Monday, 24 July 2017

अलग झंडे का राग, देश की अखंडता पर चोट

कर्नाटक राज्य के लिए अलग झंडा बनाने की तैयारी कर रही कर्नाटक सरकार को गृह मंत्रालय से बड़ा झटका लगा है। गृह मंत्रालय ने अलग झंडे के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि संविधान में फ्लैग कोड के तहत देश में एक झंडे को ही मंजूरी दी गई है। इसलिए देश का एक ही झंडा होगा। 
प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है। यही उसकी स्वतंत्रता का प्रतीक होता है। हमारी स्वतंत्रता हमारा संविधान किसी एक क्रांति का परिणाम नहीं है। यह कई सौ वर्षों के प्रयासों का फल है कि आज हम एक देश के तौर पर दुनिया के सामने गणतन्त्र के रूप में खड़े हैं। इसके लिए अनेक प्रकार से प्रयास किए गए। इनमें असंख्य लोगों की भागीदारी थी। कुछ शस्त्रधारी थे और कुछ अहिंसक। स्वतंत्रता के लिए समर्पित अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं के सामूहिक प्रयत्नों का फल हमारा संविधान, हमारा एक राष्ट्रध्वज और एक राष्ट्रगान है जोकि हमें विश्व के एक सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में स्थापित करता है।

भले ही लोग इस घटनाक्रम को राजनीति से प्रेरित मानकर देश की अखंडता के खिलाफ न समझकर और कर्नाटक कांग्रेस के अपने अलग क्षेत्रीय झंडे के प्रस्ताव को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देख रहे हां लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि ब्रिटिश शासन से लम्बी लड़ाई के बाद हमने यह गौरव प्राप्त किया है। 
यह प्रस्ताव फिलहाल शुरुआती स्तर पर ही है। अलग ध्वज के लिए याचिकाकर्ताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने राज्य के लिए कानूनी तौर पर मान्य झंडे का डिजाइन तैयार करने के लिए अधिकारियों की एक समिति तैयार की थी। दिलचस्प बात यह है कि याचिका 2008-09 के बीच उस वक्त दायर की गई थी जब कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। उस वक्त भाजपा सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया था कि राज्य का अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि सरदार पटेल और नेहरू को आदर्श मानने वाली पार्टी अतीत से कोई सबक नहीं लेना चाह रही है।
लगभग 564 छोटी बड़ी देशी रियासतों के अलग-अलग झंडों के नीचे हमने अपना इतिहास पढ़ा। आज हमारे पास हमारी एक राष्ट्रीय पहचान तिरंगा है भारत में किसी राज्य के पास अपना झंडा नहीं है पर जम्मू-कश्मीर के पास अपना अलग झंडा है। क्या वह दंश देश के लिए कम है जो अब कर्नाटक भी इस तरह की मांग पर उतर आया। यदि कोई एक अपराध करता है और उसे देखकर सब अपराध करने लगे तो फिर अपराध की परिभाषा ही बदल जाएगी!

भले ही कुछेक राजनेता कह रहे हां कि इसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है। लेकिन, देश की दोनों ही बड़ी पार्टी के राजनीतिक कार्यकर्ता एक अजीब मुस्कान के साथ इस दलील को खारिज करते दिखते हैं। कारण आने वाले चुनाव में दोनों ही पार्टियाँ इस मुद्दे से अपने-अपने पाले में वोट खीचतें नजर आयेंगे। अपनी पुरानी एक राष्ट्र एक ध्वज की दलील पर कायम रहते हुए भाजपा ने इसे राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाया है।  इस पर राज्य की कांग्रेस सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया है। उनका कहना है कि भाजपा बेमतलब ही इस मुद्दे का विवाद बना रही है।

लेकिन प्रश्न किसी राजनैतिक दल के नेता द्वारा आलोचना या प्रसंशा का नहीं है सवाल देश की अखंडता का है। अभी कुछ रोज पहले दक्षिण भारत से कुछेक लोगों द्वारा अलग देश द्रविडनाडू की मांग भी उठाई गयी थी जिसमें उन्होंने कहा था यदि हमें बीफ खाने की इजाजत नहीं है तो हमें अलग देश दे दीजिये। इससे भी साफ पता चलता है कि बेवजह भारतीय समुदाय के अन्दर अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा के लिए कुछ लोग नये-नये विवादों को भाषा, क्षेत्र, खान-पान से लेकर अलग ध्वज के नाम पर जन्म देने से बाज नहीं आ रहे हैं। ये दुर्भाग्य की बात है कि इस देश की विविधता के नाम पर एकता को खंडित किया जा रहा है।


हम सब जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर को राज्य के संविधान की धारा 370 के तहत अलग झंडा रखने का अधिकार प्राप्त है। जम्मू-कश्मीर को धारा 370 में विशेष अधिकार देने से देश को कितनी क्षति हुई है, यहां उसे बताने की जरूरत नहीं है। यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं विवेक शुक्ला कहते हैं कि अलग झंडा और संविधान देने के चलते ही वहां पर भारत से बाहर जाने की मानसिकता पैदा हुई। ये तो देश के जनमानस का संकल्प है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अटूट अंग बना हुआ है पर वस्तुतः स्थिति ये है कि राज्य की जनता भारत से अपने को जोड़ कर नहीं देखती। उसका संघीय व्यवस्था में कतई विश्वास नहीं है। वह भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान को ठेंगा दिखाती है और कश्मीर घाटी में इस्लामिक शासन व्यवस्था लागू करना चाहती है।

संघीय ढांचे में रहकर राज्यों को अधिक स्वायत्तता प्राप्त हो इस सवाल पर कोई मतभेद नहीं हो सकते। यूं भी अब तमाम राज्य अपने यहां विदेशी निवेश खींचने के लिए प्रयास करते हैं। पहले यह नहीं होता था पर बदले दौर में हो रहा है। राज्यों के मुख्यमंत्री लंदन, सिंगापुर और न्यूयार्क के दौरों पर जाते हैं ताकि उनके यहां बड़ी कंपनियां निवेश करें पर ये सब प्रयास और प्रयत्न होते हैं एक भारतीय के रूप में ही। ये मुख्यमंत्री अपना अलग झंडा लेकर नहीं जाते विदेशों मेंऋ पर कर्नाटक सरकार तो उल्टी गंगा बहाना चाहती है। जाहिर है, देश कर्नाटक सरकार के फैसले को नहीं मानेगा। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का ये फैसला कांग्रेस की बदहाल राजनीति को और बदहाल कर देगा इसकी पूरी संभावना है।

 विनय आर्य 

क्या मुझे इस परंपरा से छुटकारा पा लेना चाहिए?

शादी-विवाह, जन्म-मरण इस सबमें धर्म का किरदार सबसे अहम माना जाता रहा है। संस्कृति और परम्पराओं का उपयोग और दोहन भी धार्मिकता से परे हटकर नहीं देखा जा सकता। लेकिन इसके बावजूद 21 वीं सदी सूचना के तमाम माध्यमों के बीच आज इस्लाम के अन्दर से भी धार्मिक नवजागरण की आवाज दबे स्वर में ही सही पर आने लगी है। एक ऐसी पाकिस्तानी लड़की जिसका जन्म ब्रिटेन में हुआ है जो अपनी शादी को लेकर असमंजस में है और वह इस सवाल से जूझ रही है वह कहती है में जानना चाहती हूं कि क्या चचेरे भाई से शादी करनी चाहिए और क्या रिश्ते में भाई-बहनों के बीच शादी एक सही फैसला होता है? इनमें मेरे दादा-दादी भी शामिल हैं लेकिन अगर मैं ऐसा करने से इन्कार कर दूं तो क्या ये मेरा पागलपन होगा या मुझे इस परम्परा से छुटकारा पा लेना चाहिए?


दरअसल हिबा नाम की यह 18 साल की ब्रितानी पाकिस्तानी लड़की इस्लामिक परम्पराओं पर सवाल ही नहीं खड़े कर रही बल्कि इन परम्पराओं की तह तक जाने की कोशिश भी कर रही है। लेकिन एक रुढ़िवादी समाज में क्या उसके जवाब सही से मिल पाएंगे? इस सवाल का जवाब खोजते वह अपने घरवालों से लेकर पाकिस्तान जाकर अपने उन चचेरे भाइयों से मुलाकात की जिनसे उसकी शादी हो सकती थी। धार्मिक से लेकर वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर कजन-मैरिज के सही-गलत होने की पड़ताल भी की। हिबा लिखती है कि मैंने इस मुद्दे पर सबसे पहले अपनी उम्र के युवा भाई-बहनों से बात की लेकिन कोई भी कैमरे पर आकर बात नहीं करना चाहता था।

मैंने इस बारे में अपनी मां, पिता और अपने अंकल से बात की। अंकल ने बताया कि एशिया में शादी सिर्फ दो लोगों के बीच नहीं, परिवारों के बीच भी होती है, बेहतर होता है जब दोनों परिवार मूल्यों को साझा करते हैं इसलिए ऐसी शादियां किसी बाहरी शख्स से शादी करने से बेहतर होता है। मेरे अंकल ने इसे इतने खूबसूरत अंदाज में समझाया है कि मुझे ऐसी शादियों के सफल होने की बात समझ में आने लगी है। उन्होंने मुझे मेरे परिवार में हुई ऐसी शादियों के बारे में बताया। इसके बाद मां ने भी उनके परिवार में हुई ऐसी शादियों के बारे में बताया। ऐसी शादियों का आंकड़ा काफी ज्यादा है बल्कि पाकिस्तान में तो 75 प्रतिशत शादियां भाई-बहनों के बीच हुई हैं। 

इस सबकी पड़ताल के लिए हिबा पाकिस्तान आई उसने देखा कि लड़कों को ऐसी शादियों से एतराज नहीं था लेकिन लड़कियां जेनेटिक गड़बड़ियों का हवाला देते हुए इन्हें बेहतर नहीं बताती थीं। हीबा कहती है चचेरे भाई-बहनों में शादी से बच्चों के बीमार पैदा होने की बात मेरे लिए काफी डराने वाली थी। इसके बाद मैंने ब्रिटेन आकर एक ऐसे सम्बन्धी से मुलाकात की जिन्होंने अपनी चचेरी बहन से शादी की थी जिनके दो बच्चे ऑटिज्म के शिकार थे। फिर मैंने अपने मौलवी से जाकर इस बारे में बात की तो उन्होंने मुझे बताया कि कुरान में इसका जिक्र नहीं है और ये पारम्परिक चीज है। इसका धर्म से सम्बन्ध नहीं है। 

हिबा कहती है कि उस परिवार से मिलना मेरे लिए एक दर्दभरा अनुभव था। इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। मैंने ब्रिटेन आकर एक रिसर्च देखी जिसमें साल 2007 से 2010 के बीच ब्रेडफोर्ड में पैदा होने वाले बच्चों में जन्मजात बीमारियों का जिक्र था। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान 13, 500 बच्चे पैदा हुए जिनमें से तीन फीसदी बच्चे ब्रिटिश पाकिस्तानी थे। इनमें से 30 प्रतिशत बच्चे जेनेटिक बीमारी के साथ पैदा हुए। लेकिन मैंने इस सबके बाद अपनी मां से बात की तो पता चला कि उन्होंने अपने पहले चचेरे भाई के साथ शादी की थी लेकिन वह सिर्फ 18-20 महीने तक चली थी। मैं अपनी मां पर गर्व करती हूं कि वह उस शादी से बाहर आ गईं क्योंकि पाकिस्तानी समुदाय में इसे ठीक नहीं समझा जाता है। इस सबके बाद मैंने तय किया है कि मैं किसी चचेरे भाई के साथ शादी को लेकर सहज महसूस नहीं करती हूं और मैं नहीं करूंगी। 

हिबा की यह कहानी इसी माह बीबीसी पर प्रकाशित हुई थी जिसने मुस्लिम समाज की रुढ़िवादिता पर जमकर प्रहार किया। एक मुस्लिम लड़की के लिए यह देखना काफी खतरनाक था कि वह परम्परा को लेकर सवाल उठा रही है जोकि इस्लामी समाज में जायज नहीं समझा जाता। किन्तु उसने इस बात की चिंता नहीं कि और इस परम्परा को जो आज सीधे धर्म से जोड़कर देखी जाती है उसने इसे विज्ञान का आईना दिखाकर नकारा।

दरअसल विज्ञान और हमारे शास्त्रों का मत भिन्न नहीं है वैदिक धर्म में एक ही गोत्र में शादी करना वर्जित है क्योंकि सदियों से ये मान्यता चली आ रही हैं कि एक ही गोत्र का लड़का और लड़की एक-दूसरे के भाई-बहन होते हैं और भाई बहन में शादी करना तो दूर इस बारे में सोचना भी पाप माना जाता है। इस कारण वैदिक धर्म एक ही गोत्र में शादी करने की इजाजत नहीं देता है। ऐसा माना जाता है कि एक ही कुल या एक ही गोत्र में शादी करने से इंसान को शादी के बाद कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इतना ही नहीं इस तरह की शादी से होनेवाले बच्चे में कई अवगुण भी आ जाते हैं। सिर्फ हमारे शास्त्र ही नहीं बल्कि विज्ञान भी इस तरह की शादियों को अमान्य करार देता है। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो एक ही कुल या गोत्र में शादी करने से शादीशुदा दंपत्ति के बच्चों में जन्म से ही कोई न कोई आनुवांशिक दोष पैदा हो जाता है।  एक ही गोत्र में शादी करने से जीन्स से संबंधित बीमारियां जैसे कलर ब्लाइंडनेस हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए शास्त्रों में समान गोत्र में शादी न करने की सलाह दी गई है।

वैदिक संस्कृति के अनुसार, एक ही गोत्र में विवाह करना वर्जित है क्योंकि एक ही गोत्र के होने के कारण स्त्री-पुरुष भाई और बहन हो जाते हैं इस कारण पाकिस्तान की हिबा का फैसला वैचारिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से नवजागरण की दिशा में एक सही कदम है।

 राजीव चौधरी 

Monday, 17 July 2017

भारतीय मुस्लिम समाज और देश !

नैतिकता का यह मानना है कि किसी भी व्यक्ति का सर्वोच्च धर्म राष्ट्र धर्म होता है। राष्ट्रीय धर्म को सर्वोपरि मानकर उसके लिए त्याग तपस्या या बलिदान करने वाले किसी जाति सम्प्रदाय, मजहब तक अपना स्थान नहीं बनाते, अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र उनके प्रति नत्मस्तक व कृतज्ञ होता है। स्वतन्त्रता की लड़ाई में भारत माता के वीर सपूत अश्फाक उल्लाह खॉं, हो चाहे परमवीर चक्र से नवाजे अब्दुल हमीद हो अथवा हाल ही में शहीद हुए डी.एस.पी. आयूब पण्डित हों। इन सबने सम्मान अपनी जाति या मजहब के नाम पर नहीं पाया किन्तु अपने राष्ट्रीय धर्म को सर्वोपरि मानते हुए अपनी कुर्बानियां दी हैं। इसलिए पूरा देश आहत होता है, नत्मस्तक होता है। यह भी संभव था यदि जाति अथवा सम्प्रदाय के लिए बलिदान होता तो एक वर्ग विशेष तक सीमित रहता और इतना सम्मान नहीं पाते।

                विगत कुछ दिनों से भारत की आंतरिक शक्ति और सुरक्षा को इसी देश के कुछ नागरिकों से खतरा हो गया है। उनके दुष्प्रयासों को रोकने में बड़ी शक्ति सेना, सी आर पी और सुरक्षा बल, की लग रही है। इस आग को और बढ़ाने में पड़ोसी राष्ट्र पूरी मदद कर रहा है। हर संभव प्रयत्नशील है, इस देश की आन्तरिक स्थिति को बिगाड़ने के लिए राष्ट्रीय दुश्मनों के हाथों इसी देश के किशोर व नवयुवक अपने ही देश में पाकिस्तान की जय-जयकार कर रहे हैं, आतंकवादियों, घुसपैठियों के विरूद्ध की जा रही कार्यवाही में वे बाधक बन रहे हैं। पत्थर, सेना व सुरक्षा बलों पर फेंक रहे हैं। आतंकवाद को रोकने में मदद करने के स्थान पर उनका साथ दे रहे हैं। देश की गोपनियता भंग कर रहे हैं। सीमा पार से घुसपैठियों का देश में प्रवेश करने में सहयोग, सुरक्षा और आश्रय दे रहे हैं। देश के अनेक सपूत इस राष्ट्र विरोधी गतिविधि को रोकने में अपने प्राण गवां चुके हैं। मजहबी कट्टरता का नंगा नाच पूरे क्षेत्र में व देशे के कुछ अन्य भागों में हो रहा है।

                यह सब कौन कर रहा है ? किस जाति सम्प्रदाय के व्यक्तियों का सहयोग इन्हें प्राप्त है ? कौन देश के खूंखार आतंकियों को अपना रहनुमा मान रहे हैं ? कौन इस देश से कश्मीर को अलग कर पाकिस्तान को सौंपना चाहता है ?

                ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर टी.वी. चैनल, समाचार पत्र, वाट्स अप, फेस बुक, यू ट्यूब पर करोड़ों व्यक्तियों को मिलता है और उनके सामने इस्लाम का चेहरा खड़ा हो जाता है, तमाम ये राष्ट्रद्रोही व मजहबी उन्माद करने वाले इस्लाम के मानने वाले हैं। स्वाभाविक है जिस समुदाय के व्यक्तियों द्वारा यह जघन्य आपराधिक कार्य कर देश की जन धन, शान्ति व शक्ति को नष्ट किया जा रहा है वे इस्लाम के मानने वाले हैं। इस प्रकार आम व्यक्ति की इस्लाम के प्रति क्या भावना होगी यह आप भलि भांति समझ सकते हैं। कम से कम अच्छी तो नहीं होगी यह सत्य है।

                किन्तु यहां एक प्रश्न उठता है क्या इस्लाम के सभी अनुयायी प्रत्येक मुसलमान इस असंवैधानिक और राष्ट्र घाती कार्य में लिप्त हैं ? क्या हर मुसलमान को कश्मीर की परिस्थिति के लिए दोषी माना जावें ?
                नहीं प्रत्येक मुसलमान न तो ऐसा चाहता है और न ही उसकी इन उग्रवादी, आतंकवादी कार्यों में कोई सहयोग है या रूची है। देश के मुसलमानों की संख्या का बहुत बड़ा तपका इसे गलत मानता है। लाखों मुसलमान इस राष्ट्र को अपना मादरे वतन, जन्नत मानता है। वह इस राष्ट्र से अच्छा जीवन किसी अन्य इस्लामिक कन्ट्री में नहीं मानते हैं वे वहां की अपेक्षा यहां बहुत सुरक्षित व सुखी है। इसलिए हर मुसलमान इसके लिए दोषी नहीं है। किन्तु यह भी सत्य है कि इन सारी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाकिस्तान के सहयोगी, हिंसा, लूटमार करने वाले अलगाववादी, उग्रवादी, आतंकवादी सभी मुस्लिम है ?

                कुछ समय पहले खालिस्तान की मांग उठी थी, कुछ सिख्ख पंथ के अनुयायी इसे बहुत बड़ा रूप देने के लिए हिंसा, मार काट करने में लगे थे। पंजाब खाली करवाने में जबरन अपनी विचारधारा मनवाने में लगे थे। पवित्र पूजा स्थलों में हिंसात्मक वातावरण बन रहा था। श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या भी इसी सम्प्रदाय के नवयुवकों द्वारा की गई थी। पूरे देश में सिख्ख समुदाय के प्रति एक आक्रोश और नफरत सी फैल गई थी। जबकि सारे सिख्ख इस प्रकार के कार्यों के समर्थक नहीं थे, किन्तु फिर भी नफरत व शंका के घेरे में थे। क्योंकि जो साफ सुथरे राष्ट्र प्रेमी होते हुए भी वे चुप रहे, उन्होंने अपनों का खुलकर विरोध नहीं किया था।

                आज वही स्थिति तेजी से पुनः देश में फैल रही है। चन्द मुसलमानों के अनैतिक कार्यों को लाखों की संख्या में इस देश से प्रेम व सद्भाव रखने वाले देश के हितैषी भी हैं, किन्तु वे मौन हैं। कौम बदनाम हो रही है, इस्लाम के प्रति एक अलग सी विचारधारा बनते जा रही है जिससे देश व संस्कृति का भाव जुड़ा है। चुप रहना इस्लाम के लिए अपनी गरिमा को क्षति पहुंचा रहा है। यदि यही चलता रहा तो एक राष्ट्रीय विचारधारा वाले या सनातन धर्मियों के व इस्लाम के मध्य यह नफरत की खाई और बढ़ती जावेगी। इसलिए उन तमाम मुस्लिम सम्प्रदाय के शान्तिप्रिय, राष्ट्र हितैषी, मानवता की रक्षा करने का विचार रखने वाले तथा साम्प्रदायिक कटुता की भावना से उपर इस्लाम के नुमायिन्दों को राष्ट्रहित में देश में हो रही अलगाववादी, आतंकवादी, पाकिस्तान परस्त विचारधारा का खुलकर ताकत के साथ घोर विरोध करना चाहिए। यदि देश हम सबका है तो फिर देश को हो रही क्षति में मौन क्यों रहें ? आज मौन रहना  इन अनैतिक कार्यों को एक मौन सहयोग की श्रेणी में लाकर खड़ा कर रहा है। इसे अविलम्ब बदलने की आवश्यकता है। मौन आपके सत्य को नष्टकर देता है, कहा गया ‘‘मौनं सत्यं विनष्यति’’
                                                                                                                                 प्रकाश आर्य
                                                                                                                                   सभामन्त्री
                                                                                                 सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली



Thursday, 13 July 2017

पांच पिशाच रुधिर पीते हैं।

गौरीशंकर भारद्वाज (पूर्व विधायक)


पांच पिशाच रुधिर पीते हैं।
काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से, हा! किसके तन मन रीते हैं।।
छूटें इनसे पिण्ड हमारे, अगणित जन्म वृथा बीते हैं।
पांच पिशाच रुधिर पीते हैं।
अथर्ववेद के मंत्र - 8/4/22 में उपदेश दिया गया है कि उलूकयातुमुत शुशलूकयातुम्, जहि श्वयातुमुत कोकयातुम।
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुम, दृषदेव प्रमशा रक्षइन्द्र।।
इस वेद मंत्र में उल्लू की चाल ;अज्ञानता अर्थात् मोहद्ध, भेड़िये की चाल ;क्रोधद्ध, हंस की चाल ;अहंकारद्ध, गिद्ध की चाल (लोभ) तथा चिड़ा की चाल (काम) रूपी पांच शत्रुओं को जीतने का आह्वान किया गया है। वास्तव में उक्त पांचों राक्षस मनुष्य के मूल प्रवृत्तिजन्य मनोविकार हैं, जिन्हें त्याग कर ही मनुष्य जीवन सफल हो सकता है। प्रत्येक मनुष्य में मूल-प्रवृत्ति Instinct उग्र या शान्त रूप में अवश्य होती है। मूल प्रवृत्तियां अपने जन्मजात अथवा प्राकृत रूप मे अत्यन्त विनाशकारी होती हैं। प्रख्यात  मनोवैज्ञानिक मैग्डूल ने मूल प्रवृत्ति की परिभाषा करते हुए कहा है कि -‘‘मूल प्रवृत्ति प्रदत्त शक्ति है, जिसके कारण प्राणी किसी विशेष प्रकार के पदार्थ की ओर ध्यान देता है और उसकी उपस्थिति में विशेष प्रकार के संवेग Emotionकी अनुभूति करता है एवं उस पदार्थ के सम्बन्ध में एक विशेष प्रकार का आचरण करता है।’’ इन मूल प्रवृत्तिजन्य मनोविकारों के विनाशकारी दुष्प्रभाव से इनके शोध Sublimation द्वारा बचा जा सकता है। धर्माचरण, सदाचार, सद्व्यवहार, स्वाध्याय, योग तथा सत्संग से दुष्ट मनोविकारों के दुष्परिणाम से मुक्त हुआ जा सकता है।
काम
काम की प्रवृत्ति या मनोवेग अत्यन्त प्रबल होता है। ‘काम कुसुम धनु सायक लीने।’ काम के दुर्दमनीय वेग से मनुष्य बेबस व पस्त हो जाता है। मैग्डूगल ने काम को डेंजमत प्देजपदबज कहा है। 
स्त्री जातो मनुष्याणां स्त्रीशां च पुरुषेषु वा।
परस्परकृतः स्नेहः काम इव्यभिधीयते।। शार्गधर-1/67
अर्थात् स्त्रियों में पुरुषों के और पुरुषों में स्त्रियों के परस्पर स्वाभाविक आकर्षण और स्नेह को ‘काम’ कहते हैं।
अतः स्त्री-पुरुष के समागम से सन्तान की उत्पत्ति होती है और सृष्टि का प्रवाह चलता रहता है।
कमोजज्ञे प्रथमो नैनं देवा आपुः पितरो न मर्त्या।
तत स्वत्वर्मास ज्यामान् विश्वहा महांस्तस्मैते ते काम नम इत्कृणोमि।। अथर्ववेद-9/2/19
अर्थात् काम सबसे पहले पैदा हुआ। इसको न देव जीत सके, न पितर और न मनुष्य जीत सके। इसलिए है काम् तू सब प्रकार से बहुत बड़ा है। अतः मैं तुझे नमस्कार करता हूं।
श्रीमद्भागवत् गीता में लिखा है-
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्य वैरिणः।
काम रूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च।।
अर्थात् ज्ञान का नाश करने वाला यह काम ही ज्ञानियों तथा मुमुक्षओं ;मोक्ष के इच्छुकद्ध का वैरी है। ‘कामनुराणां न भय न लज्जा’ अर्थात् कामी व्यक्ति को न भय होती है न लज्जा। ‘अन्धीकरोमि भुवनं वधिरी करोमिजगत’ अर्थात् काम व्यक्ति को अन्धा व बहरा कर देता है। राजा भर्तृहरि ने ‘शृंगार शतक’ के पहले ही श्लोक में काम की निन्दा करते हुए लिखा कि-
हे काम! तुझे बार-बार धिक्कार है।
मनुस्मृति में लिखा है-‘‘न जातु काम कामनामुप भोगेन शाम्यति हविषा कृष्ण वर्त्येव भूय एवामि वर्धते।’’ अर्थात् कामनाओं को निरन्तर जगाने से कामनाओं का शमन नहीं होता। जिस प्रकार घी की आहुति से अग्नि प्रचण्ड होती है, उसी प्रकार निरन्तर भोग विलास से ‘काम’ भावना अत्यन्त प्रचण्ड हो जाती है और कामी मनुष्य शक्तिहीन, अकर्मण्य एवं निन्दनीय बन जाता है।
अनियंत्रित काम से व्यभिचार व बलात्कार की सृष्टि होती है। आज अश्लील साहित्य, विज्ञापन, सिनेमा व टी.वी. सीरियलों में प्रदर्शित उत्तेजक दृश्य, संवाद व संगीत और अर्धनग्न पहनावा, तामसी भोजन व मद्यपान तीव्र कामुकताकी सृष्टि करते हैं।
‘काम’ प्रवृत्ति को नियंत्रित व परिष्कृत करने के लिए उसके मूल में उपस्थित प्रवृत्ति का उपयोग सद्साहित्य, कला व सुसंगीत के सृजन में करना चाहिए। सात्विक जीवन व्यतीत करते हुए केवल सन्तानोत्पत्ति व वंश वृ( के लिए ‘काम’ मे प्रवृत्त होना चाहिए। कठोर संयम एवं ब्रह्मचर्य के पालन से ही काम पर विजय पाई जा सकती है। गृहस्थ-ब्रह्मचारी भी काम पर नियंत्रण कर सकते हैं। महाभारत के आदि पर्व में युधिष्ठिर के पूछने पर मंत्री कणिक ने कहा कि ‘धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्म किन्न सेव्यते।’ अर्थात् अर्थ और काम की सि( धर्म से होती है।
क्रोध
विपरीत परिस्थितियों में हानि पहुंचाने या अपमान करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध उत्पन्न उग्र मनोभाव को ‘क्रोध’ कहते हैं। मनुस्मृति में उल्लिखित धर्म के 10 लक्षणों में ‘अक्रोध’ भी सम्मलित है।, इसका विलोम -‘क्रोध’-अधर्म, विनाश और पतन का द्योतक है। श्रीमद्भागवत् गीता के श्लोक 63/2 में श्रीकृष्ण अर्जुन को क्रोध के दुष्परिणाम बताते हुए कहते हैं-
क्रोधाद्मवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृति विभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात्प्रास्यति।।
अर्थात् क्रोध से पूर्ण मोह उत्पन्न होता है और मोह से स्मरणशक्ति का विभ्रम हो जाता है। जब स्मरण शक्ति भ्रमित हो जाती है तो बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि नष्ट हो जाने पर मनुष्य भवकूप में गिर जाता है। क्रोध दो रूपों में प्रगट होता है-कथनी और करनी में। प्रथम श्रेणी में क्रोध उद्दीप्त होने पर व्यक्ति अपने विरोधी को ललकारते हुए कहता है कि मैं तेरी हड्डी पसली तोड़ दूंगा, तुझे मिट्टी में मिला दूंगा। मौखिक क्रोध में व्यक्ति गाली और धमकी का प्रयोग करता है, जबकि करनी में व्यक्ति हिंसक हो जाता है और उससे मारपीट करने लगता है तथा विरोघी की हत्या तक कर देता है, जिसका परिणाम फांसी या आजन्म कैद होता है। सामाजिक, धार्मिक एवं राजकीय क्रोध अत्यन्त विनाशकारी परिणाम को जन्म देता है। द्रौपदी की दुर्योधन के प्रति व्यंग्यपूर्ण कटूक्ति का परिणाम ‘महाभारत’ युद्ध हुआ। एक का क्रोध दूसरे में क्रोध का संचार करता है। क्रोध सब मनोविकारों में सबसे अधिक वेगवान है, जो शीघ्र शान्ति भंग कर देता है और आक्रमण को प्रोत्साहित करता है। भेड़िया बहुत क्रोधी और हिंसक होता है और बिना कारण ही आक्रमण कर देता है। इसलिए वेद में कहा गया है कि ‘शुशलूक यातुम्’ अर्थात् भेड़िये की चाल छोड़ दो।
प्रसिद्ध जैन सन्त मुनिश्री तरुण सागर क्रोध के बहुआयामी रूप का उल्लेख करते हुए कहते हैं ‘‘क्रोध का अपना पूरा खानदान है। क्रोध की एक लाडली बहन है-‘जिद’। वह हमेशा क्रोध के साथ-साथ रहती है। क्रोध की पत्नी है-‘हिन्सा’। वह पीछे छिपी रहती है लेकिन कभी-कभी आवाज सुनकर बाहर आ जाती है। क्रोध के बड़े भाई का नाम है - ‘अहंकार’ क्रो का बाप भी है, जिससे वह डरता है, बाप का नाम है-‘भय’। क्रोध की दो बेटियां हैं-‘निन्दा’ व ‘चुगली’, एक कान के पास रहती है, दूसरी मुंह के पास। क्रोध का बेटा है - ‘वैर’। ‘ईर्ष्या’-क्रोध के खानदान की नकचढ़ी बहू है। क्रोध की पौत्री है ‘घृणा’, जो हमेशा नाक के  पास रहती है। क्रोध की मां है-‘उपेक्षा’।
क्रोध के साथ एक और सूक्ष्म भाव अनुस्यूत रहता है, वह भाव है-‘मत्सर’ मत्सर अर्थात् दूसरों के उत्कर्ष को सहन न करने के फलस्वरूप अन्दर ही अन्दर क्रोध से उबलना और अपने साथियों से झगड़ा करना। कुत्ते में मत्सर का प्रबल भाव होता है।
किन्तु सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन में क्रोध की महती आवश्यकता होती है। क्रोध, अन्याय, अत्याचार, शोषण और देश पर हुए आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए आवश्यक है। सहनशीलता, क्षमा, धर्म एवं शिष्टाचार का पालन क्रोध के निरोध के उत्तम साधन हैं।
लोभ
वेद में कहा गया है ‘गृधयातुम’ अर्थात् गिद्ध की चाल छोड़ दो। गिद्ध बहुत लालची और लोभी होता है। लोभ के मूल में अथ्रसंग्रह तथा इच्छाओं की पूर्ति है। इच्छाएं लोभ को जन्म देती है तथा असन्तोष लोभ की वृद्धि करता है। इच्छाएं तीन प्रकार की होती हैं-पुत्रेष्णा, वित्तेष्णा तथा लोकेष्णा। इन में वित्तेष्णा (धन संग्रह) की चाह अत्यन्त तीव्र, प्रबल और असीमित होती है, जो उचित-अनुचित तथा वैध-अवैध उपायों से धन संग्रह और उसके संरक्षण की तीव्र गतिशीलता प्रदान करती है। अनुचित ढंग से धन-संग्रह द्वारा लोभ की पुष्टि करना निकृष्ट कार्य है और व्यक्ति विशेष के प्रति लोभ रखना ‘मित्रता’ अथवा ‘प्रेम’ रूप में उत्कृष्ट कार्य है।
‘लोभ’ बहुत व्यापक मनोवृत्ति है। देशप्रेम भी ‘लोभ’ का एक रूप है,  जिसमें देश की सुरक्षा व जनकल्याण का लोभ रहता है। स्त्री-पुरुष का प्रेम भी वस्तुतः एक प्रकार का ‘लोभ’ है। लोभ से सान्निध्य को और प्राप्त करने की इच्छा होती है। किसी प्राप्त वस्तु या व्यक्ति के संरक्षण व सान्निध्य की भावना उस वस्तु या व्यक्ति के प्रति लोभ है। इस प्रकार वस्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति ‘लोभ’ का तीव्र रूप है। श्रेष्ठ व त्यागी संन्यासी तथा आप्त मनुष्य भी ‘लोकेष्णा’ ;यश व प्रसिद्धि प्राप्त करने की इच्छाद्ध का ‘लोभ-संवरण’ नहीं कर पाते। वास्तन में ‘लोभ’ व्यक्ति को हीन एवं दुर्बल बना देता है। धन का लोभ जब व्यसन बन जाता है तो लोभी की सद्वृत्तियां नष्ट हो जाती है।
आज के भौतिकवादी युग में ‘वित्तेष्णा’ की पूर्ति का ‘लोभ’ अत्यन्त विनाशकारी और मनुष्यता के पतन का कारण बन गया है। अर्थोपार्जन के लिए चोरी,डाका, बेइमानी, शोषण, मिलावट, कर चोरी व अनेकानेक व्यसन एवं वर्ग-संघर्ष का बोलबाला हो रहा है। आज का युग पूर्णतः अर्थ-प्रधान बन गया है। महाभारत में आज से 5000 साल पहले ही कहा गया था-‘‘अर्थस्य पुरुषोदासः दास्त्वर्थो न कस्याचित्’’। अर्थात् मनुष्य धन का दास है, किन्तु धन किसी का दास नहीं। भर्तृहरि ने ‘नीतिशतक’ में कहा-‘सर्वेगुणा कांचनामस्ति’ अर्थात् धन में सब गुण होते हैं। धनवानों को ही सत्ता व सम्मान मिलता है।धनवान मूर्ख भी विद्वान, कायर भी वीर तथा भ्रष्ट होने पर भी सदाचारी कहलाता है। धनवान के चारों ओर चापलूसों की भीड़ लग जाती है। 
लोभी कभी लक्ष्य भ्रष्ट नहीं होते। निरन्तर अपने धन संग्रह व संरक्षण में लगे रहते हैं। हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकारी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लोभियों पर तीव्र व्यंय करते हुए लिखा है-‘‘लोभियों! तुम्हारा अक्रोध, तुम्हारा इन्द्रिय-निग्रह, तुम्हारी मान-अपमान समता, तुम्हारा तप अनुकरणीय है। किन्तु तुम्हारी निष्ठुरता, तुम्हारी निर्लज्जता, तुम्हारा अविवेक तथा तुम्हारा अन्याय विग्रहणीय है। तुम धन्य हो! तुम्हें धिक्कार है!’’ वास्तव में ‘लोभ’ के वशीभूत होकर अनुचित तथा अवैध ढंग से धन अर्जित करना पतन का मार्ग खोल देता है। इसलिए मनुस्मृति में कहा गया है कि-
‘सर्वेषामेव शौचनामर्थ शौचम परं स्मृतम्।’
अर्थात् सभी पवित्रताओं में अर्थ की पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ है। मनुस्मुति में अर्थ संग्रहके लिए पांच नियम निर्देशित किए हैंः-
;1द्ध अर्थ संग्रह करने के समय किसी भी प्राणी को कष्ट न हो।
;2द्ध अर्थ संग्रह करते समय अपने तन-मन को कष्ट न हो।
;3द्ध अपने ही पुरुषार्थ से उत्पन्न किए गये अर्थ से निर्वाह किया जाए, दूसरों की कमाई से नहीं।
;4द्ध अपना उत्पन्न किया हुआ धन भी किसी गर्हित कृत्य के द्वारा अर्जित न किया जाए।
;5द्ध अर्थोपार्जन के कारण स्वाध्याय तथा सत्संग में विघ्न न हो।
मनुष्य का कल्याण संग्रह में नहीं, अपितु त्याग में है। धन का सदुपयोग सेवा, दान व परोपकार के रूप में होना चाहिए। वेद में कहा गया है-‘‘केवलाघो भवति केवलादि’’ अर्थात् जो अकेला खाता है, वह पाप खाता है। इसलिए ‘अतिथि सत्कार’ को एक पवित्र यज्ञ माना गया है। ‘लोभ’ के राक्षस को ‘अपरिग्रह’ द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। ‘असार तथा अनावश्यक वस्तुओं व विचारों को त्यागना ही ‘अपरिग्रह’ है।’ ‘इदमम्’ की धारणा ही ‘अपरिग्रह’ का मूल मंत्र है। अपनी आवश्यकताआें को कम से कम रखना अपरिग्रह का प्रथम चरण है।
‘लोभ’ की मूल प्रवृत्ति की प्रेरक शक्ति संग्रह वृ़त्त है। अतः संग्रह वृत्ति का उपयोग उत्तम कार्यों मे किया जा सकता है-यथा पुस्तक-संग्रह सिक्का, टिकट संग्रह आदि। म्यूजियम व्यापक संग्रह का उत्तम उदाहरण है।
महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर की एक प्रसि( उक्ति हैः- ‘मैं बांह उठाकर उच्च स्वर में कह रहा हूं किन्तु, कोई सुनता नहीं, धर्म से ही ‘अर्थ’ और काम की सिद्धि होती है।’’
मोह
‘मोह’ अज्ञानता का प्रतीक है। श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने सम्बन्धियों के प्रति मोहाछन्न होने पर कहते हैं कि ‘मोह’ से स्मरण शक्ति का विभ्रम हो जाता है और बुद्धि नष्ट हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य भवकूप में गिर जाता है। इसलिए वेद में कहा गया है ‘उलूकयातुम्’ अर्थात् है मनुष्य! तू उल्लू की चाल ;अज्ञानता रूपी मोहद्ध को छोड़ दे। मोहासक्त व्यक्ति की अपने आत्मीय व्यक्ति के प्रति तीव्र आसक्ति की भावना होती है। मोहासक्त व्यक्ति अपने आत्मीय के वियोग से अत्यन्त व्यथा व वेदना अनुभव करता है। किसी शायर ने ठीक ही कहा है-
जुदा किसी से किसी का ग़रज हबीब न हो।
यह वह दर्द है जो दुश्मन को भी नसीब न हो।।
मोहासक्त व्यक्ति आत्मीय के वियोग की आशंका से सदैव भयभीत, चिन्तित व अकर्मण्य बना रहता है। श्रीमद्भागवत गीता का प्रारम्भ मोहाच्छन्न अर्जुन द्वारा स्वजनों को मारने की भावना से प्रेरित होकर युद्ध न करने की घोषणा के फलस्वरूप श्रीकृष्ण के उपदेशों से होता है।
यदाते मोहकलिंल बुद्धिव्यतिरिष्यति।
तदागन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च। गीता-52/2
अर्थ- श्रीकृष्ण उवाचः हे अर्जुन! जब तुम्हारी बुद्धि ‘मोह’ रूपी सघन वन को पार कर जायेगी तो तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सबके प्रति अन्यमनस्क हो जाओगे।
न्यायदर्शन में लिखा है, ‘मोहं पापीयान’
अर्थात् ‘मोह’ सबसे बुरा है। जीव की अज्ञानता वश मोह के कारण उसमें सब दोष उत्पन्न हो जाते हैं। मोह के कारण राग-द्वेष की उत्पत्ति होती है। कभी-कभी मोह के अत्यन्त विनाशकारी परिणाम होते हैं। धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह के कारण ही महाभारत का भयंकर युद्ध हुआ।
श्रीमद्भागवत गीता में मोह के निवारण के लिए लिखा है-
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्त कालेऽपि ब्रह्मनिर्वायामृच्छति।।
अर्थात् यह आध्यात्मिक तथा ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता। यदि कोई जीवन के अन्तिम समय में भी इस तरक स्थित हो तो वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
अहंकार
‘अहंकार’ अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा स्वयं को श्रेष्ठ समझने की कुंठा है। अंग्रेजी में इसे.......... कह सकते हैं। किसी को सत्ता, किसी को बल, किसी को धन, किसी को अपने पांडित्य पर तथा किसी को रूप का ‘अहंकार’ होता है। अहंकार व्यक्ति को सहज नहीं रहने देता। गरुड़ पक्षी बहुत अहंकारी होता है। उसे अपने सुन्दर परों पर बहुत अहंकार होता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘सुपर्णयातुम्’ अर्थात् हे मनुष्य तू गरुड़ की चाल ;अहंकारद्ध छोड़ दे। अहंकारी व्यक्ति स्वयं के लिए तथा राष्ट्र व समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है। अहंकार के कारण ही महापंडित तथा प्रबल बलशाली रावण का पतन हो गया। अहंकार व्यक्ति को सन्मार्ग पर चलने नहीं देता। अहंकार के कई पर्यायवाची शब्द हैं यथा दम्भ, घमण्ड, गर्व, अभिमान आदि, जो पात्र, समय, स्थान व परिस्थिति के सन्दर्भ में सूक्ष्म अर्थान्तर के साथ प्रयुक्त होते हैं यानि पत्नी ने पति से पूछा, क्योंजी? अहंकार और घमंड में क्या अन्तर है? पति ने उत्तर दिया-‘तुम मुझे क्या समझती हो? यह मेरा अहंकार है और मैं तुम्हें कुछ नहीं समझता, यह मेरा घमण्ड है।’
‘अहंकार’ का शोधरूप Sublimation स्वाभिमान, स्वदेश प्रेम एवं स्वभाषा पर गर्व करना गौरव समझा जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन म्यंमार में ही क्यों?

पिछले वर्ष नेपाल अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन की सफलता के बाद अगले महासम्मेलन के लिए ब्रह्मदेश का चुना जाना एतिहासिक द्रष्टिकोण में एक गौरव का विषय है। ब्रह्मदेश यानि बर्मा और आज वर्तमान में म्यंमार कहा जाता है। इसी म्यांमार के मध्य में बसने वाले शहर मांडले का आर्य महासम्मेलन के लिए चुना जाना हमारे लिए और भी सौभाग्य का क्षण है। यह स्वतंत्र बर्मा की भूतपूर्व राजधानी, मुख्य व्यापारिक नगर एवं आवागमन का केंद्र है जो इरावदी नदी के बाएँ किनारे पर रंगून से लगभग 350 मील उत्तर दिशा में बसा है, कहते हैं इसे 1856-57 ई. में राजा मिंडान ने इसे बसाया था। शहर में बौद्ध  धर्मावाल्म्बियों के अतिरिक्त हिन्दू, मुसलमान, यहूदी, चीनी एवं अन्य जाति के लोग निवास करते हैं। द्वितीय महायुद्ध के समय 1942 ई. को जापानियों ने इस पर अधिकार कर लिया था। उस समय राजमहल की दीवारों के अतिरिक्त लगभग सभी इमारतें जल गई थीं। तब जापानियों ने इसे ‘‘जलते हुए खंडहरोंवाला नगर’’ कहा था हालाँकि आज मांडले से बर्मा की सभी जगहों के लिये स्टीमर सेवाएँ हैं तथा यह रेल एवं सड़क मार्ग द्वारा भी देश के अन्य हिस्सों से जुड़ा है। कभी वैदिक सभ्यता काल के इस ब्रह्मदेश में आज पगोडा शैली में बने भवन व मंदिर बौद्ध स्पुत बौद्ध धर्म से जुड़ी आस्था के केंद्र होने का आसानी से पता चल जाता है।

मांडले का मौसम लगभग भारत जैसा ही है। सर्दियों में कड़ी सर्दी, गर्मियों में आकाश से लेकर धरती तक भट्टी की तरह तपती है तो बरसात में भारी वर्षा भी यहाँ होती है। मंदिरों, प्राकृतिक सुषमा और सौन्दर्य से भरपूर यह शहर अपनी अनेक विशेषताओं के कारण भी जाना जाता है। यहाँ दुनिया की सबसे बड़ी पुस्तक के रूप में एक मंदिर विधमान है यानि कि किताब के हर प्रष्ठ के रूप में एक मंदिर बना है जिनकी संख्या करीब 500 से ज्यादा है।

इस वर्ष महासम्मेलन की तैयारियों से जुड़े सम्बन्धित कार्यों का जायजा लेने के लिए मेरा मांडले जाना हुआ तो मांडले की धरती पर पांव पड़ते ही भारत के महान गौरव लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक, नेताजी सुभाषचंद्र बोस मन में उभर आये। मांडले में ब्रिटिश शासनकाल में यहां किलानुमा जेल थी जहाँ भारत माता के इन वीर सपूतों को बंदी बनाकर रखा गया था। किले के अवशेष आज भी भारतीय क्रांति की स्मृति ताजा कर देते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी लाजपत राय समेत कई क्रन्तिकारी यहाँ एकांतवास में रखे गये थे। अकेले और असुविधाओं के बीच, सिर्फ इसलिए कि आर्य समाज भारत देश से गुलामी की बेड़ियाँ काटकर फेंक देने पर अडिग था जिसे अंग्रेजी हकुमत नहीं चाहती थी।


हालाँकि बर्मा की गलियों में आर्य समाज के नाम का डंका बज चुका था। क्योंकि आर्य समाज की स्थापना के बाद बर्मा के इसी मांडले शहर में वैदिक धर्म के अनुयायियों महर्षि दयानन्द के अनन्य भक्तों का आगमन लगभग सन् 1897 में हो गया था। भौगोलिक इतिहास में कभी भारत से जुड़े इस देश में महर्षि दयानन्द, पंडित लेखराम स्वामी श्रद्धानन्द  समेत अन्य समकालीन महात्माओं, संतो के वैदिक उपदेश जब यहाँ के लोगों के कानों में गूंजे तो शीघ्र ही बर्मा के प्रसिद्ध  नगर रंगून (यंगून) और मांडले में आर्य समाज मंदिर बन गये। यह सब कार्य वैदिक धर्म प्रेमी लोग बड़े उत्साह और लग्न से करने लगे। वैदिक ध्वज एक फिर ब्रह्मदेश की धरती पर लहरा उठा। 

धीरे-धीरे वर्ष बढ़ते गये अगली सदी के सूर्य उदय के साथ आर्य समाज दिन-दूनी रात-चौगनी प्रगति करने लगा। आर्य समाज की गतिविधियां  विद्यालय, अनाथालय, सत्संग संचालित होने लगे प्रत्येक बड़े शहर में जैसे रंगून, माण्डले, लाशियो, मिचिना, मोगोग, जियावाड़ी में स्थापित अनाथालय, स्कूल व सामाजिक संस्थाओं के कार्यों समेत स्त्री समाज की शिक्षा के प्रोत्साहन को लेकर तथा अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आर्य समाज के कार्यों ने लोगों का मन जीत लिया था। लोग अपने साधारण भवनों के साथ जमीन और पैसे समाज के कार्यों के लिए दान स्वरूप भेंट करने लगे। 

लेकिन जल्दी ही नई सदी के इस सूर्य को दूसरे विश्व युद्ध का ग्रहण लग गया जो द्वितीय विश्व यु( के बाद बर्मा में पैदा हुए भारत विरोधी रुझान का शिकार बन गया था। उस समय रंगून में आधी आबादी भारतीयों की थी। वे ब्रिटिश प्रशासन में महत्त्वपूर्ण पदों पर थे और इसीलिए बर्मा के नागरिकों के निशाने पर थे। उन्हें नस्लभेदी हमलों का सामना भी करना पड़ा। सन् 1962 में भारतीयों को बर्मा से निकाला जाने लगा और उनकी निजी और धार्मिक सम्पति का राष्ट्रीयकरण किया जाने लगा था। उस समय भारतीय मूल के लगभग तीन लाख लोगों को बर्मा से पलायन करना पड़ा था।

बर्मा में सैनिक शासन के प्रारम्भ के साथ वैदिक साहित्य आदि पर रोक लगा दी गयी। बौद्ध धर्मी बहुसंख्यक इस प्रदेश में नवीन साहित्य के प्रकाशन, बिक्री आदि पर रोक लगा दी गयी। एक किस्म से आर्य समाज के उत्साहित विद्वानों के उत्साह आर्य समाज के कर्मठ कार्यकर्ताओं के कार्यों पर चोट जैसा था। लेकिन इसके बावजूद भी हमारा प्रणाम और नमन उन आर्य कार्यकर्ताओं को जिन्होंने फटे, पुराने आर्ष ग्रन्थों से ही वेद की ज्योति के दीपक को बुझने से बचाए रखा। यदि आज वर्तमान में बर्मा के अन्दर आर्य समाज की बात की जाये तो शहरी क्षेत्रों की आर्य समाज मंदिर बेहद भव्य तो ग्रामीण क्षेत्रों की आर्य समाजें वैदिक ज्ञान की लोलुपता के कारण खस्ताहाल हैं। आज मुझे लिखते हुए हर्ष हो रहा है कि आर्य महासम्मेलन जैसा गौरवान्वित कार्य को करने में सार्वदेशिक सभा के तत्वावधान में एक बार फिर करीब 120 साल बाद दयानन्द के सिपाही मांडले में अंतर्राष्ट्रीय महासम्मेलन आयोजित कर ब्रह्मदेश (म्यांमार) में वैदिक ज्योति को पुनः उसी वेग से जागृत करने का कार्य करेंगे।
-विनय आर्य