Saturday, 19 May 2018

सड़क पर नमाज तो मस्जिदों में क्या?


प्रश्न यह है कि नमाज चलती सड़क या पार्क में हो जाती है तो पिछले काफी समय से अयोध्या में मस्जिद बनाने की जिद्द क्यों? हाल ही में साइबर सिटी गुरुगांव में जगह को लेकर नमाज विवाद ने काफी रफ्तार पकड़ी थी जिसके बाद शुक्रवार की नमाज को लेकर जिला प्रशासन ने 23 सरकारी स्थान खुले में नमाज के लिए तय किए हैं। जबकि पहले सिर्फ नौ स्थान दिए जा रहे थे। इसी बीच मुस्लिमों की तरफ से पार्कों में योग, सड़क पर कांवड़ और रात्रि जागरण पर भी सवाल उठाये गये। यह सवाल इसी तरह थे जैसे पिछले वर्ष कई थानों में मनाई गयी जन्माष्टमी के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने कहा था कि यदि वे ईद के दौरान सड़कों पर अदा की जाने वाली नमाज को नहीं रोक सकते हैं तो उन्हें थानों में मनाये जाने वाली जन्माष्टमी को भी रोकने का अधिकार नहीं है।
प्रतीकात्मक फोटो 

पर क्या इससे सवाल और तर्क खत्म हो गये शायद नहीं बल्कि इस घटना ने एक साथ कई सवालों को जन्म दे दिया है। पिछले साल मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देर रात नमाज अदा करने को लेकर तब विवाद  हो गया था जब कुछ मुस्लिम यात्री एयरपोर्ट पर गैंगवे में - बीच रास्ते पर ही नमाज पढ़ने बैठ गए। इससे बाधा उत्पन्न होने के चलते कुछ यात्रियों ने विरोध किया जबकि एयरपोर्ट पर नमाज के लिए विशेष रूम की व्यवस्था भी है। इसके बाद विनीत गोयनका नाम के यात्री ने इस पर आपत्ति उठाई थी कि जब नमाज अदा करने के लिए अलग से रूम की व्यवस्था है तो किसी को बीच रास्ते में नमाज अदा करने क्यों दे रहे हो? अगर इन्हें अनुमति दे रहे हो तो मुझे भी पूजा की अनुमति दो?  

इसके बाद सोशल मीडिया पर तीन तस्वीरें वायरल हुई थी जिनके जरिए दावा किया गया था कि नमाज पढ़ने के लिए दिल्ली के एक रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ही कब्जा कर लिया गया है। रस्सी से उस जगह को घेरने के बाद मोटे-मोटे अक्षरों में लिख दिया गया था कि प्लेटफार्म के इस हिस्से में यात्रियों की नो एंट्री है।यहां के कुली और यात्रियों को मिलाकर लगभग 10-12 लोग यहां नमाज पढ़ने आते थे।
 
फ्रांस चित्र साभार गूगल 
दरअसल ये दिक्कत सिर्फ भारत में नहीं है भारत से लेकर यूरोप और अमेरिका तक आये दिन लोगों को सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर इबादत के तरीके पर शिकायत खड़ी होती रहती है। हाल के वर्षों में, पश्चिमी यूरोप में सार्वजनिक स्थानों पर इस्लाम की बढ़ती परछाई पर कई सामाजिक बहस शुरू हुई हैं। कुछ समय पहले फ्रांस की सरकार ने पेरिस उपनगर में सार्वजिनक स्थानों पर प्रार्थना करने से उस समय मुसलमानों को रोक दिया था जब शुक्रवार की प्रार्थनाओं में सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करने वाले मुस्लिमों के विरोध में लगभग 100 फ्रांसीसी राजनेता पेरिस उपनगर में एक सड़क पर उतर आये थे। 

एक तरफ आज इस्लाम को मानने वाले अपने लिए समान अवसर मांगते है दूसरी तरफ पहनने के लिए अपना धार्मिक परिधान, कार्यालयों पर अलग से प्रार्थना आवास मांगते हैं, दैनिक प्रार्थना के लिए अपने समय या स्थान को अलग करते हैं, दूसरों से अपनी पहचान और व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता चाहते हैं लेकिन अपनी मजहबी पहचान को दर्शाना शान समझते हैं। इस मामलें में भी नमाज से योग और कांवड की बार-बार तुलना करना यही साबित कर रहे थे कि हम सही हैं। हालाँकि कांवड वर्ष में एक बार लायी जाती है जिसके लिए सरकार आम लोगों को परेशानी न हो ध्यान रखती है। कांवड दिन में पांच बार नहीं लायी जाती न हर सप्ताह  और योग को धर्म से जोड़कर देखा जाना ही गलत है जो लोग योग को बहुसंख्यक लोगों से जोड़कर देख रहे हैं यह उनकी बौद्धिक  क्षमता पर सवाल खड़े करता है।


इस्लाम में आम हालात में लोगों का सड़कों पर बैठना पसंद नहीं फरमाया और लोगों को तिजारत वगैरह की जायज जरूरतों की वजह से वहां बैठने की इजाजत दी भी तो कुछ शर्तों के साथ कि वे रास्ते पर चलने वालों का हक न मारें, उनके लिए परेशानी खड़ी न करें अब जहाँ सवाल यह होना था कि क्या सरकारी सड़क पर कब्जा करना एक गैर-इस्लामी और हराम काम नहीं है? क्या नाजायज कब्जे वाली जमीन पर नमाज पढ़ना भी नाजायज नहीं है? इसके जवाब के उलट दूसरों की धार्मिक उत्सवों पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं। मैं यह नहीं कहता सड़क पर जागरण या बारात लेकर नाचना कूदना सही है वह भी गलत है क्योंकि अपने मनोरंजन सुख और आनंद के लिए किसी दूसरे को परेशानी हो, गलत है।

मेरा हमेशा से विश्वास है कि हमें एक-दूसरे की मान्यताओं और भावनाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए न कि तुलनात्मक रमजान के महीने में विभिन्न दीनी संस्थाएं लोगों को रोजे के कायदे-कानून समझाने और उनसे चन्दे की अपील करने के लिए कैलेंडर आदि छापते-बांटते हैं। इन संस्थाओं को रमजान के महीने में सड़क पर नमाज की अदायगीजैसे सामाजिक मुद्दों पर भी दीनी हुक्म प्रकाशित और प्रचारित करना चाहिये। मस्जिदों के इमामों को भी लोगों को सही जानकारी देनी चाहिये। इबादत शांति चाहती न कि दिखावा! इबादत भीड़ में नहीं बल्कि अकेले में हो और भी अच्छा होगा. शायद इसी वजह से अब लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब नमाज रेलवे स्टेशनों, एयरपोर्ट, पार्कों, सार्वजनिक स्थानों, कार्य स्थलों और स्कूलों में अदा कर ली जाती है तो मस्जिदों में क्या होता है?..राजीव चौधरी 


Friday, 18 May 2018

बंगाल हिंसा : न पहली बार न आखिरी


लगता है बंगाल के भाग्य में अब आगे सिसकना ही लिखा है। एक समय गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे अनेकों विद्वान और देशभक्त देने वाली धरा अब बस राजनितिक और मजहबी गुंडों की भूमि बनकर रह गयी। पिछले दिनों रामनवमी पर धार्मिक हिंसा की शिकार पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रहने वाली सोनी देवी किस तरह रोते हुए अपना जला हुआ घर दिखाते हुए कह रही थी कि मेरा घर बर्बाद हो गया, एक बना-बनाया संसार बर्बाद हो गया। बच्चा लोग को लेकर अब हम कहां जाएंगे? उसका सवाल अभी तक मेरे जेहन में गूंज ही रहा था कि अचानक से बहुत सारे सवाल चीत्कार कर उठें। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव में नामांकन के दिन से जो हिंसा शुरू हुई थी, वह पोलिंग के दिन बड़ा रूप धारण करती नजर आई। वोटिंग शुरू होने के बाद से ही कई इलाकों से बम धमाके, मारपीट, मतदान पेटी जलाने, बैलेट पेपर फेंकने और फायरिंग जैसी हिंसक घटनाओं की खबरें गूंजती रहीं। करीब 12 लोगों की मौत और घायल हुए लोगों की संख्या देखकर आसानी से पता लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था किस हाल में है। हिंसा किस दर्जे की थी इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि दक्षिणी 24 परगना में एक राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ता को जिंदा तक जला दिया गया।

चित्र साभार बीबीसी 
आखिर चुनाव में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किये जाने और पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों से 60 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किये जाने के बावजूद इतनी हिंसक झड़प कैसे हुई? जिम्मेदार राज्य सरकार है या ये नाकामी बोझ एक बार राजनितिक भाड़े के हत्यारे के सर पर रख दिया जायेगा? हालाँकि एक बार फिर दिखावे के लिए कुछ धरपकड़ तो होगी ताकि आम लोगों के अन्दर कानून का डर बना रहे लेकिन सजा के नाम पर अंत वही ढाक के तीन-पात वाली कहावत होगी। क्योंकि बंगाल में जब पहले वामपंथी सरकार थी तब विपक्ष में खड़े होना चुनाव लड़ना यानि मौत को दावत देना था आज वही कार्यकर्ता ममता बनर्जी के खेमे में आ गये तो आज अन्य दलों के लिए वही स्थिति बनी हुई है।

राजनितिक और धार्मिक हिंसा के इस रक्तरंजित इतिहास को लेकर यदि थोड़ा पीछे जाये तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से झड़प की 91 घटनाएं हुईं और 205 लोग हिंसा के शिकार हुए। इससे पहले यानी वर्ष 2015 में राजनीतिक झड़प की कुल 131 घटनाएं दर्ज की गई थी और 184 लोग इसके शिकार हुए थे। वर्ष 2013 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 26 लोगों की हत्या हुई थी, जो किसी भी राज्य से अधिक थी। 1997 में वामदल की सरकार में गृहमंत्री रहे बुद्धदेव भट्टाचार्य ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि वर्ष 1977 से 1996 तक पश्चिम बंगाल में 28,000 लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गये थे। ये आंकड़े राजनीतिक हिंसा की भयावह तस्वीर पेश करते हैं। 

 राजनितिक मामलों के विश्लेषक डॉ. विश्वनाथ चक्रवर्ती इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं, ‘बंगाल में कम उद्योग-धंधे हैं, जिससे रोजगार के अवसर नहीं बन रहे हैं जबकि जनसंख्या बढ़ रही है। खेती से बहुत फायदा नहीं हो रहा है। ऐसे में बेरोजगार युवक कमाई के लिए राजनीतिक पार्टी से जुड़ रहे हैं ताकि पंचायत व नगरपालिका स्तर पर मिलने वाले छोटे-मोटे ठेके और स्थानीय स्तर पर होने वाली वसूली भी उनके लिए कमाई का जरिया है। वे चाहते हैं कि उनके करीबी उम्मीदवार किसी भी कीमत पर जीत जाएं। इसके लिए अगर हिंसक रास्ता अपनाना पड़े, तो अपनाते हैं। असल में यह उनके लिए आर्थिक लड़ाई है।चक्रवर्ती आगे बताते हैं, ‘विधि-शासन में सत्ताधारी पार्टी का हस्तक्षेप भी राजनीतिक हिंसा में बढ़ा है इसके लिए अगर हिंसक रास्ता अपनाना पड़े तो अपनाते हैं। पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि कानून व्यवस्था को सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने अपनी मुट्ठी में कर लिया है और कानूनी व पुलिसिया मामलों में भी राजनीतिक हस्तक्षेप हो रहा है। यही वजह है कि पुलिस अफसर निष्पक्ष होकर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं।

सत्ताधारी पार्टी जो कर रही है, उससे साफ है कि वह विपक्षी पार्टियों से खौफ खा रही है। लेकिन, राजनीतिक लड़ाइयां लोकतांत्रिक तरीके से लड़ी जानी चाहिए। राज्य में राजनीतिक हिंसा भले ही नई बात न हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस विरोधी पार्टियों पर जिस तरह हमले कर रही है, वह बंगाल के लिए एकदम नया है। पहले यह सब छिप-छिपाकर होता था, लेकिन अब खुलेआम हो रहा है। ममता बनर्जी तानाशाह बनकर एक तरफ विपक्षी पार्टियों पर हमले करवा रही है और दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोकतांत्रिक फ्रंट भी तैयार करना चाहती है। ऐसे में उन पर यह सवाल उठेगा कि लोकतांत्रिक फ्रंट बनाने वाली ममता बनर्जी खुद कितनी लोकतांत्रिक हैं। हालाँकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है। किन्तु यह हिंसक घटना पश्चिम बंगाल में न तो पहली बार है और न आखिरी। कभी मजहबी उबाल तो कभी राजनितिक उफान चलता रहेगा।...राजीव चौधरी 



Wednesday, 16 May 2018

क्या धर्म विरोधी बन चुका है फलित ज्योतिष शास्त्र?


कहते है प्रकृति हर पल सुंदर रचनाएं नव श्रृंगार करती रहती है और मनुष्य भी अपनी सुविधा के लिए नित नए आविष्कार करता चला जा रहा है। लेकिन इन दोनों के बीच एक झूठ भी पलता रहता है जिसे किस्से कहानियां बनाकर वेद आदि धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर, लोगों की समस्याओं को दूर करने तथा मनोकामनाओं को पूरा करने के नाम पर हर रोज उनके सामने परोसा जा रहा है। विडम्बना देखिये लोग इसे स्वाद अनुसार चख भी रहे हैं।

आप सुबह उठिए, बगल में थोड़ी सी आस्था और विश्वास दबाकर टी. वी. खोलिए या अखबार के पन्ने पलटिये आपका भाग्य आपका सामने होगा। मसलन खबर यही होगी कि क्या कहते हैं आपके सितारेत्रिपुंड लगाये एक पंडित बैठा होगा जो आपका भाग्य आपको बता रहा होगा यानि आज आप अमुक दिशा से जायें, इस रंग के कपड़ें पहने, किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं, जीवन आपका है पर सुबह उठते ही इसका निर्धारण कोई दूसरा कर रहा होता है।

बात यहीं तक ही सीमित नहीं रहती अभी कई दिन पहले एक न्यूज़ पोर्टल पर देखा तो एक कथित ज्योतिषी महिलाओं के नाम के आधार पर उनके अन्दर हीनभावना, भय और अन्धविश्वास तक परोसकर एक किस्म से मानसिक उत्पीड़न रहा था। पहले उसका शीर्षक समझिये ऐसी लड़कियों के साथ बिल्कुल ना करें शादी वरना सालभर में तलाक पक्का साथ में घर भी होगा बर्बाद।बता रहा था कि मिथुन राशि की लड़कियों के अन्दर सेंस ऑफ ह्यूमर की कमी होती है तो मिथुन राशि के लोग इन्हें पत्नी कभी न बनाएं. तुला राशि के लोगों को कन्या राशि की पार्टनर बिल्कुल नहीं चुनना चाहिए क्योंकि ये झगड़ालू होती हैं। वृश्चिक राशि के लोगों को मेष राशि का जीवनसाथी नहीं चुनना चाहिए क्योंकि वे स्वतंत्र किस्म की होती हैं, तथा इस राशि की लड़की खुली किताब की तरह है तो  इन्हें वे आकर्षित नहीं करती हैं और मेष राशि के लोग कभी भी शर्मीली और झिझकने वाली महिलाओं को पसंद नहीं करते हैं। कुछ-कुछ इन्ही तरीकों से यह महानुभाव समाज में मानसिक बीमारियाँ बेच रहे हैं। कोई और देश होता तो इन्हें कब का पागलखाने भेज चुका होता लेकिन यहाँ तो ऐसे लोग ऐसी स्वरचित कहानियाँ बेचकर सम्मान और दौलत कमा रहे हैं। 

एक दूसरा ज्योतिष बता रहा था कि कुछ लोग शादी का निर्णय जल्दबाजी में कर लेते हैं, इस कारण परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है। अगर आप अपनी ही राशि का जीवनसाथी चुनते हैं तो आपको जिंदगी भर कष्ट झेलने पड़ेंगे क्योंकि जब आपकी राशि संकट में होगी तो आपका पार्टनर भी संकट में रहेगा। जबकि अन्य राशि में शादी करने से ऐसा नहीं होगा। क्या कमाल का तर्क है मुझे नहीं पता इससे बड़ी मूर्खता क्या होती होगी कि जीवन में संकट नाम के आधार पर आते हैं लेकिन दुःख का विषय यह है कि लोग आज के भारत में किस तरह इन लोगों की आजीविका का साधन बने हुए हैं। मशहूर लेखक शेक्सपीयर ने भले ही कहा हो कि नाम में क्या रखा है गुलाब को यदि गुलाब न कह कोई दूसरा नाम देंगे तो क्या उस की खुशबू गुलाब जैसी नहीं रहेगी? लेकिन उन्हें क्या पता था कि आगे चलकर नाम से ही लाखों करोड़ों का व्यापार खड़ा हो जायेगा।

जबकि एक रिश्ते को संवारने में दोनों तरफ से कई सारी कोशिशों की जरूरत होती है और कई सारी चीजों को ध्यान में रखने की। ऐसे में किसकी राशि क्या है, उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता है। लड़का हो या लड़की नाम तो कुछ ना कुछ होगा ही क्योंकि हम नाम भविष्य के निर्माण या वैवाहिक संबंधों के लिए नहीं रखते। नाम किसी भी इन्सान को पुकारने के लिए, संबोधन के लिए होता है। यदि हम आचार-विचार, व्यवहार सोच और शिक्षा आदि गुण छोड़कर नाम और राशि के हिसाब से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने लगें तो मुझे नहीं लगता हम विश्व को कोई अच्छा समाज दे पाएंगे.

सम्पूर्ण विश्व में जहाँ लोगों की सुबह प्रार्थना उपासना और ईश्वर भक्ति के साथ शुरू होती है वहां भारत में आजकल लोगों की सुबह इनकी ठगविद्या की गिरफ्त में जकड़ी जा रही है। भले ही आज हम मंगल पर यान भेज रहे हैं, लेकिन मांगलिक दोष से हमारा पीछा नहीं छूट रहा है। हम मंगल पर जा सकते हैं ये विज्ञान और टैक्नोलॉजी का विषय है लेकिन मंगल हम पर या हमारे जीवन पर कोई असर करता है इस अंधविश्वास से कमाई का विषय जरूर है।

अभी तक लोगों ने सिर्फ मांगलिक दोष के बारे में जाना होगा इसके अलावा भी इनकी जेब में कुंडली मिलान से सम्बन्धित अनेक योग हैं जिनको दोष का नाम देकर ज्योतिषियों ने समाज मे बिना बात का भय व्याप्त कर रखा है। ऐसा ही एक योग है विषकन्या योग जिसे विषकन्या दोष भी कहा जाता है। इस योग पर भी मांगलिक दोष की तरह ही विवाह से पूर्व विचार किया जाता है लेकिन इस दोष को केवल स्त्री की कुंडली में ही देखा जाता है। यानि सिर्फ विषकन्या ही पैदा होती है विष पुरुष नहीं। इन्होंने इसके लिए एक मन्त्र भी घड़ रखा है विषयोगे समुत्पन्ना मृतवत्सा च दुर्भगा। वस्त्राभरणहीना च शोकसंतप्तमानसा! अर्थात् विषकन्या योग में जन्म लेने वाली स्त्री के प्रजनन अंगो में विकृति होती है और वह मृत सन्तान को जन्म देती है तथा वस्त्रों आभूषणों से महरूम होकर मन से दुखी होती है। 

अब सवाल यही है कि ये ठग जिस किसी बहन बेटी को विष कन्या घोशित करते होंगे उसके मन पर क्या बीतती होगी? कुछ लोग सोच रहे होंगे ये सारी कमियां धर्म में हैं तो मैं बता दूँ ये विकृतियाँ धर्म में नहीं हैं बल्कि आपके भय में है। क्योंकि ईश्वर सबके साथ है और इन्सान अनंत चैतन्य ईश्वर का ही अंश है। समस्त सृष्टि का जन्मदाता ईश्वर है ये हमारी आस्था है यही हमारा मूल धर्म है। किन्तु ईश्वर है और वह मेरी सभी भौतिक सामाजिक मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवस्थानों या मूर्तियों, पोथी पत्रों इत्यादि में वास करता है ये अंधविश्वास है। आज सांसारिक लोगों की सामान्य लालसाओं और अपेक्षाओं को जानते हुए कई लोगों ने अंधविश्वास की बड़ी-बड़ी दुकानों को रच दिया। हालत तो ये हो गई कि ईश्वर उपासना के महत्त्व से ही हम बहुत दूर निकल आए। इस कारण इन दुकानदारों के हम सिर्फ ग्राहक बनकर रह गये। भजन हवन ईश्वर के गुणगान करने के तरीके हैं और उस परमशक्ति का जितना गुणगान किया जाए उतना कम है, लेकिन अगर इस सबके द्वारा में घर, गाड़ी, पदोन्नति आदि की चाह है तो ये न पूजा है न ही भजन यह भी हमें स्वीकार करना चाहिए कि जिन बातों का कोई तुक नहीं दिखाई देता उनका पल्ला पकड़ के रखना घोर अंधविश्वास है शायद इसी कारण टी.वी. और सड़क पर बैठा एक ज्योतिषी आपके भाग्य का विधाता बन बैठा है। क्या यह धर्म विरोधी नहीं है!...विनय आर्य महामंत्री आर्य समाज 


भारत-पाकिस्तान आखिर दोस्ती क्यों नहीं होती?


दक्षिण कोरिया को लेकर कुछ महीने पहले तक उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों, मिसाइलों की धमकी की जिस जुबान में बात कर रहा था अचानक उसमें बदलाव आया है। पिछले महीने की 27 तारीख को उत्तरी कोरिया ने वो काम कर दिखाया जो अब तक असंभव समझा जा रहा था। उसके नेता किम जोंग-उन ने दक्षिण कोरिया के साथ 1953 से चली आ रही युद्ध की स्थिति खत्म करने की घोषणा कर दी। कोरियाई प्रायद्वीप की इस बड़ी घटना के बाद सोशल नेटवर्क की वेबसाइटों पर ये बहस शुरू हो गई कि यदि उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया दोनों ऐसा कर सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं?
 


हालाँकि इसके बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा अचानक भारत से दोस्ती के इच्छुक दिखाई दिए और कूटनीतिक सूत्रों की माने तो पूर्व विदेश सचिव विवेक काटजू एवं अन्य विशेषज्ञों की एक टीम पाकिस्तानी के पूर्व मंत्री जावेद जब्बार एवं अन्य समेत दोनों पक्षों के बीच इस्लामाबाद में 28 से 30 अप्रैल के बीच संवाद हुआ। साथ ही कुछ ही दिन पहले ही पाकिस्तान की ओर से सद्भावना के तौर पर में एक बीमार भारतीय कैदी को रिहा किया गया था।


इस क्षेत्र की राजनीति पर विश्लेषकों का मानना है कि कम से कम पाकिस्तान ने ऐसे संकेत दिए हैं कि वो भारत के साथ शांति चाहता है। लेकिन मेरा सवाल अलग है कि शांति चाहता कौन है, पाक सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा या पाकिस्तानी सियासत या फिर पाकिस्तानी आवाम? क्योंकि इतिहास से यदि पिछले उदाहरण उठाकर देखें तो पाकिस्तान के किसी भी प्रधानमंत्री या सैनिक तानशाह के लिए भारत से दोस्ती के कोई शुभ संकेत नहीं मिलते। 1947 में बंटवारे के बाद वर्ष 1958 तक भारत को जहाँ एक प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु संभाल रहे थे तो वहां पड़ोसी पाकिस्तान में सात प्रधानमंत्री बदल चुके थे। फिर अचानक लोकतंत्र भंग करके जनरल अय्यूब खां कुर्सी पर बैठ जाते हैं। अमेरिका से दोस्ती और समझौते के बल पर 1965 में भारत पर जंग थोप दी जाती है। भारत के हाथों जंग में  बुरी तरह हारे अयूब खां को पता चल गया कि अमेरिका डबल गेम खेल रहा है और भारत से दुश्मनी रखकर पाकिस्तान को आगे नहीं ले जाया जा सकता इस कारण उधर 1966 में ताशकंद में समझौता होता है और इधर आवाम में उनके खिलाफ मुहीम चला दी जाती है। नतीजा उनकी पहले वर्दी उतरी और फिर उन्हें पद से भी हटा दिया गया। 


पद पर आसीन होने वाले अगले सैनिक तानाशाह आये जनरल याहिया खां जो बखूबी समझ चुके थे कि आवामी मुल्लों के बगैर शासन करना मुश्किल है। इस कारण यहियाँ खां शुरू में तो भारत के कड़े विरोध में रहा लेकिन 71 की जंग की हार और शिमला समझौते से यहियां खां का भी वही अंजाम हुआ जो पूर्व में अय्यूब खां का हो चुका था। खैर एक दशक से ज्यादा समय तानाशाही में गुजार चुके पाकिस्तान के लोकतंत्र को घुटन से आजादी मिली और 1973 में जुल्फिक्कार अली भुट्टों 13 दिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहने वाले नुरुल अमीन के बाद पाकिस्तान के 9 वें प्रधानमंत्री बनते है। भारत से संबंधों की बात ठीक होने लगती है। शान्ति के दरवाजे खुले। दोस्ती की पींगे आगे बढ़ ही रही थी कि जियाहुल हक ने आकर सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। भुट्टों को भी भारत से दोस्ती का ख्वाब महंगा पड़ा। पाकिस्तान की जम्हूरियत फिर तानाशाही के अँधेरे में चली गयी और भुट्टो को फांसी दे दी गयी।

जियाहुल हक ने भी आने के साथ भारत से जम कर दुश्मनी निभाई। उसी दौरान भारत और पाकिस्तान की सेना एक दूसरे के सामने खड़ी थी जंग का माहौल था, भारतीय सेना सियाचिन पहुँच चुकी थी कि अचानक पाकिस्तान के अन्दर  अप्रैल, 1988 को गोला बारूद के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाले शिविर में विस्फोट हो चले जिसमें 93 से अधिक मारे गए और 1,100 के करीब लोग घायल हो गए। ऐसे में जियाहुल हक को लगा की भारत से दुश्मनी में कोई फायदा नहीं है। स्व. प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से दोस्ती का हाथ ही नहीं बढाया बल्कि जियाहुल क्रिकेट का मैच देखने भी भारत आए। लेकिन नतीजा फिर वही दोहराया गया और इसके बाद जियाहुल हक की  हत्या कर दी जाती है। मसलन जो भी सिविल सरकार या तानाशाह भारत आया उसे उड़ा दिया गया या हटा दिया गया।


हक की मौत के बाद एक बार फिर पाकिस्तान में लोकतंत्र बहाल होता है और बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनती है। उस दौर में भारत पाकिस्तान के रिश्तों में एक बार फिर गर्मजोशी देखने को मिलती है कहा जाता है उस दौरान बेनजीर सरकार ने खालिस्तानी आतंकियों की एक सूची भारत को सौंप देती थी और राजीव गाँधी भी इस दोस्ती को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पाकिस्तान की यात्रा करते हैं। पर एक बार फिर वही हुआ कि 1988 में प्रधानमंत्री बनी भुट्टों को 90 में ही पद से हटा दिया जाता है। इसके बाद नवाज शरीफ को पाकिस्तान की सत्ता की चाबी मिलती है लेकिन वो भी जब-जब भारत की तरफ दौड़ा पद से हटा दिया गया। फिर बेनजीर आई फिर भारत से दोस्ती की बात होती है और उसे फिर हटा दिया जाता है। 

फरवरी 1997 में एक बार फिर नवाज सत्ता सम्हाकर आगे बढ़ते हैं और उनके इस कार्यकाल में तो भारत से दोस्ती को हिमालय से ऊँचा ले जाने की बात होती है। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेई जी की लाहौर बस यात्रा होती है लेकिन इस बार कारगिल वार हो जाता है और नवाज को सत्ता से बेदखल कर पाकिस्तान सैनिक तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ के अधीन चला जाता है। भारत से दुश्मनी का दौर फिर शुरू होता है। इधर भारत में संसद हमले के बाद भारत की फौज का सीमा पर जमावड़ा होता देख अटल जी को सेल्यूट करने तक से मना तक कर देने वाला मुशर्रफ भारत में हुए सार्क सम्मलेन में शामिल ही नहीं होता बल्कि सीज फायर जैसे समझौते की गारंटी भी देता है। रिश्तों में गर्माहट बढती है और नतीजा मुशर्रफ से पहले वर्दी और फिर सत्ता और इसके बाद पाकिस्तान से भागना पड़ता है।


एक बार फिर पाकिस्तान में जम्हूरियत चैन की साँस लेती है और आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान की कमान सम्हालते हैं, कहा जाता है इस दौर में दोनों सरकारें कश्मीर समस्या पर आगे बढ़ ही रही होती हैं कि पूरे विश्व को हिला देने वाली 26/11 की दर्दनाक घटना घट जाती है। रिश्तों में पिंघलती बर्फ फिर दुश्मनी में जम जाती है। धीरे-धीरे कलेंडर में वर्ष और पाकिस्तान में सत्ता बदलती रहती है एक बार फिर नवाज को सत्ता नसीब होती है और इधर अपने प्रचंड बहुमत से मोदी सत्ता में आते हैं. मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नवाज को बुलावा भेजा जाता है। जिसके बाद आम और साड़ी आदि उपहारों का दौर भी चलता है। कभी रूस के उफा में दोनों मिलते है तो कभी अफगानिस्तान से लौटते हुए मोदी पाकिस्तान नवाज़ के घर पहुँच जाते हैं। नतीजा पठानकोट एयरबेस पर हमले के साथ पाकिस्तान में मजहबी मुल्लाओं के द्वारा नारे लगने शुरू होते हैं कि ‘‘जो मोदी का यार है गद्दार गद्दार है।’’ और फिर नवाज शरीफ को पद से हटा दिया जाता है। शाहीद अब्बास खक्कानी नये प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं और ऐसे में वहां के आर्मी चीफ का दोस्ती का बयान आना बस यही सवाल उठाता है कि क्या ये दोस्ती मुमकिन है यदि है तो इस बार दोस्ती की कीमत कौन चुकाएगा? बाजवा या खक्कानी!..लेख राजीव चौधरी 


Saturday, 12 May 2018

आर्य समाज एक राष्ट्रीय आन्दोलन –


स्वामी दयानन्द जी ने अपनी शिक्षा पूरी कर गुरु दक्षिणा के रूप में गुरु विरजानन्द दण्डी स्वामी जी को जब कुछ लौंग प्रस्तुत की तो गुरु का हृदय विचलित हो गया क्योंकि शिष्य दयानन्द की प्रतिभा, तक शक्ति शारीरिक बल और योग निष्ठा को परख कर अपन सम्पूर्ण विद्या ज्ञान शिष्य दयानन्द को दान कर दिया था। गुरु जी को आशा और विश्वास था कि भारत माता की दुर्दशा को सम्हालने की याग्यता और क्षमता दयानन्द में हैं अतः गुरु ने लौंग के साथ ही दयानन्द शिष्य को सशरीर मांग लिया था और आदेश दिया था कि जाओ ओर सम्पूर्ण भारत वर्ष में घूम-घूम कर भारत माता को दासता की बेड़ियों से आजाद कराओ और अज्ञान के अन्धकार में साई हुई जनता को सच्चा वेद मार्ग बता कर राष्ट्रोत्थान में अपना जीवन लगा दो।

शिष्य दयानन्द ने गुरु आज्ञा को स्वीकार कर अपना सिर गुरु चरणों में रख दिया आर गुरु का आशीर्वाद प्राप्त कर निर्दिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु चल पड़े। इस घटना से स्पष्ट होता है कि भारत माता के उत्थान की अग्नि गुरु विरजानन्द जी के हृदय में सुलग रही थी और शिष्य दयानन्द के मिल जाने पर वह अग्नि तीव्र होती गयी जिसे शिष्य दयानन्द के हृदय में वेद ज्ञान द्वरा स्थापित कर दिया।
महर्षि दयानन्द जी के गुरु आदेश को एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में अपने हृदय में स्थापित कर लिया और इस के प्रथम चरण में विधमी्र जनता को अपने अकाट्य प्रवचनों, उपदेशों, शस्त्रार्थो के माध्यम से सत्य वैदिक धर्म से अवगत कराया। यह स्वामी जी का शीत युद्ध था। स्वामी जी ने सभी मत सम्प्रदायों का उनके गुण, अवगुण के आधार पर प्रबल खण्डन किया। स्वामी जी के मन, वचन व आचरण में समानता थी। उनमें देश, काल परिस्थिति का सामना करने की खमता थी। उनकी प्रचार शैली अद्भुत थी और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था जिस कारण वह निर्भीक ओर निडर होकर अजेय रहे।
दूसरे चरण में भारत में फैली विभिन्न सशक्त रियासतों के राजाओं को वैदिक धर्म का पाठ पढ़ाया और उन्हें राज धर्म की शिक्षा दी थी। महर्षि ने अनुभव किया कि बिना संघर्ष अर्थात् बिना शस्त्र युद्ध के भारतमाता को आक्रान्ताओं की दासता की बेड़ियों से छुटकारा नहीं मिल सकता। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु महर्षि ने हरद्विर के चण्डी मन्दिर पर चुने हुए राजाओं से गुप्त मन्त्रणा की ओर सन् 1857 में स्वतन्त्रता युद्ध की योजना बनाकर शस्त्र युद्ध छेड़ दिया था। परन्तु कुछ लोभी स्वार्थी गद्दारों ने अंग्रेज शासकों को योजना से अवगत करा दिया। परिणामतः योजना असफल हो गई। परन्तु महर्षि जी ने शीतयु( निरन्तर जारी रखा जिसके परिणाम स्वरूप अनेक देश भक्त उत्पन्न हुए और उन्होंने ऋषि के धार्मिक, राजनीतिक  शीत युद्ध को शक्ति प्रदान की। परिणाम स्वरूप 1941 से 1946 तक के स्वतंत्रता आन्दोलन में आर्य समाज के 85 प्रतिशत काय्रकर्त्ताओं ने भग लिया और अनेकों अनुयायियों ने अपनी प्राण आहुतियां भी दी थीं।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आय्र समाज में कर्मठ, निष्ठावान, वेद अनुयायी कार्यकर्त्ताओं का अभाव हो गया। आर्य समाज यमें स्वार्थी, लोभी, पौराणिक रूढ़ी वादी और निष्क्रीय व्यक्ति प्रवेश कर गये जिनकी धारणा है कि संसार के सभी धर्म अथवा मठ सम्प्रदाय अच्छे हैं इसलिए सभी धर्मो का समान रूप से आदर व सम्मान करना चाहिए, ऐसे लोगों के रहते कोई जाति, संस्था व संगठन अपने उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्त मतो गोल पेदी के लोटे होते हैं। न जाने कब कहां लुढ़क जाए। हां प्रजातान्त्रिक आधार पर प्रत्येक मत सम्प्रदाय का धर्म को अपने प्रचार की पूर्ण स्वतन्त्रता तथा अधिकार होना चाहिए। परन्तु वैचारिक दृष्टि से सबको समाजन समझना भारी भूल है। उनके गुण अवगुण के आधार से ही दृष्टिकोण निर्धारित करना उचित है।
संसार की प्रत्येक वस्तु एक निश्चित सत्य पर आधारित होती है। यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक सिद्धान्त है। इसी प्रकार संसार के समस्त मानवों का एक ही सत्य सनातन वैदिक धर्म है जिसे मानव धर्म की संज्ञा दी जा सकती है। इसीलिए सीी धर्मों, तक सम्प्रदयों को समान समझना अवैज्ञानिक एवं मूर्खतापूर्ण मान्यता है। यह मान्यता इसी प्रकार की है कि जैसे कोई व्यक्ति रेलवे जंक्शन पर खड़ा होकर यात्रियों को यह सम्मति दे कि सभी रेल गाड़ियां एक ही स्थान पर पहुंचेंगी।
धर्म और संस्कृति के प्रति श्रद्धा तथा आस्था भी अन्धविश्वास के आधार पर नहीं अपित इनके गुणों के आधार पर ही होनी चाहिए। 
वास्तव में सभी मत, सम्प्रदाय या धर्मों का प्रचार व प्रसार एक शीत युद्ध है। शीत युद्ध में सफलता की प्राप्ति की इच्छुक जाति व संस्था के अन्दर जब तक अपने धर्म के प्रचार व प्रसार करने की लगन व तड़प नहीं होगी तब तक उसका विजयी होना सर्वथा असम्भव है। अतः प्रत्येक जाति, संस्था तथा राष्ट्र का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी जनता, अनुयायी तथा मुख्यतः अपने धर्म प्रचारकों में धर्म के प्रचार व प्रसार की तीव्र लगन उत्पन्न करे। ऐसा न करना अपनी मौत को स्वयं निमन्त्रण देना होता है।
धर्म और राजनीति का गठजोड़ है। धर्म का झण्डा झुकतेही किसी जाति, संस्था व राष्ट्र का राजनीतिक झण्डा स्वतः झुक जाता है अर्थात् उसका राजनीतिक ढ़ांचा लड़खड़ा जाता है। अतः राजनीतिक ढ़ांचे की सुरक्षा हेतु उसे अपने धार्मिक अनुयायियों की संख्या में वृद्धि करनी ही होगी, अन्यथा चुनाव के क्षेत्र में उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी।
आर्य समाज के संसथापक महर्षि दयानन्द जी ने बुविद का समर्थन करत ेहुए इस मौलिक वि(ान्त को उपस्थित यिका था कि -
‘‘प्रत्येक को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के त्याग में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।’’ यही मान्यता बुंविद का मूल आधार है इसी को लेकर वर्तमान शीतयुग् में पूर्ण सफलता की आशा की जा सकती है अन्यथा नहीं।
संघर्ष में विजय की प्राप्ति केवल व्यक्ति, जाति, संस्था अथवा राष्ट्र की धार्मिक तथा दार्शनिक महानता पर ही निर्भर नहीं होती अपितु उनके आचरण पर निर्भर होती है। आचरण विहीन धर्म, संस्कृति तथा दर्शन किसी व्यक्ति, जाति, संस्था को बचाने में सर्वथा असमर्थ होते हैं।
वर्तमान शीत युद्ध में ईश्वर समबन्धी मान्यता का सबसे अधिक महत्त्व है। इस आधार पर वैदिक सम्बन्धी मान्यता ही सफलता का आधर बन सकती है। आशा है आर्य जाति के शुभ चिन्तकइस तथ्य को स्वीकार कर इस पर आचरण करेंगे।...स्वामी सोम्यानन्द सरस्वतीमथुरा