Monday, 31 October 2016

अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन नेपाल

         आर्यों के सहयोग से काठमांडू में होगी आर्य समाज मंदिर की स्थापना

यदि स्वामी दयानंद न होते तो देश आजाद न हुआ होता.. योगी आदित्यनाथ

आर्य समाज की ताकत का अंदाजा नेपाल सम्मलेन देखकर लगाया जा सकता है... स्वामी सुमेधानन्द

वैदिक संस्कृति को आदर्श में लाने से समाज में व्याप्त कुसंस्कार, विसंगतियां, छुआछूत जातीय भेदभाव समाप्त हो जाते है... श्रीमती विद्यादेवी भंडारी राष्ट्रपति नेपाल



20, 21, 22 अक्तूबर 2016 अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन नेपाल, अपने आप में एक सफल से भी बढ़कर सफलतम  सम्मलेन कहा जाना चाहिए. देश विदेश से आये हजारों आर्यों द्वारा एक महान वैदिक उदघोष. आर्यों की भूमि पर आर्यों द्वारा यह प्रयास नेपाल के धार्मिक सामाजिक जीवन में नया रंग भरता नजर आया. राजधानी काठमांडू के टुंडीखेल मैदान से उठा वैदिक धर्म की जय का उद्धघोष नेपाल के समाचार पत्रों की पहले पन्ने की ऐसी सुर्खियाँ बनी जो नेपाल के बुद्धिजीवी, समाज के चिंतको, लेखकों, विचारकों व सनातन वैदिक धर्म रक्षकों को टुंडीखेल मैदान में खींच लाया. महासम्मलेन के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता श्री सुरेशचंद अग्रवाल जी द्वारा व महासम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में नेपाल राष्ट्र की राष्ट्रपति श्रीमती विद्या देवी भंडारी व महाशय धर्मपाल जी रहे. यह महासम्मेलन आर्य समाज के लिए गौरव के क्षण के साथ उसके आदर्शो के ऊँचे आयाम स्थापित करता नजर आया. आनन्द कन्द आदित्य ब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द. जिन्होंने अपनी जवानी को इस देश और समाज के पुनर्जागरण के लिए खोए स्वाभिमान की पुन: प्राप्ति के लिए लुटा दिया  था. स्वामी के कर्णवन्तो विश्वार्यम के आन्दोलन को आगे बढ़ाते हुए सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने नेपाल के राजधानी काठमांडू में इस वर्ष इसका बिगुल बजाया. देश विदेश से हजारों की संख्या में आये आर्यों से नेपाल की राजधानी ओ३म ध्वज के रंग में रंगी नजर आई.
सुबह 7 बजे भव्य शोभा यात्रा का आयोजन राजधानी काठमांडू की पर लहराती वैदिक पताका ऊँचे स्वरों में लगते वैदिक उदघोष रूककर देखने को विवश कर देने वाला नजारा था शोभा यात्रा के बाद यज्ञ का कार्य शुरू किया गया आचार्य संजीवनी जी एवं पाणिनि कन्या महाविद्यालय वाराणसी की ब्रह्मचारिणी किरण, स्नेहा, मोना, धृति व वैष्णवी के मुखारविंद से वैदिक मंत्रो से गुंजायमान वातावरण धर्म, आस्था में समाहित हो गया.महाशय धर्मपाल जी के द्वारा ध्वजारोहण करने के बाद पूरा मैदान स्वामी दयानंद सरस्वती, भारत माता की जय के उदघोष और नेपाल में आर्य समाज की नीव रखने वाले शहीद शुकराज शास्त्री के अमरता के नारे भी लगाये गये. राष्ट्रपति महोदया के आने से पहले दिल्ली प्रतिनिधि सभा के महामंत्री श्री विनय आर्य जी द्वारा आई दयानंद की टोली भजन प्रस्तुत किया गया. नेपाल की राष्ट्रपति श्रीमती विद्यादेवी भंडारी ने अपने सम्बोधन में कहा कि वैदिक संस्कृति को आदर्श में लाने से समाज में व्याप्त कुसंस्कार, विसंगतियां, छुआछूत जातीय भेद समाप्त हो जाते है इन समस्याओं से निराकरण पाने के लिए वैदिक संस्कृति अति आवश्यक है. उन्होंने समाज को भौतिक व संस्कृतिक रूप में सम्रध बनाने के लिए सर्वे भवन्तु सुखिन तथा वसुधैव कुटुम्बकम को व्यावहारिक रूप लाने को अतिआवश्यक बताया. पुरे सम्मलेन में वैदिक धर्म के गंभीर मुद्दों पर वैदिक धर्म परिचय यज्ञ का वैज्ञानिक स्वरूप महिला सम्मलेन शाकाहार पर भाषण देश विदेश से पधारे बुद्दिजीवी, विद्वानों ने सरल भाषा में अपने विचार रखे. युवा वर्ग में चरित्र और सदाचार भाव की अभिवृद्धि. भौतिक. बौद्धिक और आर्थिक विकास की संभावनाओं की खोज आदि सामयिक चिंतन द्वारा संसार में नई चेतना. उत्साह और प्रेरणा का भाव प्रवाहित करने के उद्देश्य से नेपाल में होने वाले इस महासम्मेलन में विश्व के अनेक देशों के हजारों प्रतिनिधियों ने भाग लिया.
 महिला सम्मलेन
नारी शक्ति, को आगे रखते हुए अथितियों को आसन ग्रहण कराया जिसका सञ्चालन श्रीमती राधा उप्रेती जी व् श्रीमती शारदा आर्य (आर्य वीरांगना दल दिल्ली प्रदेश) ने किया. मंच पर उपस्थित डॉ अन्नपूर्णा आचार्य, आचार्य अमृता आर्य एवं अनेक माताओं, बहनों ने अपने विचार प्रस्तुत किये. जिसका नेपाली प्रिन्ट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में खूब सराहा गया. लगभग 32 देशों से पहुंचे प्रतिनिधि में सबसे बड़ा दल मारीशस से 100 से ज्यादा लोग इस आयोजन का हिस्सा बनने पहुंचे. सबसे अधिक दुरी लगभग 17 हजार किलोमीटर न्यूजीलेंड आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान श्री हरीश सचदेवा जी अपनी धर्मपत्नी उर्मिला सचदेवा के साथ पधारें. भारत का आदिवासी इलाका समझा जाने वाला राज्य (छतीसगढ़) यहाँ से आचार्य अंशुदेव के नेतृत्व में 10 बसे भरकर लोग सम्मलेन का हिस्सा बनने आये.

पश्चिम बंगाल सभा से पंडित मधुसुदन शास्त्री के साथ बहुत लोग पधारें. हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश बिहार इन राज्यों से बहुत अधिक संख्या में लोगों ने आर्य समाज के महान आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. नेपाल और भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम यहाँ देखने को मिल रहा था. हर रोज हजारों लोगों के भोजन की व्यवस्था का प्रबंध यहाँ किया गया था. आगे बढ़ने से पहले थोडा काठमांडू के बीचोबीच टुंडीखेल मैदान के बारे में बताते चले तो टुंडीखेल मैदान नेपाल सेना का अपना मैदान है जो कभी किसी को किसी आयोजन के लिए उपलब्ध नही कराते. किन्तु वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार या कहो आर्य समाज के इस महान आन्दोलन के कार्यक्रम लिए नेपाली सेना ने इसे निशुल्क समर्पित कर दिया. जिसमे विशाल पंडाल लगाये गये. यहाँ स्थान-स्थान पर पानी एवं चाय इत्यादि का प्रबंध किया गया था. हर रोज हजारों लोगों के खाने-पीने का प्रबंध किया गया था
महासम्मलेन का दूसरा दिन यज्ञ एवं यज्ञपवित संस्कार के उपरांत विनय आर्य जी द्वारा मंच पर उपस्थित सभी आर्य महानुभावो का स्वागत किया गया और मंच से नेपाली गायक किशोर कुमार सेढाई द्वारा भज ओम भज ओम सततम भजन प्रस्तुत किया गया यह भजन नेपाली रेडियो पर भी काफी प्रचलित है. इसके बाद संस्कृत सत्र सम्मलेन का आरम्भ किया गया जिसके संयोजनकर्ता श्री विनय विद्यालंकार (आर्य समाज उत्तराखंड) डॉ गौरव भट्टाराई ने किया मंच पर उपस्थित विद्वान् एवं भारी संख्या श्रोतागण बिना किसी कोलाहल के शांति पूर्ण अनुशासित व पूर्ण आस्था से अपने कानों से वैदिक ज्ञान का पान कर रहे थे. नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के उपकुलपति कुल प्रसाद कोइराला ने अपने विचार रखते हुए वेद और संस्कृत को भगवान का दीपक कहा. तो स्वामी धर्मानन्द जी महाराज ने हजारों आर्यजनों की भीड़ को संभोदित करते हुए आहवान किया कि संस्कृत की रक्षा करने वाले मंच पर पधारे  उन्होंने कहा कि संस्कृत की रक्षा यानि के संस्कृति की रक्षा, वेद की रक्षा, संसार में मानवता की रक्षा का सन्देश बिना संस्कृत के नहीं जा सकता.
इस सत्र के मुख्य अथिति पूर्व मुम्बई पुलिस आयुक्त व वर्तमान बागपत (उत्तर प्रदेश) से भाजपा सांसद सत्यपाल सिंह, पंडित चिंतामणी जी एवं गोरखपुर से पांच बार सांसद योगी आदित्यनाथ जी थे. पंडित चिंतामणि ने अपने विचार रखते हुए कहा वेदवाणी संस्कृत साहित्य की सम्पदा है इसके बिना मानवता का विकास नहीं हो सकता लेकिन दुर्भाग्य कि लोगों ने संस्कृत जानने का प्रयास शुरू नहीं किया उन्होंने संस्कृत को माँ का दर्जा देते हुए कहा कि माँ से प्यार करना पड़ेगा तभी उसकी ममता की बरसात होगी. मंच से सांसद सत्यपाल ने स्वामी दयानन्द जी महाराज के लिए भारत रत्न की मांग दोहराते हुए कहा कि वेद और संस्कृत भगवान के दिए वरदान है जब खाने में शुद्धता, पीने के पानी के लिए शुद्धता की मांग उठ सकती है तो संस्कृति की शुद्धता की बात क्यों नहीं होती आज हमें शुद्ध संस्कृति की आवश्यकता है उन्होंने आर्य समाज को संस्कृति का रक्षक बताते हुए कहा कि भारतीय संसद स्वामी जी के चित्र बिना अधुरा है.
योगी आदित्यनाथ जी ने इस महासम्मेलन में पधारकर इसकी गरिमा को बढ़ाते हुए कहा कि आर्य समाज संसार का कल्याण मार्ग है जो धर्म का सबसे बड़ा रक्षक है वही आर्य है यदि आर्य समाज और स्वामी श्रद्धानंद न होते तो शुद्धी आन्दोलन की शुरुआत ना होती यदि स्वामी दयानंद न होते तो देश आजाद न हुआ होता. सीकर राजस्थान से सांसद स्वामी सुमेधानंद जी का प्रकाश आर्य जी द्वारा ओ३म पटका पहनकर स्वागत किया गया. वैदिक विदुषी जयपुर साहित्य विभाग प्रोफ़ेसर बहन स्नेहलता शर्मा जी ने कहा कि भाषाई और सामाजिक मर्यादा लांघने वाले समाज में अशांति फैलाकर शांति का पर्दुभाव पैदा कर रहे है.
द्वितीय सत्र वेद विज्ञानं
वेद विज्ञानं सत्र मारीशस से आई टीम द्वारा मेरे मन मंदिर में भगवान तू और वेद शास्त्र का विनय प्रकाश पढो ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश भजन से आरम्भ किया गया. मारीशस यदि बात करे तो उस देश की आबादी मात्र 13 लाख के लगभग है किन्तु सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि वहां 700 आर्यसमाज मंदिर गुरुकुल है वहां आई बहन अमृता जी द्वारा एक बड़ा सुन्दर भजन प्रभुगान तुम्हारा कर पाए ऐसी कृपा करो भगवान कि मेरा मन डोले ना प्रस्तुत किया गया.
वेद विज्ञान सम्मलेन की अध्यक्षता स्वामी देवव्रत जी की अमेरिका से आये डॉ सतीश प्रकाश जी जो 7 भाषाओ के जानकर है ने आरम्भ करते हुए कहा मेकाले द्वारा भेजा गया मेक्स्मुलर जिसने वेद को असभ्य कहा लेकिन आज सभी विज्ञान से जुडी संस्थाओं ने माना कि वैदिक विज्ञान ही सर्वोपरी है. युवा आचार्य सनथ कुमार ने वेद को विज्ञान की जड़ बताते हुए कहा कि सभी समस्याओ का समाधान यदि कहीं है तो वेद में निहित है उन्होंने योग दिवस की तरह ही वेद दिवस और यज्ञ दिवस मनाने की सलाह का विचार सबके समक्ष रखा. भुवनेश्वर उड़ीसा से आये डॉ पी.वी. दास ने कहा कि वेद सबके लिए है आर्य समाज की पहचान दयानन्द और स्वामी दयानन्द की पहचान वेद है उन्होंने वेद को संसार का एकमात्र रक्षक बताया. नेपाल से डॉ जनार्दन धिमरेजी ने संस्कृत भाषा पर जोर देते हुए कहा कि यदि इसी तरह अंग्रेजी का चलन चलता रहा तो एक दिन नेपाल चला जायेगा. यदि आने वाली पीढ़ी वेद नहीं पढेगी विज्ञान कहाँ से सीखेगी? क्योकि आग बिना कोई उर्जा उत्पन्न नहीं होती और वेद ज्ञान में आग की तरह है. उन्होंने भारत और नेपाल में वेद प्रयोगशाला बनाने का आहवान किया. जींद हरियाणा से श्री ओमप्रकाश जी ने वेद को माँ की लोरी बताते हुए कहा कि मुझे दुःख होता है मेक्समुलर की सोच पर जिसने जब धन और पद के लिए अपनी वाणी और कलम को बेच दिया.
विनय विद्यालंकार जी ने अपने ओजस्वी भाषण से सबको आनंदित कर दिया हजारों तालियों की गडगडाहट और वैदिक धर्म जय के नाद से टुंडीखेल मैदान गूंज उठा. मंच से सांसद स्वामी सुमेधानंद जी ने ज्यादा से ज्यादा गुरुकुल की स्थापना करने का संकल्प लेने को कहा. उन्होंने कहा ऋषि दयानन्द की ध्वजा लेकर चलने वाला सिर्फ आर्य है. आज आर्य समाज सामाजिक उद्धार से साथ राजधर्म का निर्वहन कर रहा है. हम भारतीय संस्कृति के उद्धार के लिए सरकारी स्तर पर भी प्रयासरत इसके लिए आने वाले शीतकालीन सत्र में प्रधानमंत्री जी के सामने अपना पक्ष रखेंगे क्योकि आज के समय में बिना दयानन्द की विचारधारा के कुछ नही है जिसके लिए ज्यादा से ज्यादा गुरुकुल की स्थापना की जानी चाहिए. मंच से स्वामी सम्पूर्णानन्द जी ने वेद को विज्ञानं का मूल बताते हुए कहा कि चारों वेदों में सारा ब्रह्माण्ड है. वेद केवल कोई ग्रन्थ नहीं अपितु जीवन की वो बहती धारा है जिसके शब्द-शब्द में वेद है अर्थ-अर्थ में वेद निहित है. आचार्य देववृत जी ने सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा कि शब्द विज्ञान से वेद विज्ञान समझे जा सकते है. मनु महाराज कहते है जो वेद नहीं पढता वो अपने परिवार के साथ शुद्र बन जाते है. आज इलेक्ट्रोनिक मीडिया से हमारे युवाओं का पतन हो रहा है वो वेद से दूर हो रहा है जबकि सभी धर्मो का मूल वेद है और जब तक आर्य समाज है वेद सुरक्षित है.
चतुर्थ सम्मलेन शिक्षा सम्मलेन
शिक्षा सम्मलेन का सञ्चालन भारत से अशोक आर्य जी एवं नेपाल से महेश पोडल जी द्वारा किया गया जिसमें मुख्य अतिथि डॉ स्वागत श्रेष्ठ, डॉ विद्यानाथ जी कोइराला, श्री एल.पी भानु जी, आचार्य ज्ञानेश्वर जी, श्री सुभाष नोपानी, विचार टीवी से श्री धर्मेश जी आदि स्वागत योग्य अतिथि उपस्थित थे. अशोक आर्य जी ने मंच का सञ्चालन करते हुए कहा कि संसार की समस्त बुराई अशिक्षा है आज आधुनिक शिक्षा का मूल खो गया वह केवल जीविकापार्जन का साधन बनकर रह गयी. जिस असली ज्ञान की शिक्षा वैदिक शिक्षा कराह रही है. महेश पोडल जी ने नेपाली भाषा को संस्कृत की भगिनी भाषा बताते हुए कहा नेपाल की राष्ट्रीय भाषा में केवल संस्कृत की छाप दिखाई देगी. श्री सुभाष नोपानी जी ने मंच से हजारों लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जिस भूमि में वेद गीता की रचना हुई हमारे पूर्वज सामाजिक, धार्मिक  और आर्थिक रूप संपन्न थे पर आज हम दण्डित क्यों? क्योंकि हमने वेद भुला दिए और आडम्बर उठा लिए उन्होंने शिक्षा में वेदों को अनिवार्य करने की बात कही ताकि आधुनिक शिक्षा से विसंगतियां दूर की जा सके. उन्होंने नेपाल के हिन्दू राष्ट्र होने की गरिमा का छिनना भी बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण करार देते कहा कि इसमें विदेशी मिशनरीज की साजिश रही नोपानी जी आर्य समाज सार्वदेशिक सभा का नेपाल की भूमि में आयोजन का आभार व्यक्त किया. 
एल.पी भानू जी ने शिक्षा की प्रक्रिया में आने वाली बाधा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेदों से दूर होकर आज शिक्षा आनंद का विषय न होकर एक बोझ बन गयी. उन्होंने वैदिक विजन को शिक्षा का दर्पण बताते हुए कहा कि विद्या धनम सर्व धनम प्रधानम सभी समाज इसी शिक्षा से महान बने है. आचार्य ज्ञानेश्वर जी आधुनिक शिक्षा पर दुःख जताते हुए सलाह दी कि आज कच्चे बच्चे बिगड़ रहे है यदि माता पिता अपने बच्चों को गुरुकुल नहीं भेज सकते तो घर को गुरुकुल बनाये. उन्होंने कहा आज आधुनिक शिक्षा प्रणाली अपने उद्देश्य से विमुख हो गयी शिक्षा का अपने मूल उद्देश्य हट जाना किसी भी समाज के पतन का पहला कारण बनता है. आज हमें वैदिक शिक्षा की जरूरत है ताकि आने वाली नस्लें राष्ट्रभक्त, सेवाभक्त समाजभक्त, और ईश्वर भक्त बने. नेपाल से श्री लक्ष्य बहादुर केसी जी अपने विचार रखते हुए गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पर जोर दिया उन्होंने कहा कि संस्कृत के अलावा अन्य भाषाओँ में नम्बर ज्यादा आने पर ख़ुशी मनाई जाती है संस्कृत को लोग एक शिक्षा के विषय के तौर पर भुला बैठे है. जब तक आंतरिक ज्ञान नहीं होगा तब तक अन्य शिक्षा का कोई ओचित्य नहीं है.
समुदघाटन समरोह
अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मलेन तीसरा दिन समुदघाटन समरोह आर्यों द्वारा नेपाल में आर्य समाज मंदिर की घोषणा करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में श्री सुरेशचंद्र अग्रवाल प्रधान सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, स्वामी सुमेधानन्द जी सांसद सीकर राजस्थान, स्वामी सम्पूर्णानन्द जी व माधव प्रसाद जी नेपाल आर्य समाज समेत आदि आर्यजन उपस्थित थे. आरम्भ में ओ३म कहने से तर जायेगा और महापुरुष जन्म लेंगे सूना ना जहाँ होगा भजन का आयोजन हुआ. विनय आर्य जी ने मंच से संबोधित करते हुए कहा कि वेद का प्रचार जितनी जितनी ज्यादा भाषाओँ में होगा आर्य समाज और वैदिक संस्कृति का उतना ही ज्यादा प्रचार-प्रसार होगा. उन्होंने हर्ष जताते हुए कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई जब यज्ञ प्रार्थना यज्ञ रूप प्रभु हमारे भाव उज्जवल कीजिये और वेद के मंत्रो का अर्थ नेपाली भाषा में देखा. इसके बाद प्रकाश आर्य जी प्रधान (मंत्री सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा) द्वारा अपनी सुन्दर आवाज़ में एक भजन, आनंद श्रोत बह रहा है अचरज है कि जल में रहकर मछली को प्यास है. प्रस्तुत किया.
इसके बाद नेपाल की राजधानी काठमांडू में आर्य समाज मंदिर की स्थापना के लिए मारीशस आर्य समाज से श्री हरिदेव रामधनी जी ने सहर्ष आभार व्यक्त करते कहा कि हम सब स्वामी दयानन्द के उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रहे है. मारीशस एक बहुत छोटा सा देश है लेकिन इसके बावजूद हमने प्रत्येक गाँव ने आर्य समाज हिंदी पाठशाला और एक महिला समाज का निर्माण किया. उन्होंने नेपाल में आर्य समाज के इस महान आन्दोलन के केंद्र का स्वागत करते हुए कहा इससे पहले बीज अंकुरित होकर मुरझाये आर्यों यथाशक्ति आगे बढ़ो आपके दिए  दान से नेपाल में वैदिक धर्म का विशाल वृक्ष बन जायेगा. उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान श्री देवेन्द्र पाल वर्मा जी ने अपने उदबोधन में कहा कि इस कार्यक्रम में हजारों लोग उत्तर प्रदेश से पहुंचे है. यदि इस तरह के कार्यक्रम देश विदेश की धरती पर नहीं होंगे तो आर्य समाज स्मृति शेष बन जायेगा. आर्य समाज के सहयोग से नेपाल में पशुबलि के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया जायेगा. नेपाल और भारत इन दोनों देशो में हिन्दू है बुराई भी सामान है तो अब समय की मांग है कि मिलकर काम करना पड़ेगा.
छतीसगढ़ से कई सौ लोगों के साथ पहुंचे छतीसगढ़ आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान आचार्य अंशुदेव जी हर्ष जताते हुए कहा कि आर्यों जाग जाओ अब तो हमारे आदिवासी भाई बहने भी ऋषि दयानंद के सिद्धांत को मान रहे यह बहुत बड़ा शुभ संकेत है स्र्स्थी की रचना में नेपाल मुख्य हिस्सा रहा आज आर्यों का आगमन नेपाल में हुआ और अब यहाँ आर्य समाज की स्थापना होगी इससे बड़ी ख़ुशी की बात क्या होगी. उन्होंने मंच से घोषणा की जल्दी ही छतीसगढ़ में 40 हजार दलितों की शुद्दी कर उनकी घर वापिसी की जाएगी. स्वामी सुमेधानन्द जी ने मंच से विशाल पंडाल और हजारों लोगों को सबोधित करते हुए कहा कि हमें मारीशस के कार्यों से प्रेरणा मिलती है वहां की समाज एक मंत्रालय की भांति कार्य करती है. आर्य समाज का अतीत गौरवमय रहा है आगे भविष्य भी गौरवान्वित होगा. आर्य समाज का अर्थ गतिशील होना है जो प्रकाशमान है वो ही आर्य है, आर्य समाज पत्थरों का नाम नहीं आर्य संस्कारित व्यक्तियों का नाम है आर्य समाज की ताकत का अंदाजा नेपाल सम्मलेन देखकर लगाया जा सकता है.
बर्मा (म्यंमार) आर्य समाज से पंडित चिंतामणि जी ने सभी नेपाल की भूमि और ऋषिभक्तो को प्रणाम करते हुए कहा कि वैदिक साहित्य सभी प्रचार-प्रसार सभी भाषाओं में होना चाहिए. श्री विनय विद्यालंकार जी ने कहा हम आर्य समाज को वैदिक संस्कृति का रक्षक बनायेंगे उन्होंने कुछेक आर्य समाजों को कहा कि अब आर्य समाज सप्ताह में नहीं हर रोज खुलने चाहिए. हालेंड में आर्य समाज का कार्य कर रही पंडिता इंद्रा जी किन्नों ने कार्यकर्म की प्रसंशा करते हुए कहा आप लोगों को जो प्यार और सम्मान मिला वो अतुलनीय है पंडिता इंद्रा जी ने हालेंड में नये आर्य समाज बनाने की जानकारी भी यहाँ सबको दी. श्री सुभाष गोयल जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि माता-पिता की सेवा करों वही मंदिर है श्री धर्मपाल जी प्रधान (दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा) ने इस कार्य के लिए सभी के सहयोग की प्रसंशा करते हुए कहा कि महासम्मेलन में आये सभी लोगों के द्वारा जो संगठन का परिचय दिया गया वो स्तुति के लायक है. नेपाल आर्य समाज और माधव जी की शक्ति से काफी प्रेरणा मिली और एक छोटी सी कथा सुनाकर यह बताया कि बिना शक्ति के दवा बेकार है.
न्यूजीलेंड से इस महासम्मेलन में पधारे श्री हरीश सचदेवा जी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा अब समय की मांग है नये खून को आगे लाया जाये बड़ों के सुपर विजन और युवाओं के सहयोग से ही आर्य समाज उन्नति करेगा.हरीश जी ने बताया की कभी उन्होंने न्यूजीलेंड में एक छोटी सी समाज से काम शुरू किया था पर अब 30 से ज्यादा समाज हो गयी. युवा आर्य समाजी श्री सुधीर मालिक जी ने अपने विचार से सुझाव रखते कहा कि अब हर एक दिन एक को आर्य समाज से जोड़ें. दिल्ली से श्रीमती शारदा आर्य जी (आर्य वीरांगना दल दिल्ली) ने सभी को ह्रदय से धन्यवाद देते हुए कहा नेपाल के अन्दर आर्य वीर दल और आर्य वीरांगना दल की स्थापना करें. नेपाल से श्री विष्णुकोटि जी ने सभी का आभार प्रकट करते हुए कहा कि आर्य समाज के इस महासम्मेलन ने पुन: नेपाल का मस्तक ऊँचा कर दिया. भारत और नेपाल के बीच सिर्फ रोटी बेटी का नाता ही नहीं बल्कि संस्कृति और सभ्यता भी साझा है. श्री इंद्रप्रकाश गाँधी जी आर्य समाज के इस कार्यक्रम की प्रसंशा करते हुए कहा कि समाज लोगों को आत्मिक भोजन दे रहा है मैं अपने पुत्र और पोत्र को भी आर्य समाज को समर्पित करता हूँ. स्वामी धर्मानंद जी महाराज के एक वाक्य पर समूचा पंडाल तालियों से गूंज उठा जब उन्होंने कहा आर्य वचन, भावना, घोषणा का पक्का होता है.
सम्मलेन के अंत में श्री प्रकाश आर्य जी सभी को धन्यवाद देते हुए कहा कि आर्य वो है जो गर्दिशो को भी हैरान कर दे. काठमांडू नेपाल की ह्रदय स्थली है नेपाल में आर्य समाज की स्थापना में लोगों द्वारा दिए दान मुक्त राशि के सहयोग के लिए सभी का आभार व्यक्त किया उन्होंने आर्य समाज को सभी धर्मो का सच्चा साथी बताते हुए कहा कि आर्य समाज वो संस्था वो आन्दोलन है जिसे शुरूआती दिनों में एक पारसी ने जगह दी और एक मुसलमान अल्लारखा ने सहयोग दिया. आगे बढ़ते हुए उन्होंने बताया कि नेपाल में आर्य प्रतिनिधि सभा का गठन किया गया एवं नेपाल में गुरुकुल की स्थापना की जाएगी संगठन में शक्ति है हर एक वर्ष एक वार्षिक उत्सव होना चाहिए आर्य समाज के पास समाज के लिए शुद्ध ज्ञान है जैसे गंगोत्री में पानी साफ है किन्तु बंगाल की खाड़ी में दूषित हो जाता है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि कभी कोई आर्य समाजी धर्म परिवर्तन नहीं करता. आचार्य ओमप्रकाश शास्त्री ने तीसरे दिन तीसरे पहर सभी आर्यजनों का इस पवित्र कार्य में सहयोग के लिए धन्यवाद नमन किया. उन्होंने कहा की दानी का धन कभी घटता नहीं साथ ही एक हुंकार भी लगाई कि उठो दयानंद के सिपाहियों समय पुकार रहा है. तन वाले तन दो मन वाले मन दो धन वाले धन दो. नेपाल से सांसद श्रीमती राजेश्वरी देवी भी मंचासीन रही
 सम्मलेन का अंतिम पहर तीन दिनों के बाद भी किसी आर्य के चेहरे पर कोई चिंता थकान नजर नहीं आ रही थी. सभी उसी उमंग के साथ वक्ताओं को सुन रहे थे टुंडीखेल मैदान भगवा रंग से रंगा नजर आ रहा था मैदान में उपस्थित नेपाल सेना के जवान व महानगर प्रहरी भी पूरी तल्लीनता से वैदिक संस्कृति रचे बसे दिखाई दे रहे थे. महानगर पुलिस के डी.एस.पी श्री संतोष आचार्य व अन्य जवानों अधिकारीयों को उनके द्वारा प्रदान की गयी सेवा के लिए सम्मानित किया गया. पूरी शालीनता, सद्भाव, आनंद के साथ महासम्मेलन संपन हुआ ... Rajeev Choudhary      

Friday, 28 October 2016

इसाई मिशनरी के जाल में नेपाल

अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मलेन काठमांडू के मंच से नेपाल में बड़ी संख्या में हो रहे धर्मातरण के खिलाफ आवाज उठाई गयी. नेपाल के कई सामाजिक चिंतको ने भी इस गंभीर मामले पर अपनी चिंता व्यक्त की वाग्मती विद्यालय के संचालक रामप्रसाद विद्यालंकार ने अपनी राय रखते हुए कहा था कि नेपाल की असली पहचान उसका हिन्दू राष्ट्र होना था न कि धर्मनिरपेक्ष देश. बाहरी मुल्कों से आये धन के कारण हमारे देश के नेता तो जीत गये किन्तु नेपाल हार गया. भारत और नेपाल दो पड़ोसी देश है. दोनों की सभ्यता, संस्कृति, भाषा और धर्म एक सा होने के साथ-साथ समस्याएं भी सामान है. जहाँ 21 वीं सदी में भारत आर्थिक तरक्की के साथ धर्मांतरण से जूझ रहा है वही नेपाल भी इस बीमारी से अछूता नहीं रहा बल्कि कहा जाये तो भारत से भी बड़े पैमाने पर यहाँ धर्मांतरण का खेल जारी है. नेपाल में कुछ समय पहले जारी हुए धर्मवार आंकड़े चैकाने वाले थे. 1990 के दशक में नेपाल में इसाइयों की आबादी .02 फीसदी यानी मात्र 20 हजार बताई गई थी, वहीं अब इन वर्षो में यह आबादी बढ़ कर 7 फीसदी यानी 21 लाख से अधिक हो गई है. पिछले 20 सालों में नेपाल में इसाई मिशपरियों का जाल बहुत तेजी से फैला है यह बीमारी नेपाल के तमाम अंचलों में तेजी से फैल गई हैं. नेपाल के बुटवल में कई चर्च बन चुके हैं. इसके अलावा नारायण घाट से बीरगंज के बीच कोपवा, मोतीपुर, आदि में हजारों लोगों ने इसाई धर्म स्वीकर कर छोटे छोटे चर्च स्थापित कर लिए हैं. जो अपना धार्मिक कारोबार इतना तेजी से विकसित कर रहे है कि आने वाले समय में नेपाल तो होगा किन्तु नेपाल का नेपाल में कुछ नहीं होगा.
यदि इस बीमारी का कारण जाने तो हमें कुछ समय पहले के अतीत में झांक कर देखना होगा जून 2001 में नेपाल के राजमहल में हुए सामूहिक हत्या कांड में राजा, रानी, राजकुमार और राजकुमारियाँ मारे गए थे. उसके बाद राजगद्दी संभाली राजा के भाई ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह ने. फरवरी 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने माओवादियों के हिंसक आंदोलन का दमन करने के लिए सत्ता अपने हाथों में ले ली और सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. नेपाल में एक बार फिर जन आंदोलन शुरू हुआ और अंततः राजा को सत्ता जनता के हाथों में सौंपनी पड़ी और संसद को बहाल करना पड़ा संसद ने एक विधेयक पारित करके नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया.2007 में सांवैधानिक संशोधन करके राजतंत्र समाप्त कर दिया गया और नेपाल को संघीय गणतंत्र बना दिया. नेपाल की एकमात्र हिंदू राष्ट्र की चमक जून 2001 के नारायणहिती नरसंहार के बाद खोने लगी थी. अप्रैल 2006 में लोगों की इच्छा के अनुसार राजा की शक्तियों को सीमित कर दिया. साल 2007 में लागू अंतरिम संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को मूलभूत सिद्धांत के रूप में स्थापित किया. हिंदू राज्य के रूप में नेपाल के उद्भव और क्षरण को शाह राजशाही (1768-2008) के उत्थान और पतन से अलग करके नहीं देखा जा सकता.
इस एक  मात्र हिन्दू राष्ट्र के सेकुलर बनने के बाद यूरोप की ईसाइयत और अरब देशों को जैसे खुला शिकार मिल गया था. यह सब जान गये थे कि धार्मिक रूप संम्पन नेपाल आर्थिक रूप से उतना धनी नहीं है. यहाँ अभी भी बड़ी संख्या में गरीब और अशिक्षित लोग है. देवीय चमत्कार में भरोसा करना या यह कहो अंधविश्वास आदि का प्रभाव सामाजिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित करता है. नेपाल में मिशनरियों के निशाने पर वहां की गरीब और मध्यम जातियों के लोग हैं. मिशनरियां वहां के मगर, गुरुंग, लिंबू, राई, खार्की और विश्वकर्मा जातियों को अपना टार्गेट बनाती है. पहले वह उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि के लिए मदद देती है और बाद में बड़ी खामोशी से इसाई धर्म में दीक्षित कर देती हैं. नेपाल के बदले इस जनसांख्यकीय हालात से वहां के बुद्धिजीवियों में चिंता व्याप्त है। वहां के समाज विज्ञानी रमेश गुरंग की मानें तोइसाई आबादी बढ़ने का यह सिलसिला अगर बना रहा, तो आने वाले 50 सालों में वहां हिंदू और बौद्ध आबादी अल्पसंख्यक होकर रह जायेगी. ऐसे में सिर्फ एक ही सवाल पैदा होता है यदि दुबारा हिन्दुत्व यहाँ कायम हुआ तो नेपाल महात्मा गांधी के हिंदुत्व को अपनाएगा या नाथूराम गोडसे और वीर सावरकर के हिंदुत्व को स्वीकार करेगा?

नेपाल में भूकंप के बाद इन मिशनरीज को वहां सर्वाधिक लाभ मिला. सुचना और प्रशासन इस मामले में काफी सुस्त है राजनैतिक उठापटक के कारण सरकार का ध्यान इस ओर न के बजाय है जबकि वहां की मीडिया भी राजनीति और राजनेताओ को ही प्राथमिकता दे रही है पिछले वर्ष नेपाली संविधान सभा ने नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के प्रस्ताव को भारी बहुमत से ठुकरा दिया था और यह घोषित किया गया कि हिंदू बहुल यह हिमालयी देश धर्मनिरपेक्ष बना रहेगा. लेकिन ऐसे हालात में यह प्रश्न जरुर उठेगा आखिर कब तक धर्मनिरपेक्ष बना रहेगा? पूरा इस्लाम आ जाने तक या वेटिकन के अधीन आने तक? जिस नेपाल ने कभी किसी की राजनेतिक गुलामी नहीं की अब कहीं वो धार्मिक गुलामी करने की ओर तो नहीं जा रहा है?....Rajeev Choudhary https://www.facebook.com/rajeev.tomar.12

Saturday, 15 October 2016

तो क्या भारत धर्मनिरपेक्ष देश है?

सलीम चोरी करता हुआ पकड़ा गया. शरियत कानून के अनुसार उसके दोनों हाथ काटे जायेंगे. इरफान रेप केस में आरोपी है उसे सजा के रूप में तब तक पत्थर मारे जायेंगे जब तक वो मर ना जाये. और शरियत अनुसार नफीसा भी अपना वोट नहीं डाल सकती है.  क्या सच में ऐसा है?” पर भारतीय सविंधान तो इसकी इजाजत नहीं देता. भारतीय सविंधान तो अपनी पत्नी को तीन बार तलाक बोलने की और चार शादी करने की भी इजाजत नहीं देता. फिर क्यों होती है? वो तो मुस्लिमों का अपना पर्सनल ला बोर्ड है दारुल उलूम  व मौलवी जानते है कि शरियत का मतलब महिलाओ का शोषण करना, मजहब के बहाने कई शादिया कर अपनी वासनाओं की पूर्ती कर बच्चे पैदा करना है हलाला जैसी बर्बरतापूर्ण और अमानवीय प्रथा को जिन्दा रखने के लिए इस्लाम का झूठा सहारा लेते है वरना शरियत के अनुसार तो हज यात्रा पर मिलने वाली छूट भी हराम है.
उपरोक्त बातों पर यदि गौर करें तो क्या भारत धर्मनिरपेक्ष देश है? यदि है तो फिर धार्मिक कानून क्यों? यदि किसी के लिए धार्मिक कानून है तो फिर आधे अधूरे क्यों? भारत का अपना लोकतंत्र है सविंधान है तो फिर वो पूर्ण रूप से सबके लिए सामान रूप से लागू क्यों नहीं है? अगर आप भारत में मुसलमान हैं तो आपको स्वतंत्रता की आप अपने कानून की आड़ में एक महिला का खूब शोषण कर सकते है, उससे शादी करो बच्चे पैदा करो फिर घर से बाहर फेंक दो. आपका कानून है सविंधान थोड़े ही रोकेगा. ज्यादा से ज्यादा चार-पांच मुल्ला मौलवी आयेंगे 1400 साल पहले महिला के लिए बने कानून के द्वारा आप बरी हो जायेंगे. न गुजरा भत्ता देना न उसे सम्पत्ति में अधिकार. फिर अगले रोज शादी कर लो कोई रोकने वाला नहीं है. हाँ यदि रोकने की कोशिश किसी ने की तो आपके मौलाना दूसरी जंग छेड़ देने का ऐलान कर देंगे. क्योंकि इसे उनका गुजारा चल रहा है.
2001 की जनगणना के मुताबिक, देश में मुस्लिम आबादी 13.4 फीसदी थी और दिसंबर, 2011 के एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, जेल में मुसलमानों की संख्या करीब 21 फीसदी है. जिनका निपटारा भारतीय संविधान के अनुसार होना है. इनमें चोरी जैसे छोटे अपराध से लेकर बलात्कार, हत्या कुकर्म जैसे जघन्य आरोपी भी शामिल है. अब इसमें सवाल यह है शरियत का हवाला देने वाले लोग क्या इन अपराधों पर फैसला शरियत द्वारा देना चाहेंगे? यदि हाँ तो सुनिए अफगानिस्तान में बलात्कारी गुनाह करने के चार दिनों के अंदर उसे ढूंढ कर सिर में गोली मार के मौत दी जाती है. तो फिर बुलंदशहर एन.एच 91 पर माँ बेटी को बंधक बनाकर रेप करने वाले सभी मुस्लिम आरोपी अभी तक जिन्दा क्यों है? क्या मुस्लिम पर्सनल ला इसका जबाब देगा! सऊदी अरब जिसे इस्लाम का वेटिकन कहा जाता है यहां किसी महिला को बेआबरू करने पर मौत की सजा दी जाती है गुनाहार को तब तक पत्थर मारे जाते हैं, जब तक की वो मर ना जाए। और यह जुर्म की मौत आसान नहीं क्योंकि गुनाहगार पूरी पीड़ा और यातना से भी गुजरना पड़ता है. क्या मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड दिल्ली में निर्भया गेंगरेप के आरोपी मोहम्मद अफरोज को पकड़कर यह सजा दे सकता है?
कुरआन के अनुसार सच्चे मुसलमान के लिए हज यात्रा केवल अपनी कमाई से प्राप्त धन से ही हलाल मानी जाती है. किन्तु भारत सरकार हर वर्ष इसमें एक बड़ी राशि मुस्लिमों के लिए देती है. सुप्रीम कोर्ट ने हज-सब्सिडी को गैर-इस्लामिक बताते हुए समाप्त करने के निर्देश दिऐ है. जबकि पाकिस्तान को इस्लामिक देश मानने वाले लोगों को नहीं पता होगा कि पाकिस्तान ने भी हज सब्सिडी गैर इस्लामिक मानकर उसे उसे बंद कर दिया पाकिस्तान ही क्या किसी भी मुस्लिम देश में हज यात्रियों के लिए सरकारी सब्सिडी नहीं है  पर दारुल उलूम और पर्सनल ला बोर्ड ने मुफ्त की सब्सिडी पर अब तक कोई फतवा क्यों नहीं दिया  यह शरियत की हिदायतों के खिलाफ है फिर भी मजे कर रहे हो क्यों इससे इस्लाम को खतरा नहीं होता? या सिर्फ महिलाओं के बराबरी के अधिकारों की मांग पर ही खतरा होता है!


मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आने वाले तलाक-ए-बिदात (ट्रिपल तलाक के जरिए रिश्ता तोड़ना), निकाह हलाला (तलाकशुदा पति से दोबारा शादी करने पर रोक) और बहुविवाह प्रथा गैरकानूनी हैं और भारतीय संविधान के खिलाफ हैं. सब जानते है अतीत में स्त्रियों ने बहुत अपमान झेला और उनका प्रयोग केवल काम-वासना के लिए किया जाता था उनको हर ह़क और अधिकार से वंचित रखा जाता था. क्या आज भी एक पुरातन परम्परा को जो अमानवीय है उसको धर्म के नाम से जोड़कर जिन्दा रखना जरूरी है? मुस्लिम समुदाय को समझना होगा कि प्रतिबन्ध किसी निकाह पर नहीं लगाया जा रहा है रोक लगेगी बस एक पत्नी के रहते दूसरी पत्नी रखने पर. रोक तलाक पर नहीं है बस उसका तरीका मौखिक होने बजाय संवेधानिक होगा. इसमें चाहे आपकी पत्नी हो या बहन-बेटी ही क्यों न हो. जो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आज इन कुप्रथाओं पर इस्लाम के नाम पर जोर दे रहा है उसे समझना होगा कुप्रथा से कोई सम्प्रदाय मजबूत नहीं होता. यदि होता है तो फिर शरियत के नाम पर उन्हें पूर्णरूप से लागू करिये काटिए चोरो के हाथ मारिये पत्थरों से उन मुस्लिम पुरुषों को सविंधान की आड़ में रेप जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त पाए जाते है. यदि नहीं तो इन महिलाओं की जिन्दा सांसे काले कफ़न में बंद करके अब और शोषण मत कीजिये. सोचकर देखिये कुप्रथाओं के नाम पर एक महिला के साथ आज जो हो रहा है क्या वो सही हो रहा है? चित्र साभार गूगल लेख राजीव चौधरी 

Wednesday, 12 October 2016

मौत का व्रत - आखिर जिम्मेदार कौन?

हमारे देश में मीडिया और नेता हर एक मौत के जिम्मेदार को ढूंढ लेते है. लाशें सूंघकर मृतक का धर्म उसकी जाति और उसकी मौत का कारण खोज लेते है. कहीं धर्म तो कहीं व्यवस्था को दोषी ठहरा देते है. रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद मैंने मनुस्मृति को जलते देखा, अखलाक की हत्या पर अवार्ड लौटाते बुद्धिजीवी देखे. शहीद फौजी वीरसिंह को निचली जाति का होने कारण उसके अंतिम संस्कार के लिए 2 गज जमीन के लिए भटकते उसके परिजन देखे. टीपू सुल्तान और महाराणा प्रताप की जयंती के लिए झगड़ते नेता देखे पर आज एक 13 साल की जैन परिवार की एक बच्ची मौत पर या कहो धार्मिक मौत पर सबको खामोश देखा. क्यों जैन समुदाय की वोट कम है या उसकी मौत को कुप्रथा की भेंट नहीं मानते? आखिर समाज की परम्पराओं के लिए माता-पिता की इच्छाओं के लिए कब तक मासूमों को इन कुप्रथाओं के लिए अपनी जान कुर्बान करनी पड़ेगी? क्या ये सही था कि एक 13 साल कि मासूम लड़की को 68 दिनों का व्रत रखने की अनुमति दी गई? क्यों किसी ने उसको मना नहीं किया, क्यों लोग उसको सम्मान दे रहे थे? क्यों किसी ने इसका विरोध नहीं किया? क्या धार्मिक नेताओं जैन मुनियों को नहीं पता होता कि किस बात की अनुमति की जाए और किसकी नहीं. क्या कोई बता सकता है कि 13 वर्ष की इस बच्ची आराधना की मौत का जिम्मेदार कौन है?

अत्यंत कठिन तपस्या वाला व्रत रखने वाली छात्रा का नाम अराधना था. आंध्र प्रदेश में कक्षा आठ में पढ़ने वाली 13 वर्षीय छात्रा आराधना की 68 दिन का निर्जला व्रत पूरा करने के बाद मौत हो गई. आराधना जैन परिवार से थी. वह जैनियों के पवित्र समय चैमासा के दौरान व्रत शुरू किया था. व्रत पूरा होने के दो दिन बाद अराधना की तबीयत खराब हुई थी जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. घर वालों ने बताया कि हार्ट अटैक से किशोरी की मौत हो गई. बाल तपस्वनी के नाम से मशहूर हुई किशोरी की मौत के बाद उसके अंतिम संस्कार में सैकडो़ लोगों का हुजूम उमड़ा. अराधना की शव यात्रा में करीब 600 लोगों ने भाग लिया। इस यात्रा को शोभा यात्रा नाम दिया गया था. यानि के एक धार्मिक कुरूतियों की भेंट चढ़ी एक बच्ची की मौत पर जश्न मनाया जा रहा था. पुलिस के मुताबिक जैन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लक्ष्मीचंद का शहर में गहनों का व्यवसाय है. जिसमें पिछले कुछ दिनों से घाटा चल रहा है. चेन्नई के किसी संत ने इसका समाधान बताते हुए लक्ष्मीकांत को कहा की यदि उनकी बेटी 68 दिनों का चातुर्मास व्रत रखे तो बिजनेस में मुनाफे के साथ उनका भाग्योदय भी हो जाएगा.

हमारे देश में धर्म के नाम पर न जाने ऐसी कितनी कुप्रथाएं आज भी अपने पैर जामये हुए हैं, जिनके बारे में अधिकतर लोगों को कुछ पता ही नहीं होता है. जैन समुदाय की सदस्य लता जैन का कहना है कि यह एक रस्म सी हो गई है कि लोग खाना और पानी त्यागकर खुद को तकलीफ पहुंचाते हैं. ऐसा करने वालों को धार्मिक गुरु और समुदाय वाले काफी सम्मानित भी करते हैं. उन्हें तोहफे दिए जाते हैं. लेकिन इस मामले में तो लड़की नाबालिग थी. मुझे इसी पर आपत्ति है. अगर यह हत्या नहीं तो आत्महत्या तो जरूर है. कि किशोरी को स्कूल छोड़कर व्रत पर बैठने की अनुमति क्यों दी गई.? सब जानते है इस प्रक्रिया को चैमासा वर्त या संथारा के नाम से जानते है. . भगवान महावीर के उपदेशानुसार जन्म की तरह मृत्यु को भी उत्सव का रूप दिया जा सकता है. संथारा लेने वाला व्यक्ति भी खुश होकर अपनी अंतिम यात्रा को सफल कर सकेगा, यही सोचकर संथारा लिया जाता है.

संथारे को जैन धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया जाता है लेकिन आज तक ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया है जब किसी भी बड़े जैन मुनि ने अपना जीवन समाप्त करने के लिए संथारे का मार्ग अपनाया हो. यहां तक कि जैन धर्म के प्रमुख धार्मिक संत आचार्य तुलसी, जिनका 1997 में निधन हो गया था और न ही उनकी धार्मिक विरासत के वारिस आचार्य महाप्रज्ञ, जिनकी 2010 में मृत्यु हो गई थी, दोनों में से किसी ने भी स्वैच्छिक मौत यानि के संथारा का रास्ता नहीं चुना था, बल्कि दोनों धर्मगुरुओं की मृत्यु लंबी बीमारी के बाद हुई थी. कुछ समय पहले राजस्थान हाईकोर्ट ने संथारा को भारतीय दंड संहिता 306 तथा 309 के तहत दंडनीय बताया था और इस प्रथा को आत्महत्या जैसा बताकर रोक लगा दी थी जिसके बाद जैन समुदाय सड़कों पर उतर गया था. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने जैन समुदाय को संथारा नामक धार्मिक परंपरा को जारी रखने की अनुमति दी थी. हालाँकि ऐसा नहीं है कि समस्त जैन समाज इसके पक्ष में था जबकि जैन समाज का एक बड़ा हिस्सा इसके विरोध में भी था किसी ने संथारा को अमानवीय एवं किसी ने धार्मिक परंपरा के नाम पर भूखे रहने को मजबूर किया जाना बताया था.
अब सवाल यह कि त्यौहार और परम्पराओ के नाम पर देश के ज्यादातर लोग धार्मिक हो जाते हैं तथा हिंसा से हर संभव बचने का प्रयास भी करते  हैं. जैन समुदाय के लोग अहिंसावादी भी बनते दिखाई दे जाते है पर इस तरह की भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक, हिंसा में शामिल होते समय इनका विवेक कहाँ सो जाता है? क्या कुप्रथा बंद होने से धर्म को कोई हानि होती है? धर्मगुरुओं को आज सोचना होगा हर एक धर्मिक मामला चाहें वो संथारा हो या तीन तलाक, अथवा बली प्रथा हो या ज्यादा बच्चें पैदा करने को लेकर विवाद क्यों आज इन सब में न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है! जबकि समाज के अन्दर धर्म की एक सरंचनात्मक कार्य भूमिका होती है धर्म हमें समझाने के वैचारिक रूप देता है अन्य शब्दों में कहें तो धर्म हमे मानवीय अमानवीय द्रष्टिकोण पर चिंतन का ढांचा देता है जिससे समय के साथ मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन दिखाई देता है. धर्म की एक समाज के अन्दर एक बोद्धिक भूमिका होनी चाहिए न की परम्परागत तपस्या या उपवास रखने में किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. यह एक त्रासदी है और हमें इससे सबक लेना चाहिए. इस मामले की पुलिस में शिकायत दर्ज की जानी चाहिए और बाल अधिकार आयोग को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए. एक नाबालिग बच्ची से हम ऐसे किसी फैसले को लेने की उम्मीद नहीं कर सकते जो कि उसकी जिंदगी के लिए खतरा है. आखिर उसकी मौत का भी तो कोई जिम्मेदार होगा?..... विनय आर्य महामंत्री आर्य समाज 

कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा सविंधान कैसे?

2008 में पेरिस में शरीयत के कानूनों को क्रियान्वित करने के जो अलग-अलग ढ़ंग और रूप हैं, उन पर इस्लामी विद्वानों में खुलकर बहस हुई थी. इस बात पर भी चर्चा हुई कि अनेक ऐसे कानून हैं जिन्हें इस्लाम मान्यता देता है लेकिन आधुनिक दुनिया नहीं, जैसे गुलामी इस्लामी कानून में वैध है. लेकिन बाहरी दुनिया और कानून इसे अवैध मानते है. वाशिंगटन के जार्ज टाउन विश्वविद्यालय में इस्लामी इतिहास के प्राध्यापक जान वुल का मत था कि आज की मुस्लिम दुनिया में शरीयत का मतलब विभिन्न क्षेत्रों में सत्ता स्थापित करने से है, कठोर दंड दिए जाने की व्यवस्था से नहीं. यदि ऐसा होता तो पुरुषों के मामले में चोरी, बलात्कार, हत्या जैसे जघन्य अपराधो में शरियत का क्यों नहीं दिया जाता? शरीयत के कानून के अनुसार कोई मुसलमान अपना धर्म नहीं बदल सकता और कोई गैर मुसलमान मुस्लिम हो जाने के पश्चात पुनरू अपने धर्म में नहीं लौट सकता. क्या यह भी किसी के धार्मिक चिंतन और उसकी किसी आलोकिक शक्ति के प्रति लगाव या मानसिक शांति जैसी सोच पर गुलामी जैसा तो नहीं? अधिकांश मुस्लिम देशों में शरीयत निकाह, तलाक, विरासत और बच्चों की देखभाल जैसे निजी मामलों तक ही मर्यादित हो गई है। सबसे अधिक बहस महिलाओं के अधिकारों पर होती है जिन्हें शरीयत के नाम पर अत्यन्त संकीर्ण दायरे में मर्यादित कर दिया गया है। महिलाओं को यदि समान अधिकार नहीं दिया जाता है तो आधुनिक दुनिया में आधी जनसंख्या के साथ अन्याय होगा। क्या कोई आधुनिक समाज का देश यह पसंद करेगा?
जहाँ तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट, केंद्र और मुस्लिम मौलाना आमने सामने है तो वही मुस्लिम समाज में भी इस मुद्दे पर मुस्लिम मौलाना, इस्लाम का नव वैचारिक वर्ग, और तलाक से मुक्ति चाहने वाली मुस्लिम महिलाए भी मैदान में डटे खड़े है. मुस्लिम महिलाएं तो यहाँ तक मुखर है कि राष्ट्रीय महिला आयोग की एक सदस्या किसी धार्मिक नेता और मौलवी से सलाह ले रही है. हम भारतीय संविधान के युग में रह रहे हैं, न कि औरंगजेब के काल में. जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष ने इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि तीन तलाक और विवाह के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा प्रदान की गई राय अस्वीकार्य है और जमीअत उलमा हिंद इसकी न केवल सख्त निंदा करता है बल्कि इसका पुरजोर विरोध भी करेगा. जमीअत उलेमा हिंद के अध्यक्ष ने कहा कि मुसलमानों के लिए कुरान और हदीस ही सबसे बड़ा संविधान है और धार्मिक मामलों में व्यवस्था ही प्रासंगिक है जिसमें कयामत तक कोई संशोधन संभव नहीं और सामाजिक सुधारों के नाम पर व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता. उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश इस हलफनामे में कहा गया है कि  पर्सनल ला के आधार पर मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते और इस धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक के लिए कोई जगह नहीं है.
देखा जाये तो 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में कुल 3.72 लाख भिखारी हैं. जिसमें से 25 प्रतिशत भिखारी मुस्लिम हैं. जबकि 72.2 प्रतिशत भिखारी हिंदू हैं. आंकड़ो के मुताबिक देश के कुल भिखारियों में महिलाएं कम हैं जबकि मुस्लिम भिखारियों में महिलाओं की संख्या ज्यादा है. जिसका सबसे बड़ा कारण मुस्लिम समुदाय के अन्दर जारी मौखिक रूप से तीन तलाक माना गया है. लेखिका जाकिया सोमन का कहना है कि वर्ष 2014 में शरई अदालतों में जो 235 मामले आए उनमें से 80 फीसदी मौखिक तीन तलाक के थे. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मौखिक तीन तलाक का प्रभाव न केवल प्रभावित महिलाओं पर ही पड़ता है बल्कि परिवार के बच्चे भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं. कई बार तो मुस्लिम महिलाओं को उम्र के उस दौर में अलग फैंक दिया जाता है जहाँ उसे रिश्तों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यह भी देखा गया है कि राजनीति और धर्मगुरुओं के गठजोड़ के चलते मुस्लिम महिलाओं के न्याय की बात उठाना मुश्किल रहा है. भारत देश में इसी गठजोड़ के कारण अब तक मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक, हलाला, बहुपत्नीत्व, कम उम्र में शादी जैसी कठिन समस्याओं को झेल रही हैं, जबकि यह सभी कुप्रथाएं कुरान की रोशनी में सही नहीं हैं. कुरान में तीन तलाक का जिक्र नहीं है. फिर भी हमारे समाज में तीन तलाक का चलन है. समाज में हलाला जैसी बर्बरतापूर्ण और अमानवीय प्रथा का चलन चलता है और हमारे काजी और धर्मगुरु  चुप रहते हैं
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कोई भी सस्कृति और कुप्रथा हमेशा समाज को प्रभावित करती है, समाज की पीढियां हमेशा से कुप्रथाओं के मकड़जाल में फंसी चली आ रही है. जो कुप्रथा जितनी पुरानी उसे हम इतना ही मूल्यवान समझ लेते है और उसकी प्राचीनता के प्रति श्रद्धा भाव जगाकर उसे बचाने के दुहाई देने लगते है. जबकि में समझता हूँ हमें हर 50 या 100 साल बाद अपनी परम्पराओं  का विश्लेषण कर उसमें समयानुकूल परिवर्तन कर लेना चाहिए. जन माध्यमों या जन विचारधारा में मुस्लिम महिलाओं का जिक्र एक विशेष छवि के रूप में ही आता है. दुर्भाग्य से यह एक ऐसी महिला की छवि दिखलाता है, जिसकी कोई आवाज नहीं है या कोई अपनी पहचान नहीं है. जाहिर है, इसके चलते इन महिलाओं के मसलों एवं अधिकारों के बारे में बात करने का तो सवाल ही नहीं उठता. फिर एक तरफ सरकार की ओर से अवहेलना या बेरूखी और दूसरी तरफ समाज के अंदर नाइंसाफी और दमन. यानी 1400 साल पहले दिए गए कुरानी हक तो नहीं मिले और दूसरी तरफ आजादी के 70 साल बाद लोकतंत्र में भी कोई विशेष सहभागिता नहीं मिली. मुस्लिम महिलाओं की खराब स्थिति के लिए सरकार और मजहबी रहनुमा दोनों ही बराबरी के जिम्मेदार हैं. यह कोई अनजाना खुलासा नहीं रह गया है. खुद मुस्लिम समाज के प्रगतिशील तबकों से यह बात अनछिपी नहीं रह गई है.

आज मुस्लिम समाज में बहुत सारे नव विचारक उठ खड़े हुए है. जिनमें वो अपने अधिकार, अपनी कुप्रथाओं पर प्रश्नचिंह और अपनी सामाजिक सहभागिता मांग रहे है किन्तु कमाल देखिये वो अपने ये अधिकार किसी सरकार या सेना से नहीं बल्कि अपने धर्म गुरुओं से मांग रहे है दरअसल, इस्लामिक उदारपंथ का चोला ओढ़ने वाले कई लोगों की तरह, मौलाना और मुफ्ती, काजी कुरान के दृष्टिकोण को लेकर ज्यादा फिक्रमंद रहते  हैं. न कि प्रभावित मुस्लिम महिलाओं की सोच को लेकर. उनके सामाजिक जीवन को लेकर ऐसे लोग भारतीय संविधान का भी ख्याल नहीं करते जो आर्टिकल-14 के तहत नागरिकों के साथ बराबरी के मौलिक अधिकार और आर्टिकल-15 के तहत भेदभाव के खिलाफ मौलिक अधिकार की बात करती हैं. 

इस संदर्भ में मुस्लिम विचारक फरहा फैज प्रासंगिक हो जाती हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय मुस्लिमों को मुस्लिम रूढ़िवादियों से बचाने के लिए (आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड) और  भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन) जैसे संगठनों पर बैन लगाए. क्योंकि इन रूढ़िवादियों की सोच, इनकी विचारधार जमात-उद-दावा के हाफिज मोहम्मद सईद जैसे लोगों से मेल खाती है. बेखोफ हिम्मत के साथ फैज मदरसा में दी जाने वाली शिक्षा में बदलाव की बात करती हैं और ये भी कहती हैं कि (भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन) दरअसल (आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड) की कठपुतली है. दोनों संगठन शरिया के हिमायती हैं. इस व्यवस्था को ऐसे ही चलते रहने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए. भारत में केवल एक संविधान होना चाहिए और जज भी जो उसी संविधान के अनुसार काम करें. यानी भारत के न्यायिक व्यवस्था के बराबर चलने वाली एक और व्यवस्था धर्म के नाम पर तो बिलकुल बंद होनी चाहिए! ताकि समाज के हर एक तबके की महिला निडर होकर अपनी पीड़ा बयान कर सकें ......चित्र साभार गूगल लेख राजीव चौधरी 

Friday, 7 October 2016

कलाकारों की ये कैसी कलाकारी!!

फिल्म कलाकारों को यह बात समझनी होगी कि सरहद पर न तो नकली गोली चलती और न सरहद पार से नकली आतंकी आते कि केमरा घुमाकर, एक्सन बोलो और शूटिंग खत्म. नहीं! असली गोली हवा को चीरती हुई अन्दर आती है जरा सी चूक और किसी भारत माता के लाल को फिर कोई रिटेक नहीं मिलता. सबने देखा होगा उडी हमले के बाद कुछ भारतीय सिने कलाकारों ने आतंकवाद और पाकिस्तान को लेकर अपना द्रष्टिकोण मीडिया के सामने पेश किया जिसमें कहा कि कला को आतंकवाद से मत जोड़ों. कला सरहद, धर्म और राजनीति से ऊपर है.
हालाँकि यही लोग आतंकवाद को भी किसी धर्म से नहीं जोड़ते है. खैर सब कलाकार लोग महाराष्ट्र नव निर्माण पार्टी प्रमुख राज ठाकरे के उस बयान के बाद बाहर आये जिसमें राज ठाकरे ने कहा था कि पाकिस्तानी कलाकार चौबीस घंटे ने भारत छोड़कर चले जाये. राज ने कहा था, ‘‘हमारे सैनिकों की पाकिस्तानी सैनिकों से कोई निजी दुश्मनी नहीं है. हमारे जवान जिन गोलियों का सामना करते हैं, वे फिल्मी नहीं हैं. सलमान एक गोली लगने के बाद उठ खड़े होते हैं. मैंने इस ट्यूबलाइट को कई बार जलते-बुझते देखा है. ‘‘मैं भी एक कलाकार हूं और कलाकार आसमान से नहीं टपकते. पाकिस्तानी कलाकारों ने उरी हमलों की निंदा करने से इनकार कर दिया. हमारे कलाकारों को उनके पक्ष में क्यों बोलना चाहिए?’’ 
यदि 50 साल के सलमान को पड़ोसी देश के कलाकारों से इतना ही प्यार है तो उन्हें पाकिस्तान जाकर काम करना चाहिए. ‘‘कलाकारों को समझना चाहिए कि देश सबसे पहले होता है. कलाकार समाज से अलग नहीं हैं.क्या हमारे देश में प्रतिभा का अकाल है? राज ने कहा कि उन्हें इस दलील में कोई दम नजर नहीं आता कि पाकिस्तानी कलाकारों पर पाबंदी नहीं लगानी चाहिए क्योंकि वे आतंकवादी नहीं हैं. ‘‘यदि लोग अच्छे हैं तो उससे मुझे क्या लेना-देना. मैं तो सिर्फ आतंकवादियों को देख पा रहा हूं जो हमारे लोगों को मारने के लिए आते हैं .’’ राज ने कहा कि फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को तो बस अपनी फिल्मों के कारोबार से मतलब है. उन्होंने कहा कि यदि भारतीय सैनिक अपने हथियार रखकर गुलाम अली की गजलें सुनने लग जाएंगे तो क्या होगा. उन्होंने कहा, ‘‘तब क्या होगा? क्या सैनिक हमारे नौकर हैं ? वे हमारी हिफाजत कर रहे हैं.
कुछ इसी अंदाज में फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने भी इन कलाकारों को जवाब देते हुए कहा कि असली हीरो सेना के जवान है हम फ़िल्मी हीरो की ओकात देश के सामने एक खटमल जैसी है. किन्तु वहीं कलाकार ओमपुरी से शहीद सैनिको के लिए यहाँ तक कह डाला कि लोग क्यों सेना में जाते है कोई दूसरा काम करें. क्या भारतीय गणराज्य के खिलाफ इस तरह के विषवमन करनेवालों के खिलाफ कारवाही नहीं की जानी चाहिए? सवाल तो इनसे ये भी पूछा जाना चाहिए कि क्या यह लोग इस देश को सिर्फ  फिल्म का अड्डा या रंगमंच का स्टेज शो समझ रहे है? इस देश का अस्तिव फिल्मों से नहीं बना. न यहाँ सीमाएं फिल्मों और कलाकारों की वजह से सुरक्षित है बल्कि यह देश भारतीय सेना और लोकतान्त्रिक मूल्यों की वजह से है जिसके दम पर यह लोग आज एसी रूम में बैठकर सेना पर प्रश्नचिंह उठा रहे है
अक्सर देश की गरिमा से जुड़े मुद्दों पर हमारे देश में संजीदगी के बजाय राजनीति ज्यादा दिखाई देती है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी अब सेना से सर्जिकल स्ट्राइक की वीडियो फुटेज मांगकर न केवल पाकिस्तान के अंतर्राष्ट्रीय बयान को मजबूत किया बल्कि अपनी सेना एक बार को झूठा साबित करने की कोशिश की जिस तरह इशरत जहाँ और बाटला हॉउस मुठभेड़ को फर्जी रंग देने की कोशिश की गयी थी. बहरहाल वो चर्चा लम्बी यदि देखा जाये तो जिन मुद्दों पर कानून, सेना या प्रशासन को काम करना चाहिए वहां ये कानून के मुहं पर हाथ रखकर खुद फैसला सुनाने लग जाते है. दादरी कांड के बाद देश के कलाकारों, लेखकों के अन्दर एक अजीब मानवता जागी और उस मानवता की आड़ में एक अवार्ड वापसी गेंग खड़ा हो गया. कुछ कलाकारों को भारत असुरक्षित देश लगने लगा तो कुछ को समाज के अन्दर असहिष्णुता दिखाई देने लगी थी. कश्मीर के अन्दर या बाहर जब कहीं सेना के जवान शहीद होते है तो कलाकारों, बुद्धिजीवी और लेखकों के इस गेंग को उनके परिवारजनों का रुदन भले न सुनाई नही देता हो किन्तु जब कोई आतंकी सेना के जवानों के हाथों मारा जाता है तो आतंकी के परिवार के प्रति इनके मन में अथाह संवेदना और आँखों में आंसू उमड़ आते है. अब एक बार फिर पुरस्कार वापसी ब्रिगेड के लेखकों- कलाकारों और उनके पैरोकारों ने कश्मीर के मसले पर एक अपील जारी की है. उड़ी में सेना के कैंप पर हमले के बाद छियालिस लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों आदि के नाम से एक अवार्ड लौटने वाले गेंग के नेता अशोक वाजपेयी ने एक अपील जारी की है. इस अपील में अशोक वाजपेयी ने दावा किया है कि अलग-अलग भाषा, क्षेत्र और धर्म के सृजनशील समुदाय के लोग कश्मीर भाई-बहनों के दुख से दुखी हैं. अपने अपील में इन लेखकों-कलाकारों ने कहा है कि कश्मीर में जो हो रहा है वो दुर्भाग्यपूर्ण, अन्यायसंगत और अनावश्यक है. अब शुरुआती पंक्तियों को जोड़कर देखें तो यह लगता है कि अपीलकर्ता कश्मीर भाई-बहनों और बच्चों की पीड़ा को दुर्भाग्यपूर्ण, अन्नायसंगत और अनावश्यक बताकर अपने सविंधान और सेना पर प्रश्न उठा रहे हैं.
क्या सरकार इनसे साफ –साफ नहीं पूछ सकती कि यह लोग बुरहान वानी को आतंकवादी मानते हैं या नहीं. इस मसले पर इनकी अपील क्यों खामोश रहती हैं? दरअसल अपीलकर्ता लेखकों की सूची को देखें तो ये साफ नजर आता है कि इसमें से कई लोग असहिष्णुता के मुद्दे पर बेवजह का बखेड़ा करनेवाले रहे हैं. उस वक्त उनके आंदोलन से पूरी दुनिया में एक गलत संदेश गया था और देश की बदनामी भी हुई थी. उन्हें ये बात समझनी चाहिए कि कश्मीर का मसला बेहद संजीदा है और इस तरह की अपील से देश को बदनाम करनेवालों को बल मिलता है. समझना तो उन्हें ये भी चाहिए कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. क्या इन मासूम लेखकों को भारतीय संविधान की जानकारी नहीं है जहां राष्ट्र के खिलाफ साजिश और जंग को सबसे बड़ा अपराध माना गया है और सरकार को इन स्थितियों से निबटने के लिए असीम ताकत दी गई है. यदि सीमापार स्थित किसी स्थान पर देश के खिलाफ षड्यंत्र रच जा रहा हो तो सेना सर्जिकल स्ट्राइक कर उनसे निपट सकती है किन्तु जब देश के अन्दर ही यहाँ की एकता, अखंडता और संघीय ढांचे को कोई चुनोती दे तो क्या यहाँ संवेधानिक कारवाही नहीं बनती? Rajeev choudhary 


सियासत की भी हो लाइन आफ कंट्रोल

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि देश के दुश्मनों को उनके घर में मात देने वाले वीरों के शोर्य पर अपने देश के नेता ही राजनैतिक लाभ के लिए प्रश्नचिंह उठा रहे है. यदि यह काम कोई दुश्मन देश करता तो समझ आता पर अपने देश के अन्दर गरिमामयी पदों पर विराजमान लोग ही ऐसा कर रहे है.यह बिलकुल समझ से परे है! क्या मैं इनकी तुलना जयचंद या मीरजाफर से कर सकता हूँ? यदि नहीं! “तो क्यों नहीं कर सकता?” यह सवाल भी अनिवार्य सवालों की पंक्ति में खड़ा है. नेताओ को जबाब देना चाहिए कि राजनीति बड़ी या देश?
यदि पिछले कुछ सालों में देखा जाये तो राजनीति अपने मूल स्तर से काफी नीचे गिरती दिखाई दी न अब इसके मूल्य बचे न सिद्धांत.यदि कुछ बचा है तो सिर्फ आरोप प्रत्यारोप चाहें उसके लिए कितना भी नीचे क्यों न गिरना पड़े. पाक अधिकृत कश्मीर में सेना द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक कर देश के दुश्मनों को खत्म करना अपने आप में अपने सैनिको द्वारा शोर्य की गाथा लिखना है. लेकिन उस गाथा पर व्यर्थ की बहस कहाँ तक जायज है?
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जब राजनीति में प्रवेश करने वाले थे तब उन्होंने कहा था कि राजनीति में बहुत गंदगी है. 
गंदगी को साफ करने के लिए गटर में उतरना पड़ता है जी. उसे साफ करने के लिए इसमें उतर रहा हूँ , किन्तु अब उनकी पार्टी की राजनीति देखे तो लगता है जो गंदगी राजनीति में थी वो तो थी लेकिन यह तो उसे हाथ में लेकर भारत माता के आंचल पर भी फेंकने लगे है. नीति, सिद्धांत और विचारधारा किसी राजनैतिक दल की जमीनी जड़ होती है. इसके बाद प्रजातंत्र में चर्चा आलोचना होती है. पर इसका ये मतलब नहीं कि शत्रु राष्ट्र के समाचार पत्रों की सुर्खियों में नायक बन जाये. हो सके तो सविंधान में नेताओं के लिए भी “लाइन आफ कंट्रोल”  एक नियन्त्रण रेखा होनी चाहिए कि आप यहाँ तक बढ़ सकते है इससे आगे बढ़ना राष्ट्र के प्रति आपराधिक गद्दारी मानी जाएगी. जिसकी सजा आम नागरिक तरह ही भुगतना पड़ेगी.
एक छोटा सा प्रसंग बताना चाहूँगा जब में छोटा था तो शाम को घर के बाहर चबूतरे पर गाँव के कई बुजुर्ग इकट्ठा होते और देश प्रदेश की राजनीति पर चर्चा आलोचना करते. एक दिन एक बुजुर्ग ने खड़े होकर कहा- कि “कहाँ है आजादी? गरीब को रोटी नहीं, किसान को उसकी फसल का उचित दाम नहीं, रोगी को दवाई नहीं, बच्चों को शिक्षा के लिए मूलभूत सुविधाएँ नहीं.” इसपर मैंने बीच में ही पूछ लिया दृ फिर आजादी का मतलब क्या है? तो उन्होंने कहा- “यही तो आजादी का मतलब है कि हम अपने यह मुद्दे सरकार के सामने शिष्टाचार के शब्दों में बे हिचक उठा लेते है.” किन्तु अब में देखता हूँ कि आजादी के नाम पर हमारे देश के नेता ही लोकतान्त्रिक मूल्यों पर राजनीति के बहाने हावी हो रहे है. शिष्टाचार और सुचिता पूर्ण शब्दों में अपनी बात रखना जैसे नेता भूल ही गये. कोई देश के प्रधानमंत्री को दरिंदा तो कोई मौत का सौदागर कह अपनी राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है. जैसे भूल ही गये हो कि देश पहले होना चाहिए और बाद में निजहित, 
सरकार की आलोचना करने से पहले सोच लेना चाहिए कि कहीं आप देश की साख पर तो दाग नही लगा रहे है?  इस कड़ी में अरविन्द केजरीवाल, संजय निरुपम, और दिग्विजय समेत कई नेता सर्जिकल स्ट्राइक पर सरकार को कमजोर करने के बहाने देश के रक्षको के आत्मबल पर हमला कर रहे है. राहुल गाँधी ने तो सेना के बलिदान को खून की दलाली तक जोड़ डाला. जो बेहद शर्मनाक बयान है सरहद पर जवान है तो वो सुरक्षित है हम सुरक्षित है ये देश सुरक्षित है.
पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई जी ने एक बार संसद में कहा था कि “सरकारे भी आती जाती रहेगी, पार्टी भी बनती बिगडती रहेगी, पर यह देश रहना चाहिए इसका लोकतंत्र रहना चाहिए.”
भारत में अनेकों पार्टिया है जो विचारधाराओं में बंटी है, जो एक देश की एकता अखंडता के लिए जरूरी भी है. एक स्वस्थ लोकतंत्र की खुसबू भी यही है कि सबका संगम राष्ट्रहित है. पर कुछेक लोग जो धर्म के नाम पर हिंसा करते है मैं उन्हें धर्म और वो पार्टी जिसकी विचारधारा राष्ट्र हित में न हो उन्हें पार्टी नहीं मानता. ‘यह सिर्फ एक झुण्ड है, जो अपने निज हित के लिए समाज को गन्दा कर रहे है.” राजनीति के नाम लेकर यह निर्लजता बंद होनी चाहिए. कहते है- जो जैसा होता है उसे सब कुछ ऐसा ही दिखाई देता है. यदि केजरीवाल को वीडियो फुटेज दिखा भी दे तो क्या गारंटी है कि वो उस पर सवाल न उठाये? और रहा पाकिस्तान का झूठ तो वीडियो देखने के दोनों पाकिस्तानी शरीफों के चेहरे देख लीजिये. भारतीय सेना के दावे का सच सीमा पार राजनीतिक गलियारे में स्पष्ट दिखाई दे रहा है. विनय आर्य दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा