Tuesday, 21 November 2017

शिक्षा की पाठशाला में संस्कारों का कत्ल

पांचवी पास करने के बाद जब छठीं क्लास में दाखिला लिया तो क्लासरूम के बाहर लिखा देखा “विद्या विहीन पशु” यानी बिना विद्या के मनुष्य पशु के सामान होता है। पर जब विद्या पाकर भी इन्सान हिंसक पशु जैसा व्यवहार करे तो उसे क्या लिखा जाना चाहिए? कहीं न कहीं इसे विद्या में खोट कहा जाना चाहिए। इसमें कोई कमी ही कही जा सकती हैं वरना भला क्यों एक 11 कक्षा का छात्र अपने जूनियर,  दूसरी क्लास के अपने से उम्र में बहुत छोटे 7 वर्षीय छात्र की गला रेतकर हत्या करता? सवाल यह भी उठना चाहिए कि शिक्षा के साथ संस्कार, नैतिकता ग्रहण करने गये एक नाबालिग छात्र के मन में इतनी क्रूरता इतनी हिंसा आई कहाँ से? रायन इंटरनैशनल स्कूल में प्रद्युम्न ठाकुर हत्या केस में आरोपी 11वीं कक्षा के हत्यारे छात्र को अब भारतीय न्यायप्रणाली जो भी सजा दे लेकिन प्रद्युम्न माता-पिता को जो जीवनभर के लिए दुःख मिला, उसकी भरपाई नहीं हो सकती हैं।हत्यारे ने एक माँ की ममता को जीवन भर तड़पने के लिए छोड़ दिया।
कहा जा रहा है हत्यारा छात्र अधिकांश समय हताश रहता था। उसे परिजनों की ओर से दबाकर रखा जाता था। वह खुलकर नहीं बोलता था। इससे वह अंदर ही अंदर घुटन महसूस करता था। वह इस कदर कुंठित हो गया और कुंठा निकलने के लिए किसी दुसरे माता-पिता के सपनो का गला चाकुओं से रेत दिया, लेकिन सवाल फिर वही आता है कि आखिर ऐसे हालात क्यों पैदा हुए? कहीं ऐसा तो नहीं इन सब हालात के लिए हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली दोषी है जिसमें तुलना, आगे निकलने की होड़ में बच्चों को धकेला जा रहा हो, उनके मासूम से मस्तिक्षों को प्रेशर कुकर बनाया जा रहा है। शायद यही कारण रहा होगा कि रायन स्कूल में प्रेशर कुकर बनाया गया एक मस्तिक्ष फट गया जिसने एक मासूम को अपनी चपेट में ले लिया।
आधुनिकता में अाेतप्रोत लोग कहते हैं कि प्राचीन भारत का महिमामंडन अब नहीं होना चाहिए लेकिन हमारा वर्तमान इतना खोखला हो चुका था कि अतीत से आत्मबल तलाशने के लिए प्राचीन शिक्षा प्रणाली का महिमामंडन जरूरी हो जाता है। नये भारत को समझने के अतीत के भारत को समझने के लिए गहन प्रयास जब तक नहीं होंगे तब ऐसी हिंसक घटनाओं से दो चार होने से हमें कौन रोक सकता है। हमें समझना होगा कि हम सब हिंसा के शिकार हैं। हिंसा के चक्र में ही जीने के लिए अभिशप्त होते जा रहे हैं, इसलिए बड़े और महंगे स्कूलों का गुणगान करने से पहले इस हिंसा का चेहरा देख लीजिए जो भारत का भविष्य निगलने के लिए कतार में खड़ी है।
बच्चे को महंगे स्कूल और खर्च के लिए रकम देने से संस्कार नहीं आते हैं। यह भी देखना जरूरी है कि बच्चा किस ओर जा रहा है। घर में खुलापन होना चाहिए। बच्चों पर किसी तरह का अनावश्यक दबाव नहीं होना चाहिए। अगर यह होता है तो बच्चा बाहर इसे दूसरे पर निकालता है। कामयाबी के चक्कर में आज बच्चे बहुत अकेले पड़ गए हैं। घरो में सन्नाटा पसर गया हैं। दिमाग पर जोर डालिए, सोचिये आज मेट्रो शहरो में कितनी माओं की गोद में बच्चा देखते है। ऐसा नहीं है कि इनमें कोई माँ नहीं है लेकिन भागती दौडती जिन्दगी ने इनकी गोद से बच्चें छीन लिए जिस कारण वो बच्चें या तो अकेलेपन में पल रहे है या फिर किसी दुसरे के सहारे। अधिकांश वो सहारा किराये का होता है। बिना संस्कार, बिना ममता, बिना वात्सल्य, आदि के पलता वो बच्चा भविष्य में क्या देगा, यह आप बखूबी अंदाजा लगा सकते है।
आधुनिक भारत में शिक्षा प्रणाली और माता-पिता की सबसे बड़ी विफलताओं में दो कारण हैं, एक तो यह बच्चे की सीखने की अक्षमताओं की पहचान करने में असमर्थता और जीवन के अंत में शैक्षणिक विफलता पर विचार करने में असमर्थ हैं। दूसरा आत्मनिरीक्षण कहा जाता है बच्चें के जीवन में माता-पिता और गुरु एक महत्वपूर्ण तत्व है। सत्यार्थ प्रकाश के दुसरे समुल्लास में शतपथ ब्राह्मण का हवाला देते हुए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने कहा है मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद अर्थात जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। यहां ज्ञानवान होने अर्थ यह नहीं कि माता-पिता बड़े डॉक्टर, इंजीनियर या अन्य कोई बड़ा पद रखते हो बल्कि सामाजिकता, आध्यात्मिक का इसमें गहन अर्थ छिपा है। हम प्राचीन समय में देखें तो पता चलेगा कि उस  दौर में शिक्षा प्रणाली सरल थी। प्राचीन समय में इसके तनावपूर्ण होने का भी कोई संकेत नही मिलता है। अब भारत में शिक्षा प्रणाली बदल गयी है और आज के दौर में पढाई तनावपूर्ण हो चुकी है।
इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि दबाव का एक बड़ा हिस्सा माता-पिता की तरफ से आता है। महाराष्ट्र और तमिलनाडु इसका उदाहरण हैं जहाँ बच्चों पर उनके माता-पिता द्वारा हाई स्कूल में विज्ञान और गणित लेने के लिए बाध्य किया जाता है ताकि वह आगे चलकर डॉक्टर या इंजीनियर बन सकें। बच्चों के वाणिज्य या कला में रुचि के विकल्प को नकार दिया जाता है। अब भारत में शिक्षा चुनौतीपूर्ण, प्रतिस्पर्धात्मक हो चुकी है और परिणाम को ज्यादा महत्व दिया जाता है। बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन शैक्षिक प्रदर्शन पर किया जाता है न कि नैतिक। बच्चे को असहमति का अधिकार है? लेकिन इसके उलट शिक्षा और व्यवहार में उसको समझाने और प्रेरणा देने की बजाय मजबूर किया जा रहा है।


स्कूल में छात्रों पर अच्छा प्रदर्शन और टॉप करने के लिए दबाव रहता है तो घरों में कई बार ये दबाव परिवार,भाई- बहन और समाज के कारण होता है। दबाव को लेकर उदास छात्र तनाव से ग्रसित होने के साथ ही पढाई भी बीच में छोड़ देते हैं। ज्यादा मामलों में, तनाव से प्रभावित छात्र आत्महत्या का विचार भी मन में लाते हैं और बाद में आत्महत्या कर लेते हैं। ये बात तो आप भी मानते होंगे कि बचपन की सीख जीवनभर साथ रहती है। बचपन की बातें और यादें, हमेशा हमारे साथ बनी रहती हैं। ऐसे में ये माता-पिता की जिम्मेदारी बन जाती है कि वो अपने बच्चे को कम उम्र में ही उन बातों की आदत डाल दें, जो उसके आने वाले कल के लिए जरूरी हैं ताकि शिक्षा की पाठशाला में संस्कारो का कत्ल होने से बचाया जा सके।..विनय आर्य 

Sunday, 19 November 2017

बांग्लादेश को और कितनी बार नष्ट करेंगे?

फेसबुक पर एक रोती हुई वृद्ध महिला और आग में जलते उसके घर की फोटो देखकर लगा कि यह किसी रोहिंग्या के घर फूंकने का दृश्य है और असहाय रोहिंग्या वृद्धा संपत्ति नष्ट हो जाने की वजह से रो रही है। जब फोटो के नीचे लिखे शब्दों पर निगाह गई तो वहां लिखा था, यह बांग्लादेश के रंगपुर की घटना है। करीब दस हजार मुसलमानों ने हिंदुओं पर हमला किया और लूटपाट करने के बाद उनके घरों में आग लगा दी। बताया गया कि टीटू राय नामक एक व्यक्ति ने सबुक पर इस्लाम का अपमान किया था, लेकिन क्या दस हजार मुसलमानों को एकत्र करना आसान काम है? दुर्भाग्य से आजकल यह करना बहुत सरल है। सिर्फ अफवाह फैलाने की आवश्यकता होती है कि अमुक मुहल्ले या इलाके के हिंदू ने सबुक पर इस्लाम को लेकर गलत बातें लिखी हैं। बस फिर क्या है, उन्मादी मुसलमान हाथों में धारदार हथियार, लाठी, रॉड लेकर हिंदुओं पर टूट पड़ते हैं और उनके घरों को फूंक देते हैं। कोई भी यह जानना नहीं चाहता कि इस्लाम का अपमान कैसे किया गया और जिस पर अपमान करने का आरोप लगा है उसकी सबुक आइडी असली है या नकली? बांग्लादेश के हिंदू जान-बूझकर यह जोखिम उठाने का साहस नहीं करेंगे। कहीं किसी मुसलमान ने ही तो हिंदू के नाम से आइडी बनाकर इस्लाम का अपमान नहीं किया? रंगपुर गांव में जिस तरह हमला किया गया उससे पता चलता है कि मुसलमानों की भीड़ ने पहले से ही हमले की योजना बना रखी थी। ऐसा ही कुछ समय पहले नासिर नगर में भी हुआ था। वहां रसराज नामक एक हिंदू लड़के की कथित सबुक पोस्ट को लेकर हिंदुओं के घरों को जला दिया गया था। कुछ दिनों बाद उसकी सच्चाई सामने आई। रसराज सबुक के बारे में कुछ जानता ही नहीं था। उसके नाम से क सबुक आइडी किसी मुसलमान ने ही तैयार की थी। इतना ही नहीं, हिंदुओं के घर कैसे लूटें-जलाएं और उन्हें आतंकित कर किस तरह बांग्लादेश से भगाया जाए, इसके लिए एक गिरोह बनाया गया था। ठीक इसी तरह रंगपुर में भी किया गया।

टीटू राय नामक कोई व्यक्तिउक्त गांव में पिछले सात वर्षो से रहता ही नहीं। जो टीटू राय सात वर्ष पहले गांव में रहता था वह कर्ज के बोझ से परेशान होकर गांव छोड़कर दूर किसी शहर में कपड़े का धंधा कर जीवन काट रहा है। कथित सबुक एकाउंट पर टीटू राय ने अपना कोई स्टेटस भी नहीं दिया था। उसमें खुलना के मौलाना असदुल्लाह हमीदी का स्टेटस था। असल में मौलाना हमीदी का उद्देश्य सिलेट के एक हिंदू युवक राकेश मंडल को फंसाना था। मौलाना हमीदी के स्टेटस को एमडी टीटू नामक एक शख्स ने शेयर किया था। उस एमडी टीटू को ही रंगपुर के पगलापी इलाके का टीटू राय समझ कर उसके और साथ ही पड़ोसियों के घरों को फूंक दिया गया। नासिर नगर के रसराज के नाम पर भी इसी तरह से एक मुसलमान ने क सबुक आइडी तैयार की थी और फिर हिंदुओं के घरों में लूट के बाद आग के हवाले कर दिया गया था।

बांग्लादेश के मुसलमानों का एक वर्ग दिन-प्रतिदिन कट्टर हिंदू विरोधी होता जा रहा है। दरअसल वे गैर मुस्लिमों को भगाकर बांग्लादेश को मुस्लिम देश बनाने की कोशिश में हैं। उनमें से कई तो यह मानते हैं कि गैर मुसलमानों पर अत्याचार करने से शबाब मिलता है। आतंकवादियों का भी यही मानना है कि काफिरों को धारदार हथियार से काटकर हत्या करने पर शबाब और साथ ही जन्नत भी मिल जाती है। बांग्लादेश में इसी वर्ष मार्च में हिंदुओं को फंसाने के लिए दाऊदकांदी के कुछ मुसलमान इतने उन्मादी हो गए थे कि उन्होंने एक मदरसे में जाकर कुरान पर गंदगी छींट दी थी। अच्छा यह हुआ कि हिंदुओं के घरों को आग लगाने से पहले ही यह खुलासा हो गया कि यह हरकत हबीबुर्र रहमान और उसके साथियों ने की थी। मुङो नहीं पता कि हबीबुर्र रहमान या अन्य को किसी तरह की सजा मिली या नहीं? मैं हैरान हूं कि ऐसे गुंडों के खिलाफ धार्मिक मुसलमानों ने गुस्से का कोई इजहार क्यों नहीं किया?

जैसे बांग्लादेश में हिंदू विरोधी मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है वैसे ही भारत में मुस्लिम विरोधी हिंदुओं की संख्या बढ़ रही है। वे भी मानते हैं कि मुसलमानों को भारत में रहने का अधिकार नहीं है। ऐसे मुस्लिम विरोधी हिंदू यह भी मानते हैं कि 1947 में जो तमाम मुस्लिम पाकिस्तान नहीं गए वे जनसंख्या बढ़ा रहे हैं, आतंकी संगठनों में जुड़ रहे हैं और अल्पसंख्यक होने की वजह से सरकारी सुविधा भी पा रहे हैं। सबसे खतरनाक यह है कि यह सुनते ही कि किसी मुसलमान ने गोमांस का सेवन किया है, उसे सरे आम पीट दिया जाता है। कभी-कभी तो उसकी हत्या भी कर दी जाती है। सभी जगह हिंसा का चेहरा और उसकी भाषा एक जैसी दिखती है। यह सब देखने के बाद मन में आता है कि ये लोग समाज में परिवर्तन चाहते ही नहीं। अंधकार और अशिक्षा ने इन लोगों को अंधा बना रखा है। इसके बावजूद यह कहना होगा कि भारत और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के बीच काफी अंतर है। बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या में कमी आई है। भारत में अल्पसंख्यकों की संख्या बढ़ी है। भारत में मुसलमानों की संख्या पूरे बांग्लादेश की जनसंख्या से अधिक है। भारत में कट्टर हिंदुओं द्वारा मुसलमान पर अत्याचार होता है तो देश उनके साथ होता है। भारतीय कानून हिंदू हो या फिर मुसलमान, सभी को समान आंखों से देखता है, परंतु बांग्लादेश में जब कट्टर मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार होता है तो सरकारी मदद और सरकारी सहानुभूति, कुछ भी नहीं मिलती। वहां हिंदुओं की संख्या इतनी कम हो चुकी है कि उन्हें वोटबैंक के रूप में नहीं देखा जाता। इस्लामपरस्त पार्टियों के लोग वोट डालने गए हिंदुओं को डरा-धमका कर रखते हैं। बांग्लादेश में हिंदू सिर्फ दूसरे दर्जे के नागरिक ही नहीं, बल्कि विलुप्त होती बंगाली जाति हैं। कभी-कभी सोचती हूं कि क्या बांग्लादेश सऊदी अरब जैसा हो जाएगा?

एक ओर बांग्लादेश के मुसलमान म्यांमार सेना के हाथों सताए गए असहाय रोहिंग्या की मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं और दूसरी ओर वे अपने ही देश में हिंदुओं के साथ म्यांमार सेना की तरह का बर्ताव करते हैं। आखिर म्यामांर की बर्बर सेना और बांग्लादेश के मुसलमानों में फर्क क्या रहा? मुङो तो कोई फर्क नहीं दिख रहा। जो भी कट्टरवादी हिंदू, बौद्ध, ईसाई, मुसलामान हैं वे सब एक हैं। वे समाज को पीछे धकेलना चाहते हैं। हिंसा और घृणा ऐसे लोगों का सहारा है। कट्टरवाद के खिलाफ सभी को खड़ा होना होगा। नहीं तो इतने वर्षो में तैयार किए हुए आजाद ख्याल गणतंत्र हिंसा और घृणा से हार जाएंगे। जिस किसी देश से जितनी बार बहुसंख्यकों के अत्याचार से डरकर अल्पसंख्यक भागते हैं उतनी बार उस देश का नुकसान होता है। हम बांग्लादेश को और कितनी बार नष्ट करेंगे?

 साभार दैनिक जागरण लेख-तसलीमा नसरीन 

Wednesday, 15 November 2017

आजादी मिल गई करतार को भूल गये!!

मैं जानता हूं मैंने जिन बातों को कबूल किया है, उनके दो ही नतीजे हो सकते हैं - कालापानी या फांसी। इन दोनों में मैं फांसी को ही तरजीह दूंगा क्योंकि उसके बाद फिर नया शरीर पाकर मैं अपने देश की सेवा कर सकूंगा।’’ ये शब्द उस महान क्रांतिकारी के हैं जिसने मात्र 19 वर्ष की आयु में फांसी के फंदे को सहर्ष हंसते-हंसते गले लगाया। जी हां, क्रांतिकारी आदर्शवाद को एक नई दिशा देने वाला वह अग्रदूत है -करतार सिंह सराभा। अंग्रेजी हुकूमत ने 16 नवम्बर 1915 को इस वीर बालक को लाहौर सैंट्रल जेल में फांसी के तख्ते पर लटका दिया। आखिर दोष क्या था -अपने मुल्क के प्रति वफादारी और गद्दार अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ने की इच्छाशक्ति।

इस महान क्रांतिकारी का जन्म 24 मई 1896 को लुधियाना के सराभा गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम सरदार मंगल सिंह था जिनका निधन जल्दी हो जाने के कारण करतार सिंह का पालन-पोषण उनके दादा जी सरदार बदन सिंह के संरक्षण में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में पूरी करने के बाद लुधियाना के मालवा खालसा हाई स्कूल से आठवीं की परीक्षा पास की। उसके बाद अपने चाचा के साथ उड़ीसा चले गए जहां उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद करतार सिंह को उच्च शिक्षा के लिए कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी (अमरीका) भेज दिया गया। यहां उनका सम्पर्क नालंदा क्लब के भारतीय विद्यार्थियों के साथ हुआ।

1913 में सोहन सिंह भकना और लाला हरदयाल ने गदर पार्टी की स्थापना की। फिर क्या था, 17 वर्ष की छोटी उम्र में करतार सिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़कर गदर पार्टी की सक्रिय सदस्यता ग्रहण कर ली। वह गदर पत्रिका के सम्पादक भी बन गए और बहुत ही अच्छे तरीके से अपने क्रांतिकारी लेखों और कविताओं के माध्यम से देश के नौजवानों को क्रांति के साथ जोड़ा। यह पत्रिका हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगाली आदि भारतीय भाषाओं में छपती थी तथा विदेशों में रह रहे भारतीयों तक पहुंचाई जाती थी।
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद करतार सिंह कोलम्बो के रास्ते नवम्बर 1914 में कलकत्ता पहुंच गए। इनके साथ गदर पार्टी के क्रांतिकारी नेता सत्येन सेन और विष्णु गणेश पिंगले भी थे। बनारस में इनकी मुलाकात रास बिहारी बोस से हुई जिन्होंने करतार सिंह को पंजाब जाकर संगठित क्रांति शुरू करने को कहा।

रास बिहारी बोस 25 जनवरी 1915 को अमृतसर आए और करतार सिंह व अन्य क्रांतिकारियों से सलाह कर अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति शुरू करने का फैसला किया गया। इसके लिए ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिकों की मदद से सैन्य-छावनियों पर कब्जा करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए 21 फरवरी 1915 का दिन सारे भारत में क्रांति के लिए मुकर्रर किया गया।
करतार सिंह ने स्वयं लाहौर छावनी के शस्त्र भंडार पर हमला करने का जिम्मा लिया। सारी तैयारियां पूरी हो गईं लेकिन कृपाल सिंह नामक एक गद्दार साथी पुलिस का मुखबिर बन गया और क्रांति की योजना को पुलिस के सामने रख दिया। फिर क्या था-गदर पार्टी के नेता जो जहां थे, गिरफ्तार कर लिए गए। भारतीय सैनिकों को छावनियों में शस्त्र-विहीन कर दिया गया। इसे अंग्रेजों ने लाहौर षड्यंत्र का नाम दिया।

अपने बचाव में बहस के दौरान करतार सिंह ने अदालत में अंग्रेजी साम्राज्य की काली करतूतों को उजागर किया और क्रांति की ज्वाला को सुलगा दिया। आखिरकार 13 सितम्बर 1915 को फांसी की सजा अदालत की तरफ से सुना दी गई और इस वीर बालक ने 19 वर्ष की छोटी उम्र में अपनी मां की गोद सूनी कर फांसी के फंदे को सहर्ष चूम लिया। लेकिन क्रांति की इस ज्वाला ने सरदार भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी आजादी की लड़ाई के लिए खड़े कर दिए।

हमें आजादी मिल भी गई लेकिन हमने ऐसी महान शहादतों का कर्ज चुकाना नहीं सीखा। उस समय अंग्रेज भारत को लूटते थे और अब देसी अंग्रेज देशवासियों को लूट रहे हैं। करतार सिंह सराभा जैसे क्रांतिकारी क्रांति की एक नई परिभाषा दे गए। उनके बलिदान के 102 वर्ष पूरे होने पर श्रद्धांजलि के रूप में उन्हें फूल-मालाओं की जरूरत नहीं है बल्कि हम सब का कर्तव्य है कि इन शहीदों के सपने पूरे कर देश और देशवासियों को खुशहाल बनाएं।
सेवा देश दी जिन्दड़ीए बड़ी औखी,
गल्लां करनियां ढेर सुखल्लियां ने।
जिनां देश दी सेवा च पैर पाया,
ओहना लख मुसीबतां झल्लीयां ने।
शहीदी दिवस पर विशेष नवोदय टाइम्स 


भारत के मध्यकाल की राजनीति की ओर सऊदी अरब

सऊदी अरब विश्व का सबसे मह्त्वपूर्ण और प्रभावी मुस्लिम देश है इसलिये यहाँ जो घटना घटती है वह न केवल अरब में बल्कि सामान्य रूप से इस्लाम और मुसलमानों के अन्य राज्य और प्रशाशन को भी प्रभावित करती है. यह तथ्य हैं कि मुस्लिम बहुल देश बहुत कम संख्या में लोकतांत्रिक हैं और इस तथ्य का निष्कर्ष इस बात पर पहुँचने को प्रेरित करता है कि इस्लाम धर्म और उसके सामान्य तत्व अपने आप में भी लोकतंत्र से असंगत हैं. हाल ही में सऊदी अरब में एक नई भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने 11 राजकुमारों समेत 4 मंत्रियों और दर्जनों पूर्व मंत्रियों को हिरासत में ले लिया है. हिरासत में लिए गए लोगों में अरबपति प्रिंस अलवलीद बिन तलाल भी शामिल हैं. सऊदी अरब की राजनीति के जानकर कह रहे है अभी ये कहना बेहद मुश्किल है कि ये भ्रष्टाचार ख़त्म करने की दिशा में लिया गया कदम है या इस कारण से मोहम्मद बिन सलमान हर उस आख़िरी रिश्तेदार को अपने रास्ते से हटा देना चाहते हैं जो भविष्य में उनके राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती दे सके.

देखा जाये तो नवम्बर माह के पहले सप्ताह में 24 घंटे के अन्दर अरब के शाही परिवार के 200 लोगों में 2 राजकुमारों की मौत के साथ 11 राजकुमारों को हिरासत में लिया जाना पूरा वाक्या भारत के मुगलकाल की याद ताजा कर रहा है जब आपसी मतभेद के चलते 1657 में शाहजहाँ के बीमार पड़ने के बाद मुगल शाशक औरंगजेब ने अपने पिता को हिरासत में लेने के साथ अपने तीन भाइयों की हत्या करने के बाद सत्तासीन हो गया था. कुछ इसी तरह मोहम्मद बिन सलमान की सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की शुरुआत साल 2013 में तब हुई, जब उन्हें क्राउन प्रिंस कोर्ट का मुखिया चुना गया. इसके बाद जनवरी 2015 में किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अजीज की मौत के बाद पिछले दो सालों से यूरोप में रह रहे सऊदी अरब के तीन राजकुमारों का गायब होना, साथ ही 79 वर्ष की उम्र में किंग बने सलमान ने तत्काल दो ऐसे फैसले लिए जिसने सऊदी अरब की राजनीति को हैरान कर दिया था.

किंग सलमान ने पहला तो अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान को रक्षा मंत्री और मोहम्मद बिन नायेफ को डिप्टी क्राउन प्रिंस बनाने की घोषणा की थी. मोहम्मद बिन नायेफ, सउदी किंगडम के संस्थापक इब्न सउद के ऐसे पहले पोते थे, जो विरासत की क़तार में आगे आए थे. किन्तु फिलहाल देखा जाये तो अरब नगरिकों में, ख़ास कर युवाओं में युवराज मोहम्मद बिन सलमान काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन कहा जा रहा कि बुजुर्ग और रूढ़िवादी लोग उन्हें कम पसंद करते हैं. रूढ़िवादियों का मानना है कि वो कम समय में देश में अधिक बदलाव करना चाहते हैं. जिसके गम्भीर परिणाम हो सकते है. 31 अगस्त 1985 को जन्मे युवराज सलमान तत्कालीन प्रिंस सलमान बिन अब्दुल अजीज अल सऊदी की तीसरी पत्नी फहदाह बिन फलह बिन सुल्तान के सबसे बड़े बेटे हैं.

अरब के वर्तमान प्रसंग और इस्लामिक इतिहास पर यदि नजर डाले तो एक बात साफ होती है कि मुसलमान गैर आनुपातिक दृष्टि से तानाशाहों, उत्पीडकों, गैर निर्वाचित राष्ट्रपतियों, राजाओं, अमीरों और अनेक प्रकार के ताकतवर लोगों के शासन से शासित होते आये हैं और यह सत्य भी है. यहाँ तक की गरीब से गरीब और सबसे अमीर देशों में भी इस्लाम अत्यंत कम राजनितिक अधिकारों से जुडा है. अत: इसमें लोकतांत्रिक अधिकारों के विकास की सम्भावनायें हमेशा से ही कमजोर रही है. जिसमें जिम्मेदार खुद इस्लामी धर्मगुरु भी दिखाई देते है. जो लोकतंत्र के प्रति प्रतिक्रिया देते हुए इसे गैर इस्लामिक घोषित करते हैं. हालाँकि प्रिंस सुलेमान ने वर्तमान में महिलाओं के गाड़ी चलाने से लेकर कुछ नये अधिकार देने की घोषणा के साथ इन दिनों नए प्रबंधन में दिखाई दे रहे है.

सऊदी अरब में सख्त इस्लामिक कानून लागू है. इसके तहत हत्या, ड्रग तस्करी, दुष्कर्म जैसे मामलों में मौत की सजा का प्रावधान है. लेकिन 2014 में वहां राजकुमार अल कबीर को मौत की सजा का फरमान सुनाया जाना शाही परिवार के सदस्यों को मौत की सजा मिलना एक दुर्लभ घटना है. इससे पहले शाही परिवार के किसी सदस्य को मौत की सजा का आखिरी मामला साल 1975 में सामने आया था. हालाँकि सऊदी अरब के बारे में कहा जाता है कि वह सर्वाधिक अपारदर्शी और अस्वाभाविक देश है जहाँ पर कोई भी सार्वजनिक फिल्मी थियेटर नहीं है, जहाँ महिलाओं को वाहन चलाने का अधिकार अगले साल से मिलेगा, जहाँ पुरुष महिलाओं के अंतःवस्त्र बेचते हैं, और वहां शासक लोकतंत्र की एक सामान्य सी व्यवस्था का भी विरोध करते हैं. पवित्र शहर मक्का और मदीना पर नियंत्रण, इस्लाम की वहाबी व्याख्या का विस्तार और विश्व के सबसे बडे पेट्रोलियम भाग पर अपना कब्जा बनाये रखना, वहाबीवाद इसकी वैश्विक मह्त्वाकाँक्षा को प्रेरित करता है और तेल की आय इसके उद्यम को आर्थिक सहायता प्रदान करती है


प्रिंस सुलेमान आज अरब में आधुनिकता के साथ सुधार की बाते कर रहे है लेकिन नव सुधारवादी प्रिंस के फैसलों से ऐसा कुछ प्रतीत नहीं हो रहा हैं जबकि इसे अपने मध्यकालीन पूर्वजों से अच्छा करना होगा, और अपने धर्मग्रंथों की व्याख्या वर्तमान समय के अनुसार करनी होगी. यदि प्रिंस अपने मजहब को आधुनिक बनाना चाहते हैं तो उन्हें गुलामी, ब्याज , महिलाओं के साथ व्यवहार, इस्लाम को छोडने के अधिकार के साथ अन्य मामलों में अपने अन्य एकेश्वरवादियों प्रजातांत्रिक राष्ट्रों की तरह आचरण का पालन करना होगा. क्योंकि वर्तमान समय में इस्लाम एक पिछ्डा, आक्रामक और हिंसक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है इसके बाद ही एक सुधरा हुआ इस्लाम उभर सकता है. हालाँकि सऊदी अरब में हालात तेजी से बदल रहे हैं और अरब जगत का सबसे बड़ा देश एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर 85 सालों में अभूतपूर्व हलचल से गुजर रहा है. तीन साल पहले इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि सत्ता के जाने-पहचाने स्तंभों को सार्वजनिक और अपमानजनक ढंग से कार्यालयों से हटाकर हिरासत में लिया जाएगा. युवराज सलमान आज सऊदी युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं, मगर आलोचक कहते हैं कि वह बड़ा दांव खेल रहे हैं, जबकि कुछ कहते है कि इन हिरासतों और राजकुमारों की मौतों को देखकर लगता है जैसे सऊदी अरब भारत की 16 सदी से गुजर रहा हो बस आज साधन बदले है सत्ता पाने की ललक और योजना का ढर्रा पुराना ही दिखाई दे रहा है...Rajeev choudhary 

जहरीला धुआं इसका जिम्मेदार कौन


आसमान में बादलो के तरह छाये जहरीले धुएं के कारण आजकल भारत की राजधानी दिल्ली की भी साँस उखड रही है. जीव एक-एक साँस के सहारे जीवन पूरा करता है, लेकिन जब वो साँस ही जहरीली हो जाये तो कोई क्या करें? वर्तमान हालात आपातकाल जैसे हैं. आँखों में जलन के साथ पानी आ रहा है. स्कूल बंद किये जा रहे है. विशेषज्ञों और न्यूज एजेंसियों के अनुसार हालात कमोबेश वैसे ही हैं जैसे लंदन में 1952 के ग्रेट स्मॉग के दौरान थे. उस दौरान वहां करीब 4,000 लोगों की असामयिक मौत हो गई थी. इस विषय के विशेषज्ञों का मानना है यदि दिल्ली में हवा का ऐसा ही स्तर बना रहा तो यहाँ भी असामयिक मौतें हो सकती हैं. सीएसई ने पिछले साल एक रिपोर्ट में कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में हर साल करीब 10,000 से 30,000 मौतों के लिए वायु प्रदूषण जिम्मेदार होता है.

व्यस्त जीवन रोजाना की भागदौड और घर से ऑफिस और ऑफिस से घर, किसके पास टाइम है इन बातों पर ध्यान देने का! बस 5० या 100 रूपये का मास्क ले लिया मानों साँस शुद्ध हो गयी और सब कष्ट दूर हो गये हम तो निपट गये जहरीले धुएं से तो हमारी जिम्मेदारी खत्म! कोई करें भी तो क्या? क्योंकि करने वाले ही कल दिल्ली में इस जहरीले धुएं से निपटने की योजना बनाने के बजाय पिछले साल हुई नोटबंदी का विरोध और जश्न मना रहे थे. हाँ ये बात सब मान रहे हैं कि हालात खराब हैं और इनसे निबटने के लिए सरकार को ही कोशिश करनी चाहिए पर एक सवाल यह भी हैं क्या बिना नागरिकों के शामिल हुए धुएं से पार पाने के इस युद्ध में अकेली सरकार जीत जाएगी? समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों के माध्यम से बताया जा रहा कि सांसों के जरिये फेफड़े में दाखिल होने वाले प्रदूषक कण प्रदूषण मापने की इकाई के अनुसार  (पीएम) 2.5 और (पीएम) 10 का स्तर कई स्थानों पर सुरक्षित सीमा से 17 गुना ज्यादा रहा. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ओर से संचालित निगरानी स्टेशनों का हर घंटा वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 500 से ज्यादा रहा जोकि अधिकतम सीमा से कहीं ज्यादा है.

फिलहाल इस सबके लिए हरियाणा, पंजाब के खेतों से उठे धुएं को जिम्मेदार माना जा रहा है लेकिन तथ्य यह भी है कि पराली तो किसान सालों से जला रहे जबकि धुएं का दानव पिछले तीन चार सालों से लोगों को ज्यादा निगल रहा है. क्या इसमें अकेले किसान ही दोषी है? पेट्रोल, डीजल के बेशुमार दौड़ते वाहन और कचरे और लकड़ी जलाना क्या प्रदूषण के लिए जिम्मेदार नहीं है? हमने पहले भी लिखा था कि कटते जंगल और बढ़ते सीमेंट के जंगलों से बने शहरों से निकलता विषैला धुआं, फैक्ट्रियों, कारखानों और मोटर-कारों से निकलता जहर वातावरण को गैस चैंबर बनाता जा रहा है. यदि आज प्रदूषण से उत्पन्न महाविनाश के विरुद्ध सामूहिक रूप से कोई उपाय नहीं किया जायेगा तो कब तक मानव जीवित रह पायेगा कोई परिकल्पना नहीं की जा सकती.

पिछले ही दिनों समुद्र के किनारों पर व्हेल मछलियों का मृत मिलना तो आसमान से पक्षियों का बेहोश होकर जमीन पर गिरना ये खबरें आज किसी के लिए कोई मायने नहीं रखती. थोड़े आगे भविष्य में यदि हम स्वच्छ वायु के लिए ओक्सीजन सिलेंडर पीठ पर बांधकर चले तो इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता. यदि कोई सोच रहा हो कि नहीं ऐसा तो नहीं होगा, तो उनसे बस यह सवाल है कि क्या आज से बीस-तीस वर्ष पहले किसी ने सोचा था कि हमें साफ पानी के लिए घरों में फिल्टर आदि लगाने पड़ेंगे?

पिछले दिनों एक वेबसाइट पर आंकड़े देखे उन्होंने बड़ी सरलता से आंकड़े दिए थे कि भारत में अब प्रति व्यक्ति सिर्फ 28 पेड़ बचे हैं और इनकी संख्या साल दर साल कम होती जा रही है. अब यदि कोई दिल्ली में बैठकर सोचे कि हमारे हिस्से अभी 28 पेड़ है तो वह गलत है क्योंकि ये पेड़ों की गणना पुरे देश उसी तरह है जिस तरह जनगणना. नेचर जर्नल की इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में एक व्यक्ति के लिए 422 पेड़ मौजूद हैं. दूसरे देशों की बात करें तो पेड़ों की संख्या के मामले में रूस सबसे आगे हैं. रूस में करीब 641 अरब पेड़ हैं, जो किसी भी देश से ज्यादा हैं. इसके बाद 318 अरब पेड़ों की संख्या के साथ कनाडा दूसरे स्थान पर, 301 अरब पेड़ों की संख्या के साथ ब्राजील तीसरे स्थान पर और 228 अरब पेड़ों की संख्या के साथ अमेरिका चौथे स्थान पर है.

हम आज इन देशों से अपनी तुलना फैशन से लेकर भाषा और रहन सहन से कर रहे है, जब इनकी तरह हमारी एक नागरिक के तौर पर जिम्मेदारी आती है तो हम सरकार क्या कर रही है? यह सवाल दागकर अपनी जिम्मेदरी से विमुख हो जाते है. आज हमारे देश में मंदिरों, मस्जिदों, बुतों-पुतलों मूर्तियों मजारों के लगाने हटाने के लिए रोज झगड़े होते है. जबकि किसी की भी याद में लगाई गई मूर्तियां या मजार ऑक्सीजन नहीं देती, बल्कि पेड़ ऑक्सीजन देते हैं. बिना रोटी और बिन दवा और अन्य आर्थिक कारणों से लोग मरते है सबने सुना होगा लेकिन जब लोग खुले मैदान में भी साँस की वजह से मरेंगे तो सोचों जिम्मेदार कौन होगा?..राजीव चौधरी