Friday, 13 April 2018

जाति सम्प्रदाय से बढ़ रहे क्लेश


बट रही संस्कृति, बंट रहा देश,
जाति सम्प्रदाय से बढ़ रहे क्लेश।
मानव हो मानवता के बनो पुजारी
है वसुदेव कुटुम्बकम की संस्कृति हमारी।।
मानवता को नष्ट करता, जातिवाद
जाति, सम्प्रदायों में बांटकर,
कर रहे मानवता का अपमान।
उसके बेटे-बेटियों पर ये जुल्म,
करे क्षमा नहीं भगवान।।

परमात्मा ने इस संसार का व प्राणियों की आवयकता की चल-अचल वस्तुओं का निर्माण किया। उसने सूर्य, चन्द्रमा, मेघ से गिरता पानी, नदी, तालाब, समुद्र, यह पृथ्वी, वृक्ष औषधि पशु आदि समस्त प्राणियों के लिए दिए उसने मनुष्य-मनुष्य में कोई भेद नहीं किया क्योंकि हमसब परमात्मा के ही पुत्र-पुत्री हैं, हममें कोई भेद नहीं। ये जाति भेद अज्ञानतावश मनुष्यों की देन है। परमात्मा ने किसी को ऊॅंचा-नींचा, अछूत या दलित नहीं बनाया, यह सब तो मनुष्य की सोच के कारण है। जब मनुष्य की बुद्धि में यह अज्ञानता का विचार नहीं आया था तब तक संसार में मनुष्य एक ही जाति थी।
  ‘‘दुनिया  का  इकरामी  आलम  आम  था।
  पहले एक कौम थी, इंसान जिसका नाम था।।’’
ये जातिवाद हमारी सनातन संस्कृति के अनुसार नहीं है। जिस प्रकार आज अनेक ऐसी कई मान्यतायें प्रचलन में आ हुई हैं, जिनका कोई ठोस आधार ही नहीं है। किन्तु उन्हें मानने वालों की संख्या अच्छी खासी हो हुई है, इसलिए उसे अब सामाजिक मान्यता के रूप में माना जा रहा है। ऐसे ही वर्ण व्यवस्था के स्थान पर जाति व्यवस्था का प्रचलन हो हुआ। क्यों हुआ, कबसे हुआ, यह कहीं स्पष्ट नहीं है।
समाज में पहले वर्ण व्यवस्था थी, जिसमें मनुष्य की पहचान उसके कर्म स्वभाव के आधार पर थी, उचित थी। मनुष्य को अपनी योग्यता के अनुसार ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र स्थान प्राप्त होता था।
आज न समाजवाद है, न राष्ट्रवाद है न मानवीय द्रष्टिकोण , इन सब पर भारी जातिवाद है। परिणाम हुआ खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है की कहावत चरितार्थ हो रही है। जब जातिवाद को शस्त्र बनाकर ही सबकुछ पाया जा सकता है तो दूसरा वर्ग जो अभी तक जातिवाद को महत्व नहीं देता रहा वह भी इसी ओर प्रेरित होकर जातिवाद को बढ़ावा दे रहा है।  जन्म के अनुसार जाति व्यवस्था में मनुष्य  को बांटना समस्त समाज के लिए एक नासूर है। ऐसा नासूर जिसकी आंच में समाज, संगठन संस्कृति, राष्ट्र सभी बुरी तरह झुलस रहे है।
जातिवाद और साम्प्रदायिक विचारधारा के कारण यह देश वर्षों तक गुलाम रहा। सनातन धर्म की जातियों में बटी शक्ति ने विदेशी ताकतों को अवसर प्रदान किया। जातिवाद के पाप के कारण हमने ही भाईयों को तिरस्कृत कर उन्हें सनातन धर्म से पृथक होने हेतु विवश किया। जातिवाद के विष का ही प्रभाव था, डॉ- भीमराव अम्बेडकर जैसे महान व्यक्तित्व को बौद्ध सम्प्रदाय स्वीकार करना पड़ा। हृदय विदारक घटनाओं से जिसमें मोपला कांड जिससे सनातन संस्कृति को  भारी  क्षति हुई, उपेक्षा के  कारण सनातन धर्मियों ने दूसरे सम्प्रदाय को अपना लिया। जातिवाद का ही दुष्परिणाम कश्मीर केरल, पूर्वांचल के कई राज्य हैं  जहॉं  सनातन धर्मी अपने ही देश में अनेक प्रकार के संकट हिंसा और अपमान से भरी जिन्दगी जी रहे हैं। जाति व सम्प्रदाय का ही परिणाम पाकिस्तान, बांग्लादेश व कश्मीर का तांडव है। इस जातिवाद, छुआछूत की मानसिकता ने ही अपनी शक्ति, संगठन देश को कमजोर कर दिया। 
जन्म से मनुष्य की जाति मानने का कहीं शास्त्रों का कोई प्रमाण  नहीं है।
योगिराज श्रीकृष्ण ने चार वर्ण को कर्म के अनुसार माना. संसार के श्रेष्ठतम विद्वान आचार्य मनु ने जन्म से जाति को नहीं माना है। कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का सिद्धांत माना हुआ है। जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्चयते। जन्म से सभी शूद्र हैं, ज्ञानमय संस्कारों से ब्राह्मण बनते हैं। जन्म से सभी शूद्र अर्थात अज्ञानी ही होते हैं। क्योंकि बालपन में किसी को कोई ज्ञान नहीं होता इसलि, सभी को शूद्र कहा जाता है, परमात्मा ने हमे यह स्वतंत्रता दी है कि हम अपने जीवन को ब्राह्मण, वेश्य या शूद्र जो बनाना चाहे स्वयं बना सकते हैं। जन्म से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वेश्य पैदा नहीं होता। शूद्र को किसी जाति से जोड़ना मूर्खता है।
प्राचीन समय में वर्ण व्यवस्था ही व्यवहार में थी  पुष्टि तुलसीदास जी की इन पंक्तियों से भी होती है।
वर्णश्रम निज-निज धरम निरत वेद पथ लोग।
 चलहिं सदा पावहिं सुखई नहिं भय सोक न रोग।।
जाति शब्द का उपयोग  प्राणियों की एक प्रकार की श्रेष्ठता के लिए किया जाता है, पहले यही किया जाता था। जैसे पंखों से उड़ने वाले समस्त प्राणियों की जाति पतंग विहंग जाति, जल में रहने वाले समस्त जीवों की जलचर जाति, चैपा, प्राणियों की पशु  जाति और मनुष्य के रूप में जन्में सभी की मानव जाति एक ही कहलाएगी
हमारी सनातन संस्कृत मनुष्य बनने का सन्देश देती है। ‘‘मनुर्भव जन्या दैव्यमः जनम‘‘ पहले स्वयं मनुष्य बनो और दूसरो को भी मनुष्य बनाओ। किसी जाति का सदस्य बनने का नहीं कहा।
हम जिन भगवान राम को मानते हैं, उन्होंने सबको गले लगाया। जिनके रातदिन गीतों में बसते हैं रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम’’ पर उसे अपने जीवन में आत्मसात नहीं करते।
लेखक - प्रकाश आर्य
मंत्री -सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली

मूर्ति और भगवान अपना बचाव खुद ही करें


भारत देश धीरे-धीरे धार्मिक राजनीति की तोड़फोड़ की एक ऐसी प्रयोगशाला बनता जा रहा है जिसके छींटे हर एक राजनैतिक दल की आस्तीन पर लगे हैं। त्रिपुरा से शुरू हुई लेनिन की मूर्ति तोड़ने की राजनीति अब तेजी से देश के बाकी हिस्सों में भी फैल रही है। हाल ही में बिहार के नवादा शहर के गोंदापुर इलाके में बजरंगबली की एक मूर्ति टूटने की खबर आई।  अचानक ही लोगों की भीड़ बजरंगबली के चबूतरे के पास जमा हो गई और देखते ही देखते हिंसक हो गई। इधर मूर्ति तोड़े जाने के कारण पत्थरबाजी जारी ही थी कि थोड़ी देर बाद लोगों ने शहर की ही हजरत सैय्यद सोफी दुल्ला शहीद शाह की मजार में आग लगा दी। मजार के लोगों का कहना है कि पास के हिन्दुओं ने ही मजार को जलने से बचा लिया। हालाँकि गोंदापुर के उस चबूतरे पर प्रशासन ने नई मूर्ति लगवा दी है। स्थानीय लोगों का कहना है गोंदापुर के लोगों के लिए भी यह कोई श्र(ा और आस्था का लोकप्रिय केंद्र नहीं था, लेकिन मूर्ति तोड़े जाने के बाद से यह जगह काफी चर्चित हो गई है। 

इससे दो दिन पहले उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में झूंसी के त्रिवेणीपुरम में डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति को निशाना बनाया गया था। आजमगढ़ में, तमिलनाडु के चेन्नई में बी आर अंबेडकर की मूर्ति तोड़ी गई थी। उसमें उनकी गर्दन को धड़ से अलग कर दिया गया था। कर्नाटक में पेरियार की मूर्ति और कोलकाता में महात्मा गांधी की मूर्ति को नुकसान पहुंचाया गया था। ज्ञात हो त्रिपुरा की घटना के अगले दिन कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति तोड़ कर उसके मुंह पर कालिख पोत दी गई थी।
ये सब कुछ ठीक उसी तरह प्रतीत हो रहा है जिस तरह पाकिस्तान समेत अन्य मध्य एशियाई देशों में मस्जिदों को लेकर संघर्ष होता चला आ रहा है कि मस्जिदों पर किसका वर्चस्व हो! इस संघर्ष ने अभी तक कई देशों को बर्बादी की कगार पर पहुँचाया है। लगता है अब भारत में ज्यादा मूर्ति किसकी हों इस संघर्ष ने जन्म ले लिया। घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों को देश के इतिहास की बहुत कम जानकारी है और आज हम यह सब इसी का नतीजा देख रहे हैं। 

देश के स्वतन्त्रता संग्राम में शामिल भारत माता के सच्चे सपूतों और महापुरुषों की मूर्ति स्थापित करने की परम्परा रही है। स्वतन्त्रता के बाद क्रांतिकारियों और महापुरुषों की प्रतिमाओं की स्थापना की जाती रही है। ताकि देश के शासक और प्रजा इन वीरों के बलिदान को जेहन में जिन्दा रख सकें।  दूसरा हमारे देश में मूर्तियों के सहारे राजनीति करने की परम्परा कभी नहीं रही है लेकिन बदलते राजनैतिक दौर में कुछ दलों ने मूर्ति आधारित राजनीति शुरू कर दी है। उत्तर प्रदेश में बसपा कार्यकाल में जितनी मूर्तियां स्थापित की गइंर् उतनी शायद आजादी के बाद से नहीं की गयी होगी। एक किस्म से कहें तो क्रांतिकारियों और महापुरुषों के बलिदान और कार्यों को आज देश के राजनितिक दलों द्वारा बन्दरबाँट किया जा रहा है। 

लेनिन हमारे कोई महापुरुष या आजादी के दीवाने सैनिक नहीं हैं वह वामदलों के राजनैतिक आस्था के प्रतीक हो सकते हैं। भारत देश में उनकी प्रतिमा स्थापित करने का कोई औचित्य भी नहीं है क्योंकि वह भारतमाता के धराधाम से जुड़े हुए नहीं हैं। इसके बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस तरह तोड़फोड़ मनमानी करने का अधिकार किसी को भी नहीं है इसलिए जिसने भी मूर्तियों को तोड़कर आपसी समरसता पर हमला और हिंसा फैलाने की कोशिश की है उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए। 

इतिहास इसका गवाह है कि आर्य समाज मूर्ति पूजा के पक्ष में नहीं रहा लेकिन मूर्तियों को इस तरह से नुकसान पहुंचाना बहुत ही गंभीर बात है क्योंकि ये सिर्फ चुनाव की राजनीति नहीं है, यह समाज और सभ्यता के नाम पर एक जंग की तैयारी हो रही है। मूर्तियों को तोड़ना या भीड़ के जरिए किसी को मारना आम जनता के बीच इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। मुझे नहीं लगता कि यह सिलसिला जल्दी थमने वाला है। क्योंकि वर्तमान में इन घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कोई नजर नहीं आ रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी की निंदा अपनी जगह ठीक है लेकिन भड़काऊ बयान देने वालों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। सवाल ये भी है कि क्या देश में राजनीतिक विरोध अब दुश्मनी में तब्दील होता जा रहा है? मूर्तियां गिराना क्या इसी उग्र राजनीतिक मानसिकता का नमूना है! हमारी पूरी राजनीति इसी तरफ जा रही है लोकतंत्र में जब तक ऐसी घटनाओं पर राजनीति रहेगी तब तक इन सभी घटनाओं को रोक पाना बहुत मुश्किल है।

इतना हिंसा भरा वातावरण तैयार कर दिया है कि लोगों को लग रहा है कि हम मूर्तियां तोड़ सकते हैं, दूसरों का कत्ल कर सकते हैं, किसी को जला सकते हैं, उसका वीडियो इंटरनेट पर डाल सकते हैं, अपना मुंह बिना छिपाए गर्व से कह सकते हैं कि हम लोगों की जान ले रहे हैं। मुझे लगता है अभी तो यह सिर्फ शुरुआत है कुछ दिनों में मंदिर-मस्जिद का मुद्दा भी रफ्तार पकड़ेगा। 2019 में चुनाव आने वाले हैं इसलिए मुझे लगता है कि यह सब चीजें अब बस बढ़ती ही जाएंगी। ऐसे में मूर्तियाँ और भगवान अपना बचाव खुद ही करें तो ठीक है। 
-राजीव चौधरी


क्या देश धीरे-धीरे सुलग रहा है..?


पश्चिम बंगाल, राजस्थान और बिहार के कई हिस्सों में रामनवमी के दौरान हुई हिंसा की घटनाएँ थमी भी नहीं थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति कानून में बदलाव के विरोध में आहूत ‘‘भारत बंद’’ हिंसक हो गया। करीब 12 लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग जख्मी हो गए। बंद समर्थकों ने यातायात पर भी अपना गुस्सा उतारा। कहीं ट्रेनें रोकी गईं तो कहीं बसों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस चौकी जलाने के साथ पुलिसकर्मियों को भी निशाना बनाया गया। 
दलित आंदोलन की आग से पश्चिमी यूपी सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। मेरठ, मुजफ्फरनगर, फिरोजाबाद, हापुड़, बिजनौर और बुलंदशहर सहित पश्चिमी यूपी के जिलों में जमकर तोड़फोड़ और हिंसा हुई। सबसे ज्यादा हालात मध्य प्रदेश, यूपी, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में खराब दिखे। भिंड-मुरैना और ग्वालियर जिले में भी छह लोगों की मौत हो गई। यहां पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ गया। हालात पर काबू करने के लिए पुलिस को कई जगह लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले दागने पड़े। 

दरअसल अनुसूचित जाति-जनजाति कानून जोकि 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसमें संशोधन की बात की गयी थी।
एकाएक मामला कुछ यूँ उभर कर आया जब दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक शख्स ने महाराष्ट्र के सरकारी अधिकारी सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में महाजन पर शख्स ने अपने ऊपर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अपने दो कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाने का आरोप लगाया था। काशीनाथ महाजन ने एफआईआर खारिज कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इससे इन्कार कर दिया था। इसके बाद महाजन ने हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने उन पर एफआईआर हटाने का आदेश देते हुए अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक का आदेश दिया था। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दे दी थी।
कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही देश के दलितों में काफी क्रोध पनपने लगा था, जिसने एक हिंसक रूप ले लिया है। हालाँकि मोदी सरकार ने दलितों के हक में सोमवार ;2 अप्रैलद्ध को कोर्ट के सामने इस फैसले को लेकर पुर्नविचार याचिका दायर कर दी थी। लेकिन इसके बाद भी मोदी योगी मुर्दाबाद भाजपा आर.एस.एस. मुर्दाबाद जैसे नारों के साथ हिंसा का दौर देर शाम तक चलता रहा।
कथित ऊंची जातियों द्वारा दलितां को किसी प्रकार के शोषण से बचाने के लिए देश में 1995 में एसटी.एससी एक्ट लागू हुआ। मगर हालिया रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश भर में लाखों दलित उत्पीड़न से जुड़े केस सामने आते हैं जिनमें से सैकड़ों फर्जी होते हैं। 
दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों के नेता केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग करने के साथ ही हिंसा का मूक समर्थन भी करते दिखे। जहाँ राजनेताओं को दलीय भावना से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता और समरसता की भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, वहां हिंसा, आगजनी को प्राथमिकता दी गयी। वोट की राजनीति के लिए  स्वार्थ की फूंक से हिंसा को रोज सुलगाया जा रहा है।
शायद इसी कारण ही एक बार फिर कलमकारों ने असली सवाल दबा दिए। क्योंकि जो चेहरे और तस्वीरें सामने आईं हैं जो संशय पैदा करती हैं कि क्या दलित आंदोलन में हिंसा भड़काने में कोई और भी शामिल था? पुलिस ने जब गोलियां नहीं चलाई तो ये मौतें कैसे हुईं? क्या आंदोलनकारी एक दूसरे को मार रहे थे? या कोई और आंदोलन को दूसरी तरफ ले जा रहा था। ये जरुर जांच का विषय है।
यद्यपि किसी भी कानून में सुप्रीम कोर्ट का यह पहला संशोधन नहीं है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों द्वारा बने सामाजिक कानूनों को चुनौती दी थी। इससे पहले जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने पति और ससुरालियों के उत्पीड़न से महिलाओं को बचाने वाली भारतीय दंड संहिता की मशहूर धारा 498-ए पर अहम निर्देश जारी किए थे। जिसमें सबसे अहम निर्देश यह था कि पुलिस ऐसी किसी भी शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं करेगी। महिला की शिकायत सही है या नहीं, पहले इसकी पड़ताल होगी। ऐसा ही कुछ हाल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानून की धारा 354 के सेक्शन ए.बी.सी.डी और रेप के खिलाफ बनी कानून की धारा का भी दुरुपयोग बहुतेरे मामलों में झूठा पाया गया। 
अब बीएसपी प्रमुख मायावती शीर्ष अदालत की ओर से किए गए बदलाव के बाद सरकार के रवैये की जमकर आलोचना कर रही हैं, लेकिन 2007 में जब वह उत्तर प्रदेश में सत्ता में थीं तो उस समय उन्होंने इस कानून के हो रहे दुरुपयोग पर राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि जाँच के बाद ही कारवाही हो ताकि किसी निर्दोष को सजा न मिले। किन्तु आज हिंसा को शब्दों और संवेदना की ओट में खड़ा कर जायज सा ठहराने की मांग सी हो रही है।
लेख-राजीव चौधरी

क्या पुनर्जन्म का वैज्ञानिक आधार है?


पुनर्जन्म एक ऐसा आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विषय है जो हमेशा से मानने न मानने के विवाद का विषय रहा है. मसलन पुनर्जन्म को मानने वाले लोग भी रहे है और न मानने वाले भी. पर क्या पुनर्जन्म का कोई वैज्ञानिक आधार है? यदि  इस सवाल पर आगे बढे तो भारतीय फोरेंसिक वैज्ञानिक विक्रम राज सिंह चौहान यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि पुनर्जन्म वास्तविक है. उन्होंने भारत में फॉरेन्सिक वैज्ञानिकों के अगस्त 2016 में एक राष्ट्रीय सम्मेलन में अपने कुछ निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए थे.

चौहान ने एक छह वर्षीय लड़के की खोज की थी, जो कहता था कि वह अपने पिछले जन्म को याद करता था. वह लड़का अपना पूर्व जन्म के साथ अपने माता-पिता और उस विद्यालय का नाम भी जानता था जहाँ वह पढता था. घटना 10 सितंबर, 1992 की थी उस समय वह अपनी बाइक से घर पर जा रहा था. दुर्घटना हुई लडकें के सिर में चोटें आई और अगले दिन मर गया.

इस घटना के बाद लड़के का अगला जन्म हुआ और लडकें ने परिवार को अपनी कहानी सुनाई, उसके पिता ने बताया कि उनके बेटे ने दावा किया कि जब वह दुर्घटना हुई थी, तब उसकी किताबों पर खून के निशान लगे थे उसने यह भी बताया कि उसके पर्स में कितना पैसा था. जब यह दावा उसकी पूर्व माँ तक पहुंचा तो उसने रोना शुरू किया और कहा कि उसने अपने बेटे की याद में उसकी खून के दाग लगी किताबें और उसका पर्स ज्यों का त्यों रख लिया था. यही नहीं लडकें ने यह भी बताया था कि उस दुर्घटना के दिन उसनें दुकानदार से उधार में एक रजिस्टर भी खरीदा था.

सबसे पहले विक्रम चौहान ने इस कहानी पर विश्वास करने से इनकार कर दिया लेकिन वह अंततः उसने जिज्ञासु बनकर इस मामले की जांच करने का फैसला किया. चौहान ने उस दुकानदार के उधारी की बही चेक की तो 10 सितंबर, 1992 को लड़के के नाम पर एक रजिस्टर खरीदा गया था. चौहान ने दोनों लड़कों की लिखावट का नमूना लिया और उनकी तुलना की. उन्होंने पाया कि वे समान थी. यह फोरेंसिक विज्ञान का एक बुनियादी सिद्धांत है कि कोई भी दो लिखावट शैली समान नहीं हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की लिखावट में विशिष्ट विशेषता होती है. एक व्यक्ति की लिखावट शैली व्यक्तिगत व्यक्तित्व लक्षणों से तय होती है. चौहान ने इसके बाद कहा ऐसा माने यदि आत्मा एक व्यक्ति से दूसरे में स्थानांतरित होती तो मन-और इस तरह लिखावट एक ही रहेगी. कई अन्य फोरेंसिक विशेषज्ञों ने इस हस्तलिपि के नमूने की जांच की और वे सहमत हुए कि वे समान थे. जाँच जब आगे बड़ी तो वैज्ञानिक जो बच्चे के बोद्धिक विकास की निगरानी कर रहे थे. के सामने सबसे चौकाने वाला पहलू यह था बच्चा इस जन्म में गरीब परिवार में था जहाँ वह कभी स्कूल नहीं गया लेकिन जब उसे अंग्रेजी और पंजाबी वर्णमाला लिखने के लिए कहा गया तो उसने उन्हें सही तरीके से लिखा.

इयान स्टीवेन्सन एक मनोचिकित्सक थे जिन्होंने 50 वर्षों के लिए वर्जीनिया स्कूल ऑफ मेडिसिन के लिए काम किया था. वह 1957 से 1967 तक मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष थे, 1967 से 2001 तक कार्लसन के मनोचिकित्सा के प्रोफेसर और अपनी मौत से 2002 तक मनोचिकित्सा के एक शोध प्रोफेसर थे. उन्होंने अपने पूरे जीवन को पुनर्जन्म शोध में समर्पित किया था.  उन्होंने निम्न सवाल जैसे क्या मृत्यु के बाद जीवन का कोई ठोस प्रमाण है? क्या पुनर्जन्म वास्तव में होता है? क्या मृत्यु के बाद जीवन है और क्या वह जीवन वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है? इन सभी सवालों के बाद वह अंत में अपना पक्ष रखते हुए कहते है कि मौत का अनुभव, मौत के दृश्य, आत्मिक चेतना, यादें और शारीरिक चोटें एक जीवनकाल से दूसरी तक स्थानांतरित हो सकती हैं.

इयान स्टीवेन्सन ने दुनिया भर के बच्चों के 3,000 मामलों की जांच की जो पिछले जन्मों को याद करते हुए पाए गये 40 वर्षों की लम्बी अवधि में बड़े पैमाने पर इयान ने अनेक देशों की यात्रा की. उनके सूक्ष्म शोध ने कुछ सबूतों को प्रस्तुत किया कि ऐसे बच्चों में कई असामान्य क्षमताएं, बीमारियाँ, और आनुवंशिक लक्षण पूर्व जन्म के साथ सामान पाए गये.

स्टीवेन्सन समस्त जन्मों को पूर्वजन्म बताते हुए अपना पक्ष रखते है कि आमतौर पर बच्चे दो और चार की उम्र के बीच अपनी यादों के बारे में बात करना शुरू करते हैं जब बच्चा चार और सात साल के बीच होता है तो ऐसे समय में शिशु की यादें धीरे-धीरे कम होती जाती हैं. हमेशा कुछ अपवाद होते हैं, जैसे कि एक बच्चा अपने पिछले जीवन को याद रखना जारी रखता है लेकिन इसके बारे में विभिन्न कारणों से नहीं बोल रहा है.

अधिकांश बच्चे अपनी पिछली पहचान के बारे में बहुत तीव्रता और भावना के साथ बात करते हैं. अक्सर वे खुद के लिए नहीं तय कर सकते हैं कि दुनिया असली है या नकली. वे एक तरह का दोहरा अस्तित्व अनुभव करते हैं, जहां कभी-कभी एक जीवन अधिक महत्वपूर्ण होता है, और कभी-कभी दूसरा जीवन. बच्चें की यह अवस्था उस समय ऐसी होती हैं जैसे एक समय में दो टीवी पर अलग-अलग धारावाहिक देखना. लेकिन समय के साथ एक स्मृति धुंधली हो जाती है.

इसके बाद अगर व्यवहार से उदाहरण ले तो यदि बच्चे का जन्म भारत जैसे देश में बहुत गरीब और निम्न जाति के परिवार में हुआ है जबकि अपने पिछले जीवन में उच्च जाति का वह सदस्य था, तो यह अपने नए परिवार में असहज महसूस कर सकता है. बच्चा किसी के सामने हाथ पैर जोड़ने से मना कर सकता है और सस्ते कपड़े पहनने से इनकार कर सकता है. स्टीवनसन इन असामान्य व्यवहारों के कई उदाहरण बताते हैं. 35 मामलों में उन्होंने जांच की, जिन बच्चों की मौत हो गई उनमें एक अप्राकृतिक मौत का विकास हुआ था. उदाहरण के लिए, यदि वे पिछली जिन्दगी में डूब गए तो उन्होंने अक्सर पानी में नदी आदि में जाने के बारे में डर व्यक्त किया. अगर उन्हें गोली मार दी गई थी, तो वे अक्सर बंदूक से डर सकते हैं. यदि वे सड़क दुर्घटना में मर गए तो कभी-कभी कारों, बसों या लॉरी में यात्रा करने का डर पैदा होता था.

यही नहीं स्टीवेन्सन ने अपने अध्यन में पाया कि शुद्ध शाकाहारी बच्चा किसी मांसहारी परिवार में जन्म ले तो वह मांसाहार के प्रति अरुचि पैदा कर अलग-अलग भोजन खाने की इच्छा व्यक्त करता हैं. अगर किसी बच्चे को शराब, तम्बाकू या मादक पदार्थों की लत तो वे इन पदार्थों की आवश्यकता व्यक्त कर सकते हैं और कम उम्र में अभिलाषाएं विकसित कर सकते हैं. अक्सर जो बच्चे अपने पिछले जीवन में विपरीत लिंग के सदस्य थे, वे नए लिंग के समायोजन में कठिनाई दिखाते हैं. लड़कों के रूप में पुनर्जन्म होने वाली पूर्व लड़कियों को लड़कियों के रूप में पोशाक करना या लड़कों की बजाए लड़कियों के साथ खेलना पसंद हो सकता है.
स्टीवेन्सन कहते है कि पुनर्जन्म सिर्फ एक गान नहीं है, यह सबूत के छोटे-छोटे टुकड़े जोड़कर एक बड़ा शोध का विषय है. यह अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के मानने न मानने की सिद्धांत नहीं है. यह एक विषय है जो  पुनर्जन्म के सम्बन्ध में सभी अवधारणाओं के साथ आत्मा स्थानान्तरण के लौकिक सत्य को स्वीकार करता है...चित्र साभार गूगल- लेख राजीव चौधरी 

Sunday, 8 April 2018

वेदों के पांच ऋषि

 ऋग्वेद 10/150/ 1-5 मन्त्रों में अग्नि रूप परमेश्वर को सुखप्राप्ति के लिए आवहान करने का विधान बताया गया है। ईश्वर से प्रार्थना करने और यज्ञ में पधारकर मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की गई है। धन, संसाधन, बुद्धि, सत्कर्म इच्छित पदार्थों, दिव्या गुणों आदि की प्राप्ति के लिए व्रतों का पालन करने वाले ईश्वर की उपासना का विधान बताया गया है। अग्निदेव रूपी ईश्वर संग्राम में बुलाने पर अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु इन पांच ऋषियों की रक्षा करते है। आनंदप्राप्ति का कार्य पुरोहित वशिष्ट के माध्यम से गुणों को धारण करने पर होता है। ईश्वर अपनी आदित्य, रूद्र और वसु तीन दिव्यशक्तियों के साथ आकर हमें आन्दित करता है
इस सूक्त में आये पांच ऋषि अत्रि, भरद्वाज, गविष्ठिर, कण्व और त्रसदस्यु हैं।

अत्रि:- भोजन में संयम रखने वाला अथवा काम, क्रोध, लोभ आदि को अपने अंदर प्रविष्ट नहीं होने देने वाला।
भरद्वाज: – अपने अंदर शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक शक्तियों को विकसित करने वाला।
गविष्ठिर:- अपनी वाणी पर स्थिर रहने वाला अर्थात वचन को पूरे मनोयोग से पूर्ण करने वाला।
कण्व:- कण कण में गति करता हुआ चरम उत्कर्ष पर पहुंचने वाला।
त्रसदस्यु- दस्यु/शत्रुओं को दूर करने वाला।
ये पांच ईश्वरीय गुणों वाले ऋषि है और अग्नि रूपी ईश्वर की आदित्य, रूद्र और वसु तीन दिव्यशक्तियाँ हैं। वसु 24 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला है और शरीर को स्वस्थ और पूर्णायु तक बसाए रखने की शक्ति रखने वाला है। रूद्र 44 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपने ज्ञान और कर्म से रोगों को दूर करने वाला है। आदित्य 48 वर्ष तक संयम का पालन करने वाला देवता है। इस यज्ञ का पुरोहित वशिष्ठ अर्थात वह जो कुल, समाज और राष्ट्र को बसाता है।  किसी को उजाड़ता नहीं है। उसे वशिष्ठ कहते है।

इस सूक्त में ऋषियों का अनुकरण करके स्वयं ऋषि गुणों को धारण करने वाले की ईश्वर अपनी दिव्य शक्तियों द्वारा रक्षा करते है।  यही ऋषि बनने का साधन है।  यही उत्कृष्ट ज्ञान ज्योति को प्राप्त करने का मार्ग है।  यही अंतिम ध्येय है।..डॉ विवेक आर्य

क्या बृहदारण्यक उपनिषद में मांसाहार का विधान है?

समाधान
बृहद अरण्यक उपनिषद् ६/४/१८ में मांसाहार के विषय में शंका आती है कि उत्तम संतान कि प्राप्ति के लिए मांस ग्रहण करना चाहिए।
मांसमिक्षमोदनं मांसौदनम्. तन्मांसनियमार्थमाह – आक्षौण वा मांसेन. उक्षा सेचनसमर्थः पुंगवस्तवीयं मांसम्। ॠरिषभस्ततोSप्यधिकवयास्तदीयमार्षभं मांसम्।
शंकराचार्य द्वारा किये गए अर्थ से मांस का ग्रहण करना प्रतीत होता है।
जबकि इसका अर्थ पंडित सत्यव्रत जी सिद्धान्तालंकार अपने एकादषोपनिषद प्रथम संस्करण के पृष्ठ 585 में इस प्रकार से करते है-

जो चाहे कि मेरा पुत्र पंडित हो, प्रख्यात हो, सभा में जाने वाला हो, प्रिय वाणी बोलने वाला हो, सब वेदों का ज्ञाता हो, पूरी आयु भोगे, तो माष अर्थात उड़द के साथ चावल पकवाकर पति-पत्नी दोनों खावें। ऐसा करने से वे दोनों ऐसा पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं जो शरीर में बैल के समान और ज्ञान में ऋषियों के समान होता है। इस स्थल में ‘माँसौदन की जगह माषोदान पाठ ठीक है। दही, घी, चावल, तिल आदि के प्रकरण में उड़द प्रकरणसंगत है, मांस सर्वथा असंगत है। -
उपनिषद् के इस वचन में तीन पदों ‘माँसौदन’, ‘औक्ष्णन’ , ‘ऋषभेण’ को लेकर मुख्य रूप से भ्रान्ति होती है।
पंडित जे.पी. चौधरी काव्यतीर्थ अपनी पुस्तक वेद और पशुयज्ञ प्रथम संस्करण के पृष्ठ 45-46 में माँसौदन का अर्थ उड़द और चावल करते है, औक्ष्णन और ‘ऋषभेण से ‘ऋषभक नामक औषधि का ग्रहण करते है।
गर्भावस्था में चरक ऋषि मद, मांस भक्षण का अध्याय 4 मेंस स्पष्ट रूप से निषेध करते है। सुश्रुत भी शरीराध्याय में गर्भावस्था में दूध के साथ चावल, भात, तिल, उड़द दी आहार को ग्रहण करने का आदेश देते हैं।
अथर्ववेद 3/23/4 में वेद भगवान आरोग्यवृद्धक ओषधि के रूप में ऋषभ के बीजों के प्रयोग का सन्देश देते है।
पंडित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ अपने बृहदारण्यक उपनिषद् के भाष्य में सम्पूर्ण प्रकरण को इस प्रकार से समझाते है-
जो कोई चाहे की मेरा पुत्र कपिल वर्ण- पिंगल हो और दो वेदों का ज्ञानी बन सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करे तो दंपत्ति दही के साथ ओदन बनवा कर घृत मिलाकार दंपत्ति खावे मन चाही संतान उत्पन्न होगी। ६/४/१५
जो कोई चाहे की मेरा पुत्र श्याम वर्ण- रक्ताक्ष हो और तीन वेदों का ज्ञानी बन सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करे तो दंपत्ति जल के साथ चरुनवा घृत मिलाकर दंपत्ति खावे मन चाही संतान उत्पन्न होगी। ६/४/१६
जो कोई चाहे की मेरा कन्या पंडिता होवे और सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करे तो दंपत्ति तिल के साथ ओदन बनवा कर घृत मिलाकार दंपत्ति खावे मन चाही संतान उत्पन्न होगी। ६/४/१७
जो कोई चाहे की मेरा पुत्र पंडित , सुनने के योग्य भाषण देने वाला हो और सब वेदों का ज्ञानी बन सम्पूर्ण आयु को प्राप्त करे तो दंपत्ति उड़द मिला कर घृत मिलाकार दंपत्ति खावे मन चाही संतान उत्पन्न होगी। ६/४/१८
यहाँ तिलौदन का अर्थ तिल आदि पदार्थ है। जिसके पश्चात मांसोदन आया है जिससे की मांस की प्रतीति होती हैं।यहाँ मांस का अर्थ पशु का मृत शरीर होने के स्थान पर जिससे मन प्रसन्न हो और जो शास्त्रों में माननीय हो उसे माँस कहते है होना चाहिए।
क्यूंकि इससे पूर्व के मन्त्रों में भी दही, जल , उरद आदि के साथ घृत का प्रयोग करने का विधान आता हैं।
आगे उक्ष शब्द आता हैं जिसका अर्थ सींचना है।
इससे यह सिद्ध होता है कि उपनिषद् में दंपत्ति को उत्तम पदार्थ ग्रहण करने का सन्देश है। नाकि मांस आदि के ग्रहण करने का।
सन्दर्भ बृहद अरण्यक उपनिषद्-शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ। पृष्ठ- ८९६
इसके अतिरिक्त महात्मा नारायण स्वामी ( बृहद अरण्यक उपनिषद् भाष्य में), पंडित बुद्धदेव विद्यालंकार (पुस्तक-किसकी सेना में भर्ती होंगे? कृष्ण की या कंस की?), आचार्य रामदेव (भारतवर्ष का इतिहास-वैदिक तथा आर्ष पर्व, पंडित गुरुदत्त विद्यार्थी संस्मरण ), आर्यमुनि जी ( वैदिक काल का इतिहास) एवं डॉ शिवपूजन सिंह कुशवाहा (वेदी सिद्धांत मार्तण्ड) , में यही अर्थ करते हैं।

इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि बृहदारण्यक उपनिषद् में मांसाहार का कोई विधान नहीं हैं।

Saturday, 7 April 2018

क्यों देश धीरे-धीरे सुलग रहा है


पश्चिम बंगाल, राजस्थान और बिहार के कई हिस्सों में रामनवमी के दौरान हुई हिंसा की घटनाएँ थमी भी नहीं थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति कानून में बदलाव के विरोध में आहूत ‘‘भारत बंद’’ हिंसक हो गया। करीब 12 लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग जख्मी हो गए। बंद समर्थकों ने यातायात पर भी अपना गुस्सा उतारा। कहीं ट्रेनें रोकी गईं तो कहीं बसों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस चौकी जलाने के साथ पुलिसकर्मियों को भी निशाना बनाया गया। 
दलित आंदोलन की आग से पश्चिमी यूपी सबसे ज्यादा प्रभावित रहा। मेरठ, मुजफ्फरनगर, फिरोजाबाद, हापुड़, बिजनौर और बुलंदशहर सहित पश्चिमी यूपी के जिलों में जमकर तोड़फोड़ और हिंसा हुई। सबसे ज्यादा हालात मध्य प्रदेश, यूपी, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में खराब दिखे। भिंड-मुरैना और ग्वालियर जिले में भी छह लोगों की मौत हो गई। यहां पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ गया। हालात पर काबू करने के लिए पुलिस को कई जगह लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले दागने पड़े।
 
दरअसल अनुसूचित जाति-जनजाति कानून जोकि 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसमें संशोधन की बात की गयी थी।
एकाएक मामला कुछ यूँ उभर कर आया जब दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले एक शख्स ने महाराष्ट्र के सरकारी अधिकारी सुभाष काशीनाथ महाजन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में महाजन पर शख्स ने अपने ऊपर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में अपने दो कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाने का आरोप लगाया था। काशीनाथ महाजन ने एफआईआर खारिज कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इससे इन्कार कर दिया था। इसके बाद महाजन ने हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। इस पर शीर्ष अदालत ने उन पर एफआईआर हटाने का आदेश देते हुए अनुसूचित जाति-जनजाति एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक का आदेश दिया था। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत को भी मंजूरी दे दी थी।
कोर्ट के इस फैसले के बाद से ही देश के दलितों में काफी क्रोध पनपने लगा था, जिसने एक हिंसक रूप ले लिया है। हालाँकि मोदी सरकार ने दलितों के हक में सोमवार ;2 अप्रैलद्ध को कोर्ट के सामने इस फैसले को लेकर पुर्नविचार याचिका दायर कर दी थी। लेकिन इसके बाद भी मोदी योगी मुर्दाबाद भाजपा आर.एस.एस. मुर्दाबाद जैसे नारों के साथ हिंसा का दौर देर शाम तक चलता रहा।
कथित ऊंची जातियों द्वारा दलितां को किसी प्रकार के शोषण से बचाने के लिए देश में 1995 में एसटी.एससी एक्ट लागू हुआ। मगर हालिया रिपोर्ट के अनुसार हर साल देश भर में लाखों दलित उत्पीड़न से जुड़े केस सामने आते हैं जिनमें से सैकड़ों फर्जी होते हैं। 
दलित संगठनों और कई राजनीतिक दलों के नेता केंद्र सरकार से इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग करने के साथ ही हिंसा का मूक समर्थन भी करते दिखे। जहाँ राजनेताओं को दलीय भावना से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता और समरसता की भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, वहां हिंसा, आगजनी को प्राथमिकता दी गयी। वोट की राजनीति के लिए  स्वार्थ की फूंक से हिंसा को रोज सुलगाया जा रहा है।
शायद इसी कारण ही एक बार फिर कलमकारों ने असली सवाल दबा दिए। क्योंकि जो चेहरे और तस्वीरें सामने आईं हैं जो संशय पैदा करती हैं कि क्या दलित आंदोलन में हिंसा भड़काने में कोई और भी शामिल था? पुलिस ने जब गोलियां नहीं चलाई तो ये मौतें कैसे हुईं? क्या आंदोलनकारी एक दूसरे को मार रहे थे? या कोई और आंदोलन को दूसरी तरफ ले जा रहा था। ये जरुर जांच का विषय है।
यद्यपि किसी भी कानून में सुप्रीम कोर्ट का यह पहला संशोधन नहीं है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों द्वारा बने सामाजिक कानूनों को चुनौती दी थी। इससे पहले जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने पति और ससुरालियों के उत्पीड़न से महिलाओं को बचाने वाली भारतीय दंड संहिता की मशहूर धारा 498-ए पर अहम निर्देश जारी किए थे। जिसमें सबसे अहम निर्देश यह था कि पुलिस ऐसी किसी भी शिकायत पर तुरंत गिरफ्तारी नहीं करेगी। महिला की शिकायत सही है या नहीं, पहले इसकी पड़ताल होगी। ऐसा ही कुछ हाल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कानून की धारा 354 के सेक्शन ए.बी.सी.डी और रेप के खिलाफ बनी कानून की धारा का भी दुरुपयोग बहुतेरे मामलों में झूठा पाया गया। 
अब बीएसपी प्रमुख मायावती शीर्ष अदालत की ओर से किए गए बदलाव के बाद सरकार के रवैये की जमकर आलोचना कर रही हैं, लेकिन 2007 में जब वह उत्तर प्रदेश में सत्ता में थीं तो उस समय उन्होंने इस कानून के हो रहे दुरुपयोग पर राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि जाँच के बाद ही कारवाही हो ताकि किसी निर्दोष को सजा न मिले। किन्तु आज हिंसा को शब्दों और संवेदना की ओट में खड़ा कर जायज सा ठहराने की मांग सी हो रही है।
राजीव चौधरी