Wednesday, 20 September 2017

रोहिंग्या मुस्लिम पर पूरी दुनिया ख़ामोश क्यों है?

भारत के कई शहरों जैसे कोलकाता, लुधियाना, अलीगढ़ वगैरह में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में प्रदर्शन हो रहे हैं। रोते बिलखते बच्चों-महिलाओं के फोटो लगी तख्तियां लेकर कहा जा रहा है पूरी नस्ल को ख़त्म किया जा रहा है। बच्चों तक को भाले-बर्छियां भोंककर टांग दिया जा रहा है। औरतों की आबरू लूटी जा रही है। सवाल पूछा जा रहा है कि पूरी दुनिया ख़ामोश क्यों है?

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्ला खुमेनी ने म्यांमार की घटनाओं पर अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और मानवाधिकार के दावेदारों की चुप्पी व निष्क्रियता की निंदा करते हुए कहा है कि इस समस्या को हल करने का मार्ग, मुस्लिम देशों की व्यवहारिक कार्यवाही और म्यांमार की निर्दयी सरकार पर राजनैतिक व आर्थिक दबाव डालना है। इन सब मामलों में अक्सर मानवाधिकार संगठन निशाने पर जरूर होते हैं। लगता है वक्त के साथ अपनी दोगुली नीतियों के चलते आज मानवाधिकार संगठन भी अपनी प्रासंगिता खो बैठे हैं। 
शरणार्थी मामलों के सभी पुराने कड़वे मीठे मामलों को देखते हुए रोहिंग्या शरणार्थी संकट ताजा हैं और म्यंमार के संदर्भ में दोनां सभ्यतायों और संस्कृतियों के संघर्ष को ध्यानपूर्वक देखें तो इसकी शुरुआत आज से नहीं बल्कि 16 वर्ष पहले उस समय हुईई जब तालिबान ने 2001 में अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की 2 सबसे बड़ी प्रतिमा को इस्लाम विरोधी करार देते हुए डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया था। इसके बाद बौद्ध भिक्षु अशीन विराथू अपना 969 संगठन लेकर आए। बुद्ध  की प्रतिमा टूटना इसके बाद इस्लामिक मुल्कों की चुप्पी विराथू को जन्म दे गयी। जिसकी बेचेनी आज इस्लामिक मुल्कों में साफ देखी जा सकती है। लेकिन इस पूरे मामले में चीन, जापान, रूस से लेकर अमेरिका और यूरोप के शक्तिशाली देश तक मौन है क्यों?
 
       
दरअसल दुनिया की पहली प्राथमिकताओं में आज व्यापार सबसे ऊपर है। दूसरा डेनियल पाइप्स कहते हैं कि इस्लाम चौदह सौ वर्ष पुराना डेढ़ अरब से अधिक आस्थावानों का मजहब है जिसमें कि हिंसक जिहादी से शांत सूफी तक सभी आते हैं। मुसलमानों ने 600 से 1200 शताब्दी के मध्य उल्लेखनीय सैन्य, आर्थिक और मजहबी सफलता प्राप्त की। उस काल में मुस्लिम होने का अर्थ था एक विजयी टीम का सदस्य होना यह ऐसा तथ्य था जिसने कि मुसलमानों को इस बात के लिये प्रेरित किया कि वे अपनी आस्था को भौतिक सफलता के साथ जोडे़ं। मध्य काल के उस गौरव की स्मृतियाँ न केवल जीवित हैं बल्कि उनको आधार बनाकर पुनः आज भी उसी स्वर्णिम काल को पाने की चाहत लिए बैठे हैं। 
पिछले कुछ सालों के आंकड़े अतीत से उठाकर देखें तो इस्लाम के मानने वालों को जिस देश व सभ्यता ने शरण दी या तो उन सभ्यताओं को मिटाने का कार्य हुआ या आज इस्लाम का उन सभ्यताओं से सीधा टकराव है। एशिया यूरोप समेत अनेकों देश जिनमें फ्रांस से लेकर जर्मनी, अमेरिका आदि तक में यह जख्म देखे जा सकते हैं। ज्यादा पीछे ना जाकर यदि 2010 के बाद के ही आंकड़े उठाकर देखें तो इस वर्ष रूस की एक मेट्रो को निशाना बनाया गया जिसमें 40 लोग मरे और 100 से ज्यादा जख्मी हुए, भारत में पुणे के 17 लोगों समेत विश्व भर में इस्लाम के नाम पर हुए हमलों में उस वर्ष करीब 673 लोग मारे गये। 2011 चीन में एक उइगर आतंकी द्वारा सड़क पर चलते करीब 15 लोगों को गाड़ी से कुचल कर मार डाला और 42 घायल हुए। दिल्ली में बम विस्फोट से 17 लोगों की जान समेत विश्व भर में 717 लोगों को आतंक के कारण जान से हाथ धोना पड़ा। 2012 में 799 तो 2013 में 768 लोगों को मजहबी सनक का शिकार बनाया गया। 2014 में रूस, फ्रांस, अमेरिका, केमरून, इजराइल समेत इस वर्ष 2120 लोग मारे गये। 2015 में देखे तो डेनमार्क, ट्यूनीशिया, केन्या, अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया, जर्मनी समेत विश्व के करीब 45 देशों में अलग-अलग 110 से ज्यादा हमले हुए जिनमें 3 हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सोना पड़ा। 2016-17 में जिहाद के नाम पर फ्रांस, जर्मनी, इंडोनेशिया, बेल्जियम ब्रिटेन समेत करीब 100 से ज्यादा हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया गया जिनमें 2 हजार से ज्यादा लोग मरे। अमेरिका स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हजारों और मुम्बई हमले को भला कौन भुला सकता है जिनमें लगभग विश्व के सभी देशों के लोगों ने बड़ी संख्या में जान गंवाई थी। 

आज इस्लाम में आस्था रखने वाले अनेकों लोग म्यंमार में हो रही हिंसा को बोद्ध आतंक के रूप में प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं। लेकिन जब इराक में यजीदी लोगों से लेकर बहुसंख्यक इस्लाम के द्वारा अन्य अल्पसंख्यक समुदाय पर हिंसक हमले होते हैं तो इसे इस्लामिक आतंकवाद का नाम नहीं दिया जाता क्यों? मुम्बई हमले के वक्त अल जजीरा की वेबसाइट ऐसी टिप्पणियों से भरी पड़ी थी कि मुसलमानों के लिये अल्लाह की शानदार विजय, मुम्बई में यहूदी केन्द्र में यहूदी रबाई और उसकी पत्नी की मृत्यु हृदय को सुख देने वाला समाचार इस्लामी मीडिया में बतलाया गया। हर किसी को याद होगा डेनमार्क के एक समाचार पत्र में प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों पर हुई प्रतिक्रिया का आवेश जब अनेक देशों के झंड़ों और दूतावासों को आग लगायी गई थी लंदन में प्रदर्शनकारियों की तख्तियों पर यहां तक लिखा था ‘‘इस्लाम का अपमान करने वालों का सिर कलम कर दो।’’ 
लगभग विश्व का हर एक कोना जिसमें स्कूल से अस्पताल तक, परिवहन से लेकर सड़क पर चलते और धार्मिक यात्राओं तक, सभा से लेकर संसद तक मसलन दुनिया इस्लाम के नाम पर दर्द झेल चुकी है। हर बार जानबूझकर पीड़ा पहुँचाने के लिये नये तरीके सामने आये, राजनीतिक नाटक बनाया गया, कलाकार अपनी भूमिका पूर्ण करते गये और मंच से बिदा होते ही उन्हें शहीद बताया गया। मैं कोई ज्यादा बड़े हिंसक कृकृत्य यहाँ नहीं दे रहा हूँ, न रोहिंग्या लोगों के साथ हूं बल्कि उस सच तक ले जा रहा हूँ जहाँ प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं कि पूरी दुनिया खामोश क्यों है?
-राजीव चौधरी


दुर्गा उत्सव पर्व कैसे मनावें

भारत वर्ष पर्वों का देश है ऋतु परिवर्तन, महापुरूषो के जीवन पर धार्मिक मान्यताओं या राष्ट्रीय पर्वों अथवा किसी बड़ी मानवीय उपलब्धियों पर प्रायः ये मनाये जाते हैं। पर्व से जीवन में प्रसन्नता, ऊर्जा, मधुरता आती है और आपसी संगठन, भाई चारे की भावना बढ़ती है।

                इन पर्वों को मनाने के पीछे कोई दर्शन होता है अर्थात वह पर्व मानव समाज को कोई सन्देश देता है। जैसे रावण दहन जीवन में पल रही आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करने का, होली दहन आपसी ईष्र्या, बुराई को दहन कर प्रेम से गले मिलने का, दशहरा शौर्यता का, दीपावली स्वच्छता और सम्पन्नता के साथ अन्धेरे को दीपावली की सबसे काली अमावस्या में दीपक जलाकर अन्धेरे को दूर कर प्रकाश फैलाने का सन्देश देता है अर्थात जीवन से अज्ञान रूपी अन्धेरे से दूर होकर ज्ञान प्रकाश से भर जावें।
                किन्तु आज समाज ऐसे जीवन उपयोगी दर्शन से दूर होकर बाहरी प्रदर्शन तक ही रह गया है। इसलिए पर्वों से जो लाभ मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा है। केवल कुछ दिनों का मनोरंजन ही मिल रहा है। यह पर्वों का उचित लाभ नहीं है। इसलिए पर्वों को जाने और मानें तभी उसका सही और पूर्ण लाभ हो सकता हैं
                इसी प्रकार दुर्गोत्सव में काली को शक्ति के रूप में मानते हुए उसकी स्थापना कर 9 दिन तक उसके सामने तरह-तरह के आयोजन करके मनाते है।
                किसी ने दुर्गा का यह स्वरूप समाज के सामने समाज को एक शिक्षा देने की भावना से प्रस्तुत किया होगा। जिसमें नारी की महानता और महत्व को दुर्गा के विभिन्न रूपों से समझाने का दर्शन दिया है। नारी समाज और संसार के निर्माण की एक महत्वपूर्ण कड़ी है कहा गया ‘‘माता निर्माता भवति।’’ नारी ममत्व, प्रेम, अन्नपूर्णा, प्रथम गुरू, परिवार व समाज की मुख्य धूरी है वही वह अपने शक्तिशाली रूप से दुष्टों का मर्दन करने वाली वीरांगना भी है।
                काश दुर्गा शौर्यता के इस रूप को नारी जाति अपने जीवन में अपना लें तो नारी जाति असुरक्षित नहीं रहेगी।
                ये हाथ जहां गहनों से सजाने के लिए है वहीं आवश्यकता पड़ने पर शस्त्र भी उठाले यह प्रेरणास्पद चित्र नारी जाति को शिक्षा देता है। रानी दुर्गावती, लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं ने दुर्गा के इस स्वरूप को आत्मसात किया है।
                दुर्भाग्य से शक्ति का प्रतीक उस माँ से शौर्यता का समाज से दुष्प्रवृत्ती हटाने का अदम्य साहस की शिक्षा नहीं ली जा रही है। मात्र मनोरंजन के लिए संगीत, नृत्य और निरर्थक हास्य कार्यक्रमों का आयोजन इसका उद्देश्य रह गया। इतने लम्बे समय तक चलने वाले त्यौहार से कोई अच्छा सन्देश जब समाज को मिले तो उसका सही लाभ है।
                जैसे काली के 8 हाथ इस बात का प्रतीक है कि चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जब एक साथ होगें तो शक्ति का रूप बनेगा।
                 अर्थात दो हाथ ब्राह्मण के, दो हाथ क्षत्रिय के, दो हाथ वैश्य के, दो हाथ शूद्र के इकठ्ठे हो जावेगे तभी ये सनातन धर्म सशक्त होगा, उंच नींच के भेदभाव समाप्त होगें। यही दुर्गा के 8 हाथों का सन्देश है।
                हम अज्ञानता में जिसकी पूजा करते हैं, जिसे महान बताते हैं किन्तु कई स्थानों पर देखा गया फिल्मी धुनों पर जोर-जोर से फूहड़ता के गीत बजाये जाते हैं भद्दे नृत्य किये जाते हैं एक दृष्टि से यह उस दुर्गा का अपमान है। यदि दुर्गा पूजा करनी है। तो उसके चित्र तक सीमित न रहो, उसके स्वरूप से जो चरित्र प्रदर्शित होता है उसे अपनानें की आवश्यकता है।
               


                इन्हीं दिनों में कुछ अप्रिय घटनाऐं और दुःखदायी परिणाम भी घटित होते हैं, उसके प्रति भी हमें ध्यान देना आवश्यक है। कुछ बिन्दु इसके सन्दर्भ में निम्नानुसार हैं -
                अपने उत्सव को हम ही कभी-कभी अज्ञानता के कारण अथवा अन्य किसी साम्प्रदायिक भावना से प्रेरित होकर उसके स्वरूप को बिगाड़ देते हैं और अपने कार्यों से अनेक परिवारों और समाजों को परिवारों के लिए व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं। इसमें मुख्य रूप से बड़ी तेज अवाज में और देर रात तक माइक, ध्वनि प्रसारण और सबसे ज्यादा दुःखदायी साधन डीजे का अनियन्त्रित उपयोग करते हैं। संगीत की मधुरता कम आवाज में कर्ण प्रिय होती है जोर से तेज आवाज में एक स्पर्धा की भावना से बजाए जाने वाला संगीत कई लोगों को जैसे बीमार बच्चों के लिए ये हानिकारक होता है और डीजे हदय पीड़ित लोगों के्र लिए हानिकारक होता है। इससे वह व्यक्ति आपके इस प्रदर्शन को अच्छा नहीं कहता, धन्यवाद नहीं देता। दुःखी मन क्या कहेगा ? स्वयं विचार करें। 
                हमारा उद्देश्य इन धार्मिक आयोजनों से सबको सुख, शान्ति और प्रसन्नता का होना चाहिए।
                नव दिन का समय एक ऐसा समय है जिससे हजारों लोग एक अच्छी भावना को लेकर एकत्रित होते है। इस समय का उपयोग अच्छे भाषणों, कवि सम्मेलनों, नाटक आदि से करके परिवार, समाज और राष्ट्र को एक अच्छा सन्देश दे सकते हैं। जिस प्रकार महाराष्ट्र मंे बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव के नाम पर हजारों लोगों को इकट्ठा किया था। ऐसा ही कुछ इसमें भी होना चाहिए।
                विशेष करके श्रद्धालुओं में एक शिष्टता, संयम और सादगी का व्यवहार होना चाहिए। उच्छंखलता, अश्लीलता, पहरावे से स्पष्ट होती है। एक देवी के सामने जब हम जाएं तो ध्यान रखना चाहिए।
                देखा ये जाता है कि फिल्मी स्टाईल में अनेक बच्चे भीड़ में घुसकर अव्यवस्था फैलाते हैं इस पर पालकांे को और आयोजकों को ध्यान देना चाहिए।
                कार्यक्रम नौ दिन तक होते हैं किन्तु उनकी एक समय की सीमा तय होना चाहिए। ताकि जो लोग बीमार हैं जिन्हें डाॅक्टरी सलाह से आराम की आवश्यकता है, उन्हें परेशानी न हो।
                दुर्गा स्थापना के लिए जो स्थान बनाये वह स्थान ऐसा होना चाहिए जिससे आवागमन प्रभावित न हो। आवागमन अवरूद्ध होने से भीड़ बढ़ती है कभी-कभी मार्ग जाम हो जाता है, विवाद बढ़ते हैं।
                इसलिए धार्मिक कार्यक्रम का आयोज किसी प्रकार की अव्यवस्था फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। धर्म का उद्देश्य समाज को सुख शान्ति सहयोग करना होता है।
                कम से कम इन दिनों में किसी भी प्रकार का नशा न करने का संकल्प लेना चाहिए। ताकि नशे की स्थिति में ही आदमी मानसिक सन्तुलन खोकर अप्रिय घटनाओं को जन्म देता है। इस नौ दिन में बड़े बड़े कई कार्यक्रम होते है जिसमें जनमानस इकट्ठा होता है। उसमें से कुछ व्यक्ति नशे में होकर मिल जायें तो वहां अव्स्था होने का खतरा बना रहता है। जो कभी कभी साम्प्रदायिक विवादों का कारण भी बन जाता है।
                पूरे देश की कई रिपोर्ट हैं, इन दिनों में ही नवयुवक बच्चों को परिवार से देर रात तक दूर रहने की स्वतन्त्रता कार्यक्रम हेतु दी जाती है और उसके परिणाम भी गलत होते हैं। इसलिए समय पर भी नियन्त्रण रखें ताकि वे कार्यक्रम में भाग लेवें किन्तु एक समय सीमा तक। ताकि अप्रिय घटना से हम पीड़ित न हों ।
                उपरोक्त बातें समाज हित में है, किसी की भावना को कष्ट पहूँचाने की दृष्टि से नहीं है किन्तु एक अच्छे सन्देश के रूप में प्रस्तुत है।

प्रकाश आर्य
                                                                                                                                                    सभामन्त्री (सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली)


स्वामी जी का कथन कितना प्रासंगिक

 सत्यार्थ प्रकाश के अंत में स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश देख रहा था तो उसमें स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने शिक्षा की परिभाषा देते हुए कहा है कि जिस से विद्या, सभ्यता, धर्मात्मता, जितेन्द्रियतादि की बढ़ती होवे और अविद्यादि दोष छूटें उस को शिक्षा कहते हैं. स्वामी जी के कथन को पढने के बाद एक-एक कर शिक्षा के नाम पर देश के स्कूलों में बच्चों पर हो रहे शारारिक, मानसिक अत्याचार याद आने लगे कि आखिर हमारी शिक्षा व्यवस्था कितने उत्तम शिखर से चलकर कितने निम्न स्तर की ओर जा रही है. हाल ही में हुई गुडगाँव वाली घटना याद आने लगी आखिर क्यों यह सब किसके लिए हो रहा है? क्यों इस शिक्षा के मासूम बच्चों को रोंदा जा रहा है. 7 वर्ष के छात्र प्रद्युम्न की हत्या के मामले की जांच में जैसे-जैसे पुलिस आगे बढ़े रही वैसे-वैसे स्कूल प्रशासन की लापरवाही की परतें दिन-प्रतिदिन खुलती नजर रही है.

सुनकर हैरानी भी होती है कि रायन इंटरनेशनल स्कूल की लापरवाही की लिस्ट कितनी लम्बी है. स्कूल के छोटे बच्चें बता रहे है कि दो महीने पहले इसी स्कूल के प्रथम ताल के टॉयलेट में क्लास ग्यारह और बारह के बच्चे शराब पी रहे थे. जब स्कूल के छोटे बच्चो ने उनकी ये करतूत देख ली तो इन छात्रों ने उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. स्कूल में छोटी क्लास के इन छात्रों ने जब इस बात की शिकायत रायन स्कूल की सुपरवाइजर और स्कूल की स्पोर्ट्स टीचर से की तो उन्होंने इस बात को यहीं पर दबा देने की बात कही और परिवार को भी ना बताने की बच्चों को हिदायत दी थी.
आखिर हमारा समाज किस शिक्षा के लिए मारा मारी में लगा है क्यों इस शिक्षा के मासूम बच्चों का मस्तिक्ष प्रेशर कुकर बना रहा है. सिर्फ अपने स्थानीय समाज, परिवार और रिश्तेदारों को यह दिखाने के लिए कि देखिये हमारे बच्चें कितने महंगे स्कूल में पढ़ते है? जब यह बच्चें बड़े होते है इनमें एक दो डॉ या इंजिनियर बनता है वो खबर तो बड़ी बनाकर सुनाई जाती है लेकिन इनमें समाज और परिवार के प्रति जो नैतिकता शून्य होती है उसका वर्णन नहीं किया जाता. लगता है वर्तमान शिक्षा का उद्देश्य केवल ऐसी शिक्षा का देना है जिसमें आर्थिक शक्ति का आगमन हो और बच्चें के अन्दर से मनुष्यता के बीज हमेशा के लिए मिटा दिए जाये.

समाचारपत्रों से यह भी जानकारी मिली है कि रेयान स्कूल कुछ बच्चों और अभिवावक बता रहे है कि स्कूल की बाउंड्री के अंदर ही ड्राइवर लोग शराब पीते थे और ताश खेलते थे. स्वामी जी कहते है कि संस्कारउनको कहते हैं कि जिस से शरीर, मन और आत्मा उत्तम होवे क्या ऐसी व्यवस्था में पढने वाले बच्चें संस्कारवान बन सकते है. शिक्षा का मंदिर जिसे स्कूल कहा जाता ऊँचें भवन से या वहां वहां के स्टाप के आचरण व्यवहार से बड़ा बनता है यह भी लोगों को सोचना चाहिए?

स्वामी जी आगे कहते है कि जो सत्य शिक्षा और विद्या को ग्रहण करने योग्य धर्मात्मा, विद्याग्रहण की इच्छा और आचार्य का प्रिय करने वाला हो शिष्यउस को कहते हैं. लेकिन आज के मौजूदा दौर में यह पवित्र रिश्ता भी छिन्न भिन्न हो चूका है कहीं से खबर आती की बच्चों में महिला अध्यापक पर फब्तियां कसी तो किसी खबर में सुनने को आता है स्कूल में इंग्लिश की टीचर ने 13 साल के बच्चे से यौन सम्बन्ध बनाये. भला एक गौरवशाली परम्परा वादी भारतीय समाज का इससे बिगड़ा रूप क्या होगा? समय की मांग है कि बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बारे में समझाएं. इसमें झिझक की कोई बात नहीं है, बल्कि ये बच्चों की सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी कदमों में से एक है. उसके भीतर विश्वास भरें कि आप हर हाल में उसके साथ हैं ताकि वो खुलकर अपनी बात आपसे शेयर कर सके.कई बार बच्चे आपस में भी छेडछाड़ का शिकार होते हैं. जैसे बड़े बच्चे किसी बात को लेकर छोटी क्लास के बच्चों को तंग करते हैं. कई बार ये तंग करना बच्चों को शारीरिक या भावनात्मक नुकसान पहुंचाता माना कि भौतिक और आर्थिक सफलता आज जरूरी है अशिक्षित मनुष्य के सामने कोई राह नहीं होती. उसे बड़ा आफिसर, डाक्टर या फिर नेता बन जाना चाहिए लेकिन सवाल फिर यही आता क्या बिना संस्कार बिना नैतिकता के बिना ऊँचे आदर्शों के यह सफलता समाज के लिए घातक नहीं होगी?



इस मामले में वकील सुजीता श्रीवास्तव के माध्यम से दायर जनहित याचिका में स्कूल की चाहरदीवारी के भीतर बार बार छात्रों के शोषण और बाल यौन शोषण की हो रही घटनाओं का मुद्दा उठाया हैं जिसे लेकर समाज बिलकुल भी जागरूक नहीं है लेकिन इस विषय पर समाज का एक बड़ा हिस्सा बात करना भी अनुचित या शर्म का विषय समझता रहा है यदि इक्का दुक्का मामले सामने भी आये तो परिवारों ने मिलकर इस पर शर्म संकोच का पर्दा डालने का कार्य किया और पूरे देश में बच्चों के साथ होने वाले अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं. जबकि स्वामी जी सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास में लिखते है कि जब आठ वर्ष के हो तभी लड़कियों को लड़कियों की और लड़कों को लड़कों की पाठशाला में भेज दिया जाये और दुष्टचारी अध्यापक और अद्यापिकाओं से शिक्षा न दिलावें.
बचपन में घर और आस-पास का माहौल और स्कूल किसी भी इंसान के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है. आधुनिक स्कूलों से निकले आचरण हीन अध्यापक, पैसा कमाने की मशीन बने स्कूल नित्य नये बच्चों को बिगाड़ने के कारखाने खोलते जा रहे है. इसके बाद अक्सर बहुतेरे माता-पिता रोते दिख जाते है कि हमारा बेटा या बेटी हमारी बात नहीं सुनते हम पर झल्लाते चिल्लाते है तो सोचिये क्या आपने उसे इस नैतिक शिक्षा के लिए उसे स्कूल में भेजा था? वहां उसे जो मिला आज वो वही आपको दे रहा है.

 विनय आर्य 

Monday, 11 September 2017

ना मौत रुकेगी ना राजनीति

तमिलनाडु के अरियलूर जिले में 17 साल की लड़की एस अनीता की आत्महत्या ने राजनीतिक शक्ल लेना शुरू ही किया था कि कन्नड़ भाषा की (लंकेश पत्रिका) की सम्पादक और लेखक गौरी लंकेश की हत्या ने उसे भुला दिया. नेताओं को अनीता जाति टटोलनी पड़ती इस कारण बिना मेहनत के ही जानी पहचानी गौरी लंकेश को ही मुद्दा बनाना उचित समझा, मुझे पहली बार जानकर आश्चर्य हुआ कि पत्रकार भी पार्टी, धर्म, मजहब और जातियों में बंधे होते है. जहाँ पुरे देश के बुद्धिजीवियों को गौरी की हत्या ने हिलाया वही मुझे इस खबर ने हिला दिया कि बीजेपी विरोधी लेखक गौरी लंकेश की हत्या! 

ऐसा नहीं है कि मेरे अन्दर गौरी के लिए कोई सहानुभूति या संवेदना नहीं है, मानवता के नाते मुझे भी दुःख हुआ लेकिन मेरा दुःख उस समय अनाथ सा हो गया जब मेने प्रेस ट्रस्ट में वो पत्रकार और नेता देखे जो सिर्फ अखलाक, पहलु खान और याकूब मेनन की मौत पर मातम मनाते दिखे थे. गौरी लिख रही थीं मुसलमानों की ओर से, भारत से भी खदेड़े जा रहे बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों की ओर से, नक्सलवादियों की ओर से और कश्मीरी की आजादी के दीवानों की तरफ से.
गौरी की मौत पर दिल्ली के बड़े शिक्षण संस्थान जेएनयू में शोक सभा आयोजित की गयी उसी जेएनयू में जहाँ सेना के जवानों की शाहदत का जश्न मनाने की पिछले दिनों खबर सबने सुनी थी. गौरी कन्हैया को अपना बेटा मानती थी. उमर खालिद का हाल पूछती थी. वो कर्नाटक की राजनीति में अपनी पत्रिका से एक अलख जगाना चाह रही थी. मुझे नहीं पता उसकी मौत किसके काम आएगी शायद उनके ही काम आये जिनके काम दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, एमएम कलबुर्गी, अकलाख, इशरत जहाँ की आई थी. कोई इसे भाषा पर तो कोई संस्कृति पर गोली बता रहा है, विपक्ष के बड़े नेता और दुसरे पाले के भावी प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि जो मोदी के खिलाफ बोलेगा वो मारा जायेगा. पता नहीं ये दुआ है या बद्दुआ या कोई चेतावनी?

 
ऐसा नहीं है देश में ये सिर्फ तीन या चार पत्रकार या लेखक मारे गये नहीं, अकेले बिहार ही में हिन्दी दैनिक के पत्रकार ब्रजकिशोर ब्रजेश की बदमाशों ने गोली मार कर हत्या कर दी. इससे पूर्व भी सीवान में दैनिक हिंदुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन और सासाराम में धर्मेंद्र सिंह की हत्या की जा चुकी है. पिछली सरकार में उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार को कथित रूप से जलाकर मार डालने के आरोप में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था. कहा जाता है कि कथित रूप से फेसबुक पर मंत्री के खिलाफ लिखने के कारण पत्रकार जगेंद्र सिंह को जान गवानी पड़ी थी. लेकिन इन सबका दुर्भाग्य रहा कि इनके लिए प्रेस ट्रस्ट में कोई शोक सभा आयोजित नहीं की गयी ना इनका गौरी की तरह राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि. 1992 के बाद से भारत में 27 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जब पत्रकारों का उनके काम के सिलसिले में कत्ल किया गया. लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी है.
आज गौरी के अज्ञात हत्यारों का धर्म राजनेताओं को पहले ही पता चल गया कहा जा रहा कि गौरी हिन्दूओं के विरोध में लिखती थी तो उसकी हत्या हिन्दुओं ने ही की है दुःख का विषय है नबी के कार्टून बनाने के आरोप में फ्रांस में मारे गये दर्जनों पत्रकारों का मजहब अभी तक पता नहीं चला, हम जिसे स्वास्थ्य राजनीति समझ रहे है, वह दरअसल एक मजहबी सूजन का शिकार शरीर है.

मैंने सुना था दुःख सुख सबका साझा होता है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है जब पत्रकार राजनितिक दलों से, लेखक मजहबों से, कानून संवेदना से और नेता वोटों के लालच बंधे हो तो वहां आम इन्सान को सुख दुःख भी बंटा सा नजर आता है. मसलन अरुण आनंद कहते है कि नक्सलवादियों के काम करने की विशिष्ट शैली का यह हिस्सा है कि तेजी से प्रॉपेगैंडा करो और छोटे-छोटे आयोजन ज्यादा से ज्यादा जगह पर करो. खासकर मीडिया में एक वर्ग उनका घोर समर्थक है. इस बार भी गौरी लंकेश की हत्या के बाद कमोबेश सभी जगह वामपंथियों और नक्सलवाद के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शनों की अगुआई की. दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार पहुंच गए. बताइए! पत्रकार संगठनों के कार्यक्रम में भारत तेरे टुकड़े होंगेका नारा देने वाले कन्हैया कुमार का क्या काम! फिर डी. राजा, सीताराम येचुरी भी पहुंचे. इन सभी ने माइक पकड़कर भाषण भी दिए. कुछ अवसरवादी तत्वों के कारण पत्रकार संगठनों द्वारा एक पत्रकार की हत्या के विरोध में आयोजित शोक सभा राजनीति का अखाड़ा बन गई और सीधे-सीधे केंद्र सरकार, भाजपा व आरएसएस पर निशाना साधा गया. देश भर में यही हुआ और अब इस आंदोलन को फिर असहिष्णुता के पुराने पड़ चुके मुद्दे से फिर से जोड़ने की कोशिश जारी है.

इस पूरे प्रकरण में जो सबसे शर्मनाक सच सामने आया है वह यही है कि शहरी नक्सलवादी गौरी लंकेश की हत्या की आड़ में राष्ट्रवादियों पर निराधार आरोप लगाकर निशाना साध रहे हैं. उन्हें गौरी लंकेश की हत्या से कोई दुख नहीं हुआ. उनके लिए यह हत्या एक सुअवसर बन गया है, अपने वैचारिक विरोधियों से हिसाब-किताब बराबर करने का. मीडिया व राजनीतिज्ञों का एक वर्ग भी भाजपा व आरएसएस से अपनी चिढ़ के कारण इस कुप्रचार में शामिल हो गया है. यह दुखद है लेकिन लगता है कि सत्ता से बाहर रहने का दंश इतना तीखा है कि लाशों की राजनीति होती रहेगी,,,राजीव चौधरी 



रोहिंगा मुसलमान, मानवता का पाठ बंद करे भारत

मंगलवार की दोपहर कुछ लोग दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। मामला था बर्मा में रोहिंगा मुस्लिमों पर हमले के विरोध में यह एक शांति पूर्ण प्रदर्शन था। अबकी बार न तो रोहिंगा मुस्लिमों के पक्ष में मुम्बई के आजाद मैदान में अमर जवान ज्योति पर तोड़-फोड़ की और न ही लखनऊ में महात्मा बुद्ध की मूर्ति खंडित की, शायद सबको ज्ञात होगा पिछली बार 2012 में करीब एक लाख मुस्लिमों ने आजाद मैदान में हिंसा उपद्रव किया था। जिसमें करीब 7 लोग मारे गये थे और बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे। उस दौरान पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को बड़ी संख्या में अपने देश में सुरक्षा की कमी महसूस हुई थी जिस कारण दिल्ली, मुम्बई बेंगलोर आदि बड़े शहरों में रह रहे पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को पलायन करना पड़ा था।


आखिर कौन हैं रोहिंग्या मुसलमान? कहाँ से आये हैं, किधर बसाए गए हैं, भारत को उनसे क्या समस्या है, क्या हमें उनकी मदद करनी चाहिए या फिर ये किसी साजिश के तहत भारत में बसाए जा रहे हैं? सम्भवतः ऐसे तमाम सवाल रोहिंग्या शरणार्थियों के नाम सुनते ही हमारे जेहन में आ जाते हैं। अब जैसे ही 40 हजार रोहिंग्या मुसलमानों को उनके देश म्यांमार वापस भेजने की बात सरकार की ओर उठाई गयी तो प्रदर्शनकारियों, मानवतावादी सेकुलर लोगों का समूह आँखों में आंसू भरकर सरकार को मानवता का पाठ पढ़ाने आ गया। दरअसल यह लोग पिछले पांच से सात साल में भारत में अवैध रूप से घुसे और देश के विभिन्न इलाकों में रह रहे हैं।

अब भारत सरकार रोहिंगा मुस्लिमों को इनकी पहचान करने और इन्हें वापस म्यांमार भेजने की योजना पर काम कर रही है। म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। बर्मा सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इन्कार कर दिया है। 

मामला सिर्फ नागरिकता तक सीमित रहता तो कोई बात नहीं थी हाल ही में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या चरमपंथियों ने पुलिस चौकी पर हमला किया था जिसमें सुरक्षाबलों के कुछ  सदस्य मारे गए थे। इस हमले के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी निंदा करते हुए बयान जारी किया था कि भारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में म्यांमार के साथ मजबूती से खड़ा है। हमले के बाद रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ सैन्य कार्यवाही शुरू हुई थी और रोहिंग्या शरणार्थी संकट उत्पन्न हो गया। 


पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म अपनी अहिंसा के लिए जाना जाता है फिर भी रोहिंग्या मुस्लिम और म्यांमार के बौद्ध आपस में सामंजस्य नहीं बैठा पाए? इसके कई कारण हो सकते हैं पहला ये कि किसी भी देश के नागरिक नहीं चाहेंगे कि उनके देश के संसधानों पर किसी और देश के लोग किसी भी रूप में आकर राज करें। दूसरा कारण ये है कि शरणार्थी भी अहिंसक हों, नियम मानने वाले हों, जिस देश में रहे उसकी देशभक्ति करने वाले हों तो फिर भी ठीक है। वरना कोई भी देश अपने देश में देशद्रोहियों का जमावड़ा नहीं लगाना चाहेगा? तीसरा प्रवास की भी समय सीमा होती है यदि कोई जीवन पर्यंत रहना चाहता है उसको उसके मूल निवासियों की सभ्यता और संस्कृति से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन रोहिंगा देश से बढ़कर मजहब को मानते हैं, शायद सबसे बड़ा कारण यही हो सकता है जिससे इतने साल म्यांमार में रहने के वावजूद रोहिंग्या मुस्लिम कभी वहां के मूल निवासियों के साथ समांजस्य नहीं बिठा पाए।

मानवता के नाते शरणार्थी को शरण देनी चाहिए लेकिन यहाँ मामला सिर्फ शरणार्थी का नहीं है मैं बे हिचक कहता हूँ कई बार शरणार्थी अकेले नहीं आते उनके साथ आता उनका मजहब, उनकी अन्य मत मतान्तरो से नफरत, और कट्टर मानसिकता जो किसी भी अन्य समाज से घुलने-मिलने को तैयार नहीं होती। 


यूरोपीय देशो ने 2015 में सीरियाई शरणार्थियों को शरण दी थी क्या नतीजा निकला? जर्मनी में जर्मन युवतियों के साथ नववर्ष पर सामूहिक दुष्कर्म, फ्रांस में हमले, ब्रिटेन में आतंकी हमले नतीजा आज पूरा यूरोप आतंक के साये में जी रहा है। शायद आप सभी को याद होगा, भारत में बोध-गया मन्दिर में एक बम विस्फोट हुआ था और तब हमलावर ने हमला करने का कारण बताया था कि बौद्ध धर्म को मानने वाले म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की खातिर उसने बौद्ध मंदिर पर हमला किया है। बस यहां से शुरुआत होती है इनके मजहबी पाखंड की, म्यांमार में कुछ हो रहा होगा तो आतंक भारत में फैलाया गया और भारत का राजनैतिक सेकुलिरिज्म  ‘‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’’ उच्चारित करके सो जाता है।


वर्ष1990 कश्मीर दंगें में एक ओर जहां कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बनने को मजबूर हैं, मुस्लिम वोट बैंक के लिए नेताओं ने साजिश के तहत उनको कभी कश्मीर में वापस बसने नहीं दिया। कश्मीर में से लगभग सारे के सारे हिन्दू या तो मार दिए गए या फिर भगा दिए गए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत कोई भी भारतीय जो कश्मीर का निवासी नहीं है, वहां जमीन नहीं ले सकता है लेकिन नेताओं ने रोहिंग्या मुसलमानों को जम्मू-कश्मीर में बसने दिया गया क्यों

हालाँकि यह अभी तक साफ नहीं है कि भारत इन रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार में भेजेगा या फिर बांग्लादेश या फिर भारत में रखेगा। रोहिंग्या मुसलमानों को निर्वासित करने का मुद्दा भारत के सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है रोहिंगा मुस्लिमों की पैरवी जाने-माने वकील प्रशांत भूषण कर रहे हैं।


अब जब भारत सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों को वापस भेजने का मन बना ही लिया है तो इसमे मानवाधिकार संगठनों को आपत्ति है, यही मानवधिकार संगठन उस समय घास चरने चला जाता है जब कश्मीरी पंडितों को मारकर अपने ही घरों से बेदखल कर दिया जाता है, इराक में यजीदी महिलाओं पर मजहबी अत्याचार होता है या फिर पाकिस्तानी सेना बलूचों पर जुल्म करती है। करांची और सिंध में जबरदस्ती हिन्दू लड़कियों को उठा लिया जाता तब न तो ये मानवता के पक्षधर दिखाई देते हैं न ही विकसित देशों के राजनेता, जिन्हें बस दूसरे देशों में ही शरणार्थी ठिकाने लगाने होते हैं। कुछ लोगों को इससे भी आपत्ति है कि भारत ने 1950 मे तिब्बती शरणार्थियों को अपनाया, 1971-72 में बंगलादेशी शरणार्थियों को अपनाया तो रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों वापस भेजा जा रहा है? जबकि सब जानते है हमारे पूर्व के अनुभव कडवे ही रहे है. दूसरा भारत में कितने लोग गरीबी रेखा ने नीचे रह रहे हैं, कितने लोगों को एक समय का खाना भी नसीब नहीं हो रहा? अशिक्षा से हमारा मुल्क अभी भी लड़ रहा है। क्या ऐसे में ये गैर-जिम्मेदार शरणार्थी हमारे देश की समस्याएं और नहीं बढ़ाएंगे?
-राजीव चौधरी