Sunday, 10 December 2017

राममंदिर विध्वंस एवं तुलसीदास

-अरुण लवानिया

आपको कुछ मुसलमान और कम्युनिस्ट यह चिल्लाते दिखेंगे कि अगर बाबर ने हिन्दू मंदिर तोडा होता तो तुलसीदास ने लिखा होता। मगर इसका कोई प्रमाण रामचरितमानस में नहीं मिलता। सत्य यह है कि तुलसीदास जी ने बाबर के हाथों राममंदिर विध्वंस का वर्णन लिखा था। यह वर्णन रामचरितमानस में नहीं अपितु दोहा शतक में किया था। तुलसी दास जी ने दोहा शतक 1590 मे लिखा था। इसके आठ दोहे , 85 से 92, में मंदिर के तोड़े जाने का स्पष्ट वर्णन है। इसे रायबरेली के तालुकदार राय बहादुथ बाबू सिंह जी 1944 में प्रकाशित किया।यह राम जंत्रालय प्रेस से छपा। यह एक ही बार छपा और इसकी एक प्रति जौनपुर के शांदिखुर्द गांव में उपलब्ध है।

इलाहाबाद उच्च नयायालय में जब बहस शुरू हुयी तो श्री रामभद्राचार्य जी को Indian Evidence Act के अंतर्गत एक expert witness के तौर पर बुलाया गया और इस सवाल का उत्तर पूछा गया। उन्होंने कहा कि यह सही है कि श्री रामचरित मानस में इस घटना का वर्णन नहीं है लेकिन तुलसीदास जी ने इसका वर्णन अपनी अन्य कृति 'तुलसी दोहा शतक' में किया है जो कि श्री रामचरित मानस से कम प्रचलित है।

अतः यह कहना गलत है कि तुलसी दास जो कि बाबर के समकालीन भी थे,ने राम मंदिर तोड़े जाने की घटना का वर्णन नहीं किया है और जहाँ तक राम चरित मानस कि बात है उसमे तो कहीं भी मुग़लों की भी चर्चा नहीं है इसका मतलब ये निकाला जाना गलत होगा कि तुलसीदास के समय में मुगल नहीं रहे।

गोस्वामी जी ने 'तुलसी दोहा शतक' में इस बात का साफ उल्लेख किया है कि किस तरह से राम मंदिर को तोड़ा गया


(1) राम जनम महि मंदरहिं, तोरि मसीत बनाय ।
जवहिं बहुत हिन्दू हते, तुलसी किन्ही हाय ॥

जन्मभूमि का मन्दिर नष्ट करके, उन्होंने एक मस्जिद बनाई । साथ ही तेज गति उन्होंने बहुत से हिंदुओं की हत्या की । इसे सोचकर तुलसीदास शोकाकुल हुये ।

(2) दल्यो मीरबाकी अवध मन्दिर रामसमाज ।
तुलसी रोवत ह्रदय हति हति त्राहि त्राहि रघुराज ॥

मीरबकी ने मन्दिर तथा रामसमाज (राम दरबार की मूर्तियों) को नष्ट किया । राम से रक्षा की याचना करते हुए विदिर्ण ह्रदय तुलसी रोये ।

(3) राम जनम मन्दिर जहाँ तसत अवध के बीच ।
तुलसी रची मसीत तहँ मीरबाकी खाल नीच ॥

तुलसीदास जी कहते हैं कि अयोध्या के मध्य जहाँ राममन्दिर था वहाँ नीच मीरबकी ने मस्जिद बनाई ।

(4) रामायन घरि घट जँह, श्रुति पुरान उपखान ।
तुलसी जवन अजान तँह, कइयों कुरान अज़ान ॥

श्री तुलसीदास जी कहते है कि जहाँ रामायण, श्रुति, वेद, पुराण से सम्बंधित प्रवचन होते थे, घण्टे, घड़ियाल बजते थे, वहाँ अज्ञानी यवनों की कुरआन और अज़ान होने लगे।

(5) मन्त्र उपनिषद ब्राह्मनहुँ बहु पुरान इतिहास ।
जवन जराये रोष भरि करि तुलसी परिहास ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि क्रोध से ओतप्रोत यवनों ने बहुत सारे मन्त्र (संहिता), उपनिषद, ब्राह्मणग्रन्थों (जो वेद के अंग होते हैं) तथा पुराण और इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का उपहास करते हुये उन्हें जला दिया ।

(6) सिखा सूत्र से हीन करि बल ते हिन्दू लोग ।
भमरि भगाये देश ते तुलसी कठिन कुजोग ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि ताकत से हिंदुओं की शिखा (चोटी) और यग्योपवित से रहित करके उनको गृहविहीन कर अपने पैतृक देश से भगा दिया ।

(7) बाबर बर्बर आइके कर लीन्हे करवाल ।
हने पचारि पचारि जन जन तुलसी काल कराल ॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि हाँथ में तलवार लिये हुये बर्बर बाबर आया और लोगों को ललकार ललकार कर हत्या की । यह समय अत्यन्त भीषण था ।

(8) सम्बत सर वसु बान नभ ग्रीष्म ऋतु अनुमानि ।
तुलसी अवधहिं जड़ जवन अनरथ किये अनखानि ॥

(इस दोहा में ज्योतिषीय काल गणना में अंक दायें से बाईं ओर लिखे जाते थे, सर (शर) = 5, वसु = 8, बान (बाण) = 5, नभ = 1 अर्थात विक्रम सम्वत 1585 और विक्रम सम्वत में से 57 वर्ष घटा देने से ईस्वी सन 1528 आता है ।)

श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि सम्वत् 1585 विक्रमी (सन 1528 ई) अनुमानतः ग्रीष्मकाल में जड़ यवनों अवध में वर्णनातीत अनर्थ किये । (वर्णन न करने योग्य) ।

अब यह स्पष्ट हो गया कि गोस्वामी तुलसीदास जी की इस रचना में जन्मभूमि विध्वंस का विस्तृत रूप से वर्णन किया किया है।

इतने स्पष्ट प्रमाण होने  के बाद भी राममंदिर का निर्माण न होने का केवल और केवल एक ही कारण है। यह है हिन्दू समाज में एकता की कमी। हिन्दू समाज जिस दिन जातिवाद छोड़कर संगठित हो जायेगा। उस दिन राममंदिर के निर्माण से दुनिया की कोई ताकत हमें नहीं रोक सकती। 

जनेऊ धर्म का या राजनीति का?

कुछ समय पहले तक धर्म को ध्यान, साधना, मोक्ष, उपासना का विषय समझा जाता था लेकिन जिस तरह राजनेता धर्म को माध्यम बनाकर आये दिन वोट की राजनीति कर रहें तो उसे देखकर लगता है आने वाली नस्ले शायद यही समझें कि धर्म सिर्फ राजनीति का विषय है, आमजन का इससे कोई सरोकार नहीं है। गुजरात चुनाव बड़ी तेजी से चल रहा है वहां विकास से जुड़े मुद्दे एक तरह से खामोश हैं। पद्मावती, जनेऊ और मंदिर दर्ष्शन ने बाकी के सब मुद्दों को पीछे छोड़ रखा है। गुजरात विधानसभा चुनावों के बीच सोमनाथ मंदिर में दर्शन के दौरान प्रवेश रजिस्टर में राहुल गांधी का नाम गैर-हिन्दू के रूप में दर्ज होने पर सियासी घमासान मचा है। तब से अब तक बहस इस बात पर ज्यादा छिड़ी है कि राहुल का धर्म क्या है? हालाँकि कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कई सबूतों के साथ सफाई दी। सुरजेवाला ने कांग्रेस उपाध्यक्ष की पुरानी तस्वीरें भी जारी कीं और इस दौरान कहा, मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि राहुल गांधी न केवल हिन्दू हैं, बल्कि जनेऊधारी हैं और पी एल पुनिया यहां तक बोल गये कि राहुल ब्राह्मण हैं। मतलब एक नेता ने उनके धर्म का बखान किया तो दूसरे ने आगे बढ़कर जाति भी बता डाली। 

धर्म और संस्कार के आधार पर देखें तो जिस प्रकार भारतीय शासन के तिरंगे झंडे का विधान है उसमें तीन रंग और विशिष्ट विज्ञान है इसी प्रकार जनेऊ का भी रहस्य है इसमें तीन दंड, नौ तंतु और पांच गांठे होती हैं, तीन धागे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और धु-लोक सत्व, रज और तम तीन गुण का अर्थ छिपा होता है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ तीन आश्रम सन्यास में इसे उतार दिया जाता है, तीन दण्ड मन, वचन और कर्म की एकता सिखाते हैं। तीन आचरण, आदर, सत्कार और अहिंसा सिखाते है, तीन तार आत्मा, परमात्मा और प्रकृति का ज्ञान देते हैं साथ ही ज्ञान कर्म और उपासना इन तीन रहस्य को समझाया जाता है। लेकिन राजनीति का जनेऊ धर्म से अलग होता है और उसके रहस्य को हर कोई समझता भी है।

पिछले कुछ वर्षों में नरेंद्र मोदी की आंधी ने बड़े बड़े परिवर्तन कर दिए। धर्मनिरपेक्षता की टोपी उतार कर राहुल ब्राह्मण बन गए, राम कभी थे ही नहीं कहने वाले राम के चरणों में पहुंच गए। शायद इसी काल को ध्यान में रखकर योगिराज श्रीकृष्ण ने कहा होगा कि परिवर्तन संसार का नियम है। लगता है राहुल गाँधी को भी एहसास हो गया है कि देश पर राज करने के सपने देखने हैं तो उनके लिए इफ्तार की दावत में मुसलमानों की जालीदार टोपी पहनकर सामने आने की बजाए खुद को जनेऊधारी हिन्दू दिखाना होगा। शायद कांग्रेस के इस खुले ऐलान से संघ के अधिकारियों के कानों में अमृत घुल गया होगा। उनका नारा भी है जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा।

भले ही नेहरू ने धर्म और राजनीति को भरसक अलग रखा लेकिन उनकी बेटी इंदिरा गांधी कभी जनसंघ के दबाव में और कभी जनभावनाओं का दोहन करने के लिए, बाबाओं के चरण छूतीं या रूद्राक्ष की माला पहने काशी विश्वनाथ के ड्योढ़ी पर फोटो खिंचवाती नजर आईं। इसके बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने, कट्टरपंथी नेताओं के दबाव में विधवा मुसलमान औरतों को अदालत से मिले इंसाफ को पलटने, देश में आधी शरियत लागू करने वाले और नाव पर तिलक लगाकर गंगा मैया की जय जयकार करने वाले राजीव गांधी ही थे। शादी के बाद राजीव गांधी जब भी किसी पूजा-पाठ की जगह पर जाते थे, सोनिया उनके साथ रहती थीं।

लेकिन अब राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह भी खड़ी हो गयी है कि वो खुद को हिन्दू साबित कैसे करें? या इसका राजनितिक प्रमाणपत्र कहाँ मिलेगा? दूसरा सोलह संस्कारों में से एक जनेऊ संस्कार क्या अब राजनेताओं की बपौती या वोट मांगने का साधन बनकर रह जायेगा? ऐसा नहीं है कि राजनीति में धर्म के घालमेल का फार्मूला नरेंद्र मोदी का आविष्कार हो बल्कि यह तो सालों से चल रहा है बस फर्क इतना है कि 2014 के चुनावों से पहले अधिकांश नेतागण जालीदार टोपी पहने रोजा इफ्तियार पार्टियों में देखे जाते थे लेकिन अब हालात थोड़े से बदले कई राज्यों में बड़ी-बड़ी हार के बाद याद आया कि क्रोसिया से बनी टोपी शायद लोगों को इतना नहीं लुभा रही है जितना माथे पर सजा त्रिपुंड तिलक भा रहा है। शायद तभी राबड़ी देवी के छट पूजा के फोटो अखबारों में छप रहे हैं। अखिलेश यादव हवन की तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं और लालू यादव के बेटे राजनीतिक रैली में शंख नाद कर रहे हैं।

कहा जा रहा है कि हो सकता है कल मार्क्सवादी भी ऐलान कर दे कि वह भी निराहार सुबह उठकर मंत्रां का जाप करते हैं या फिर बंगाल में काली या दुर्गा माता के मंदिरों में माथे टेकते नजर आयें। दरअसल सभी राजनैतिक दल समझ गये है कि भारत देश धर्म की राजनीति का प्रयोगशाला बन चुका है। धर्मनिरपेक्षता का चोला पुराना पड़ चुका है तो अब धर्म से जनेऊ लेकर ही क्यों ना सत्ता का सुख भोगें? भले ही आज हम मंगल और चंद्रमा पर जाने की बात करते हैं लेकिन चुनाव में असली राजनीतिक भूमिका तो जातियां और धर्म ही निभाते हैं।
विनय आर्य चित्र साभार गूगल 


सैक्युलरवादी और आर्य संवाद

आर्य :- अरे भाई सुनो !! कल शाम को मेन बाजार से काँवड़ यात्रा निकालते हुए शिवभक्तों पर पथराव हुआ !
सैक्युलर :- अरे !! ये तो बेचारे मुस्लिम भाईयों को जानबूझकर फंसाया जा रहा है
आर्य :- महाश्य ! मैने कब ये बोला कि मुस्लिमों ने ये पथराव किया है ? मैने तो किसी का नाम नहीं लिया । केवल यही बोला कि पथराव हुआ है
सैक्युलर :- कुछ भी हो जानबूझकर मुस्लिम भाईयों को फँसाया जाता है
आर्य :- लेकिन भाईसाहब ! हमने कब बोला कि मुस्लिमों ने पथराव किया है ? आप बार बार ! मुस्लिमों का नाम क्यों ले रहे हैं ? यानी कि आप भी दिल से मानते हैं कि ये पथराव मुस्लिम समुदाय के लोग ही करते हैं ?”

सैक्युलर :- नहीं मेरा मतलब है ! कोई भी छोटी मोटी झड़प हो तो उसमें मुस्लिमों को ही दोष दिया जाता है
आर्य :-लेकिन ये दोश तो आप स्वयं ही दे रहे हो हमने तो केवल इतना ही बोला कि पथराव हुआ । और आप कूद पड़े मुस्लिम समुदाय की वकालत करने । केवल इतना बता दो कि शिव भक्तों पर जिन्होंने पत्थर मारे उनपर कारवाई होनी चाहिए कि नहीं ?”
सैक्युलर :- हाँ हाँ ! बिलकुल होनी चाहिए । लेकिन किसी को किसी मज़हब के आधार पर ऐसे ही सज़ा नहीं होनी चाहिए ।
आर्य :- तो भाई इसमें मज़हब को क्यों बीच में ला रहे हो ? मैने तो यही बोला कि शिव भक्तों की काँवड़ यात्रा पर कुछ लोगों ने पत्थर मारे और उनपर कारवाई होनी चाहिए । इसमें क्या गलत है ?”
सैक्युलर :- पता है ! तुम जैसे लोग ही देश में दंगे करवाते हो और नफरत फैलाते हो !
आर्य :- अजीब व्यक्ति हो आप भी !! अरे मैं तो केवल ये बोल रहा हूँ कि शिव भक्तों पर जो पत्थराव हुआ उन दोषीयों पर कारवाई होनी चाहिए । बस इतनी सी बात है । इसमें नफरत फैलाने और दंगा करवाने वाली बात कहाँ से और कैसे आ गई ?”
सैक्युलर :- तुम लोग ऐसे ही करते हो बेचारे अल्पसंख्यको को झूठे मामलों में फँसाकर उनके खिलाफ नफरत उगलते हो ।
आर्य :- अरे हद है यार !! बात को कहाँ से कहाँ पहुँचा रहे हो ? हम इतना कह रहे हैं जिसने जो अपराध किया है उसे उसकी सज़ा मिले । अब यदि पत्थराव करने वाले मुस्लिम समुदाय से हैं तो क्या हम उनके द्वारा किए अपराध को छुपा दें या खारिज कर दें ? और किसी को अपराध की सज़ा देना कहाँ से नफरत फैलाना हो गया ?”
सैक्युलर :- देखो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता ।
आर्य :- बिल्कुल सही कहा जी आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता लेकिन, मज़हब होता है । एक शांतीप्रिय मज़हब !
सैक्युलर :- क्या मतलब है आपका ?”
आर्य :-आतंकवाद केवल हाथ में बंदूक उठाकर लोगों को मारने का नाम ही नहीं है बल्कि अपने मज़हब से अलग सोच रखने वाले लोगों को हर तरह से प्रताड़ित करने का प्रयास करना, उनके धार्मिक कार्यक्रमों में उपद्रव करना, पत्थर मारना, उनकी लड़कियों से छेड़छाड़ करना, अपने जैसे लोगों की भीड़ के द्वारा दंगे करके उनके घरों को आग लगाना, उनकी जमीनों पर अवैध कब्जा करना, बेवजह उनसे नफरत करना, उनके पूजा करने वाले स्थानों पर हमले करना, उनकी औरतों पर नज़र रखना आदि ये सब आतंकवाद ही है और इन अमानवीय कृत्यों में जो लिप्त है वो आतंकवादी ही है ।
सैक्युलर :- कोई भी धर्म हमें आपस में लड़ना नहीं सिखाता
आर्य :-मज़हब ही है सिखाता आपस में बैर रखना । परन्तु धर्म नहीं सिखाता । क्योंकि धर्म तो सत्यभाषण, परोपकार, सेवा, दान, तप, विद्या आदि को बोला जाता है । तो धर्म कैसे फूट डाल सकता है ? मज़हब ही कहता है कि मेरे पीर पैगंबर को न मानने वालों को जीने का अधिकार नही है ।
To be continued……..!


बहकावे में न आये। अपना दिमाग लगाये।

एक पुरानी कहानी आज स्मरण हो आई। एक पंडित को एक गौ दान में मिली। वह गौ लेकर अपने घर को चल दिया। रास्ते में चार चोरों ने उस पंडित से वह गौ छीनने की योजना बनाई। चारों अलग अलग कुछ दूरी पर छिप गए। पहला चोर ग्रामीण का वेश बनाकर पंडित जी से नमस्ते करते हुए बोला पंडित जी यह बकरी किधर लेकर जा रहे हो। पंडित जी ने मन में सोचा। कैसा मुर्ख व्यक्ति है। एक गौ और बकरी में अंतर करना भी नहीं जानता। पंडित जी नमस्ते का उत्तर देकर बिना कुछ प्रतिक्रिया दिए आगे चल दिए। आगे दूसरा चोर उन्हें मिला और वह भी पहले के समान पंडित जी से बोला यह बकरी किधर लेकर जा रहे हो। पंडित जी ने मन में सोचा। पहले वाला भी गौ को बकरी कह रहा था। यह भी गौ को बकरी कह रहा है। दोनों मिलकर मुझे मुर्ख बनाने का प्रयास कर रहे है। मैं इनके बहकावे में नहीं आने वाला। आगे अगला तीसरा चोर उन्हें मिला और वह भी पहले के समान पंडित जी से बोला यह बकरी किधर लेकर जा रहे हो। पंडित जी ने मन में सोचा। अब तो मुझे भी यह लगने लगा है कि यह गौ नहीं बकरी है। मगर मैं अभी इसकी बात पर विश्वास नहीं करूँगा। अगर आगे कोई इस पशु को बकरी कहेगा तो मैं मान लूंगा। आगे अंतिम चोर उन्हें मिला और वह भी पहले के समान पंडित जी से बोलायह बकरी किधर लेकर जा रहे हो। पंडित जी से रहा न गया। उन्होंने उदास मन से यह निर्णय लिया की आज उन्हें ठगा गया है। गौ कहकर बकरी दान दे दी गई है। पंडित जी ने भ्रम के चलते उस गौ को बकरी समझकर वही त्याग दिया और खाली हाथ आगे चल दिए। अंतिम चोर गौ को लेकर अपने मित्रों से जा मिला और खूब जोर से सब पंडित की मूर्खता पर खूब हँसे।

मित्रों यह खेल हिन्दू समाज के साथ 1947 के बाद से आज भी निरंतर खेला जा रहा है। 1200 वर्ष के इस्लामिक अत्याचारों, मुग़लों और अंग्रेजों के अत्याचारी राज के पश्चात देश के दो टुकड़े कर हमें आज़ादी मिली। उसके बार भी हिन्दुओं को अपना शासन नहीं मिला। सेकुलरता के नाम पर अल्पसंख्यक मुसलमानों को प्रोत्साहन दिया गया। हिन्दुओं को हिन्दू कोड बिल में बांध दिया गया और मुसलमानों को दर्जन बच्चे करने की खुली छूट दी गई। 100 करोड़ हिन्दुओं के लिए सरकार द्वारा राम-मंदिर बनाना सुलभ नहीं है मगर हज हाउस बनाना सुलभ किया गया। लव जिहाद को सेकुलरता का प्रतीक बताया गया। संविधान ऐसा बनाया गया कि हर गैर हिन्दू अपने मत का प्रचार करे तो किसी को कोई दिक्कत नहीं मगर हिन्दू समाज रक्षात्मक रूप से अपनी मान्यता का प्रचार करे तो उसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दमन बताया गया। गौरक्षा करना गुण्डई और गाय की कुर्बानी मज़हबी आस्था बताया गया। हमारे धर्मग्रन्थ वेद और धर्मशास्त्र पिछड़े बताये गए जबकि सेमेटिक मतों के ग्रंथों को वैज्ञानिक और आधुनिक बताया गया। रामायण और महाभारत को मिथक और विदेशियों के ग्रंथों को सत्य बताया गया। हमारे पूर्वजों के महान और प्रेरणादायक इतिहास को भुला दिया गया और अकबर महान, गौरी महान और ग़जनी महान बताया गया। विदेशी सभ्यता, विदेशी पहनावा,विदेशी सोच, विदेशी खान-पान, विदेशी आचार-विचार को सभ्य और स्वदेशी चिंतन, स्वदेशी खान-पान, स्वदेशी पहनावा आदि को असभ्य दिखाया गया।  चोटी-जनेऊ और तिलक को पिछड़ा हुआ जबकि टोपी और क्रॉस पहनने को सभ्य दिखाया गया। संस्कृत भाषा को मृत और हिंदी को गवारों की भाषा बताया गया जबकि अंग्रेजी को सभ्य समाज की भाषा बताया गया। हवन-यज्ञ से लेकर मृतक के दाह संस्कार को प्रदुषण और जमीन में गाड़ने को वैज्ञानिक बताया गया। आयुर्वेद को जादू-टोना बताया गया जबकि ईसाईयों की प्रार्थना से चंगाई और मुस्लिम पीरों की कब्र पूजने को चमत्कार बताया गया।
झूठ पर झूठ, झूठ पर झूठ इतने बोले गए कि हिन्दू समाज की पिछले 70 सालों में पैदा हुई पीढ़ियां इन्हीं असत्य कथनों को सत्य मानने लग गई। अपने आपको हिन्दू/आर्य कहने से हिचकने लगी जबकि नास्तिक/सेक्युलर या साम्यवादी कहने में गौरव महसूस करने लगी।  किसी ने सत्य कहा है कि झूठ को अगर हज़ार बार चिल्लाये तो वह सत्य लगने लगता हैं।
जैसे उस अपरिपक्व पंडित को चोरों ने बहका दिया था। ठीक वैसे ही हम भी बहक गए है। आज आप निश्चय कीजिये कि क्या आप आज भी बहके रहना चाहते है अथवा सत्य को स्वीकार करना चाहते हैं। निर्णय आपका है।
(राष्ट्रहित में जारी)
डॉ विवेक आर्य