी प्रकार हमारे आर्य समाज के वैदिक विद्वान् भी यदि पूरे समर्पण के साथ अपने वेद तथा वैदिक सिद्धान्तों को सरल व वैज्ञानिक ढंग से लोगों के सामने उपस्थापित करते और जोर-शोर से प्रचार-प्रसार करने में रूचि दिखाते तो हर एक व्यक्ति तक अपने वैदिक विचारों को पहुँचाने का यही एक अच्छा अवसर होता है ।

हमने कुछ कॉलेज के युवाओं को भी देखा जो कि जगह-जगह नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से सामाजिक बुराईयों के विरोध में अपने कुछ विचार प्रस्तुत कर रहे थे । यदि आर्य समाज के छोटे-छोटे बालक भी हर एक सिद्धांतों को आकर्षक व प्रेरक ढंग से इस प्रकार के नाटकों के माध्यम से लोगों के सामने प्रस्तुति देते तो हजारों लोग आसानी से इन सिद्धान्तों, विचारों से अवगत हो जाते और हम ऋषि के मिशन को कुछ सीमा तक अग्रसर करने में सफल हो जाते ।
कुरान और बाईबल के प्रचार में उनके कार्यकर्ता दिन भर खड़े रहते हुए आते-जाते लोगों को कुरान और बाईबल तथा अनेक प्रकार के पत्रक आदि प्रचार सामग्री मुफ्त में ही वितरण किया करते थे, परन्तु न हमारे पास ऐसी कोई प्रचार सामग्री उपलब्ध थी और न ही उस प्रकार समर्पित कार्यकर्ता विद्यमान थे । हमारे आर्य समाज के स्टाल की संख्या हो अथवा कार्यकर्ताओं की संख्या हो न्यून होने के कारण जितने स्तर में प्रचार का कार्य होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया, फिर भी परिणाम संतोष जनक ही रहा ।

हमारे कुछ गुणों और कुछ दोषों को दृष्टि में रखते हुए यह कुछ विश्व पुस्तक मेला में हुए मेरे अनुभवों को मैंने संक्षिप्त रूप में उपस्थापित करने का प्रयत्न किया जिससे हम अपने गुणों को जान कर उन्हें और भी आगे बढायें और जो दोष हैं उन्हें सुधार करें, उनको पुनरावृत्ति न करें तो वेद का प्रचार-प्रसार सुगमता से करने में सफल हो सकें । धन्यवाद ।।